आरएसएस किसी के खिलाफ नहीं, सत्ता की इच्छा नहीं रखता: मोहन भागवत
पवनेश
- 07 Feb 2026, 10:31 PM
- Updated: 10:31 PM
(तस्वीरों के साथ)
मुंबई, सात फरवरी (भाषा) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने शनिवार को कहा कि आरएसएस किसी के "खिलाफ" नहीं है और न ही वह सत्ता चाहता है या "दबाव समूह" बनने का लक्ष्य रखता है, बल्कि उसका उद्देश्य समाज को एकजुट करना है।
आरएसएस के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम में भागवत ने कहा कि डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने समाज में एकता की कमी सहित कई कमियों की पहचान की और अंततः इसी कारण उन्होंने 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की।
वर्ली क्षेत्र के नेहरू सेंटर में आयोजित दो दिवसीय व्याख्यान शृंखला 'संघ की 100 साल की यात्रा : नये क्षितिज' के पहले दिन भागवत ने कहा कि आरएसएस ने बहुत पहले ही तय कर लिया था कि वह समाज के एकीकरण के अलावा कोई और काम नहीं करेगा तथा एक बार यह काम पूरा हो जाने के बाद वह कोई अन्य एजेंडा नहीं अपनाएगा।
संघ प्रमुख ने कहा कि कई लोगों को लगता है कि नरेन्द्र मोदी आरएसएस की वजह से प्रधानमंत्री हैं, लेकिन मोदी भले ही एक राजनीतिक दल का नेतृत्व करते हैं और आरएसएस के कई स्वयंसेवक सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हैं, "राजनीतिक दल एक अलग इकाई है और वह आरएसएस का हिस्सा नहीं है।"
अपने व्याख्यान में भागवत ने आजादी के आंदोलन के दौरान उभरी विभिन्न विचारधाराओं का जिक्र किया, जिनका प्रतिनिधित्व राजा राम मोहन रॉय, स्वामी विवेकानंद और दयानंद सरस्वती सहित विभिन्न सुधारकों एवं नेताओं ने किया।
उन्होंने कहा, "हालांकि, फिर भी कुछ हद तक यह देखा जाता है कि समाज को दिशा देने और अनुकूल वातावरण बनाने का काम नहीं हो रहा है।"
भागवत ने कहा कि आरएसएस "किसी के खिलाफ" नहीं है और न ही किसी घटना की प्रतिक्रिया के रूप में काम करता है। उन्होंने कहा कि संघ का मुख्य उद्देश्य देश में जारी सकारात्मक प्रयासों का समर्थन करना और उन्हें मजबूत करना है।
भागवत ने कहा कि संघ कोई अर्धसैनिक बल नहीं है, भले ही वह नियमित 'पथ संचलन' करता है और उसके स्वयंसेवक लाठी रखते हैं, लेकिन इसे "अखाड़ा" के रूप में भी नहीं देखा जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि आरएसएस राजनीति में भी शामिल नहीं है, हालांकि इससे जुड़े कुछ लोग राजनीतिक जीवन में सक्रिय हैं।
हेडगेवार को संघ की स्थापना के लिए प्रेरित करने वाले कारकों के बारे में बात करते हुए भागवत ने कहा कि अपने शुरुआती दिनों में हेडगेवार ने असहयोग आंदोलन का समर्थन किया और उन पर राजद्रोह का आरोप लगाया गया, यहां तक कि उन्हें एक साल की जेल की सजा भी सुनाई गई।
उन्होंने कहा, "डॉ. हेडगेवार ने लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, डॉ. बीआर आंबेडकर और भगत सिंह जैसे नेताओं के साथ देश की स्थिति पर व्यापक चर्चा की। इन चर्चाओं के जरिये हेडगेवार इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि राजनीतिक स्वतंत्रता अंततः हासिल हो जाएगी, लेकिन अधिक महत्वपूर्ण सवाल यह था कि इस बात की क्या गारंटी है कि भारत फिर से गुलाम नहीं बनेगा।"
भागवत ने कहा कि उन्होंने गौर किया कि अंग्रेज देश पर आक्रमण करने वाले पहले लोग नहीं थे और सिकंदर के समय से पहले भी भारत को कई बार आक्रमण का सामना करना पड़ा था। उनका मानना था कि आजादी तो मिलकर रहेगी, लेकिन जब तक समाज में गहराई से व्याप्त कमजोरियों का समाधान नहीं किया गया, गुलामी फिर से लौट सकती है।
भागवत ने कहा कि हेडगेवार ने समाज में व्याप्त कई कमियों की पहचान की, जिनमें एकता, अनुशासन एवं स्वच्छता की कमी, बढ़ता स्वार्थ, अपर्याप्त ज्ञान और बड़े पैमाने पर गरीबी शामिल है।
संघ प्रमुख ने कहा कि इन चुनौतियों से निपटने के लिए हेडगेवार ने समाज को एकजुट करने के तरीकों पर प्रयोग करना शुरू किया। उन्होंने कहा कि इसी क्रम में 1925 में विजयदशमी के दिन आरएसएस की स्थापना की गई, जिसका लक्ष्य संपूर्ण हिंदू समुदाय को एकजुट करना था।
भागवत ने कहा कि बाइबिल की एक पंक्ति आरएसएस पर भी लागू होती है कि "यह नष्ट करने के लिए नहीं, बल्कि पूर्ण करने के लिए आया है।"
संघ प्रमुख ने कहा कि आरएसएस अपने स्वयंसेवकों की गतिविधियों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कोई नियंत्रण नहीं रखता है। उन्होंने कहा कि लोग अक्सर यह मान लेते हैं कि चूंकि आरएसएस के स्वयंसेवक कई क्षेत्रों में सक्रिय हैं, इसलिए वे कार्य आरएसएस के हैं, लेकिन यह गलत धारणा है।
भागवत ने कहा कि आरएसएस का मूल अर्थ शाखा प्रणाली है - एक घंटे की दैनिक शाखा, जिसमें शारीरिक व्यायाम और मानसिक अनुशासन शामिल होता है, जहां सभी जातियों और सामाजिक पृष्ठभूमि के लोग एक साथ काम करते हैं।
उन्होंने कहा कि यह शाखा प्रणाली राष्ट्र की बेहतरी के लिए लोगों के व्यक्तित्व को आकार देने में मदद करती है।
आरएसएस के आलोचकों के बारे में भागवत ने कहा कि वे भी समाज का हिस्सा हैं और स्वस्थ एवं ईमानदार आलोचना फायदेमंद है।
संघ प्रमुख ने कहा कि भारत में रहने वाला हर व्यक्ति हिंदू है और यह शब्द किसी विशिष्ट रीति-रिवाज या अनुष्ठान से जुड़े धर्म को नहीं दर्शाता है, न ही यह किसी विशेष समुदाय का नाम है। उन्होंने कहा, "हिंदू संज्ञा नहीं, बल्कि विशेषण है।"
इस दावे पर प्रतिक्रिया देते हुए कि हिंदू शब्द बाहरी लोगों ने गढ़ा था, भागवत ने कहा कि बाबर के आक्रमण के दौरान गुरु नानक ने इस शब्द का इस्तेमाल किया था।
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि जब किसी को मुसलमान कहा जाता है, तो इसका अर्थ अल्लाह, कुरान और पैगंबर के प्रति सम्मान होता है। उन्होंने कहा कि लेकिन भारत में वैष्णव, शैव, जैन, बौद्ध और कई लोग थे, फिर भी गुरु नानक ने उन सभी को हिंदू बताया।
भागवत ने कह कि भारतीय मुसलमान और ईसाई अन्य जगहों के मुसलमानों और ईसाइयों से इस मायने में अलग हैं कि उनकी जड़ें इस भूमि में गहराई से समाई हुई हैं, जो उनके व्यवहार को आकार देती है।
उन्होंने कहा कि भारत एक ऐसी महाशक्ति बनने की आकांक्षा नहीं रखता है, जो बलपूर्वक दुनिया को नियंत्रित करे।
भागवत ने कहा, "हम आज ऐसी शक्तियों को देख रहे हैं।"
उन्होंने कहा, "भारत का लक्ष्य प्रभुत्व या भाषणबाजी के बजाय उदाहरण के माध्यम से नेतृत्व करके 'विश्वगुरु' बनना है।"
भाषा पारुल पवनेश
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