नौ-सदस्यीय संविधान पीठ धार्मिक स्थलों पर महिलाओं से भेदभाव संबंधी याचिकाओं पर सुनवाई करेगी
सुरेश
- 16 Feb 2026, 09:40 PM
- Updated: 09:40 PM
नयी दिल्ली, 16 फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि नौ-सदस्यीय संविधान पीठ केरल के शबरिमला मंदिर सहित विभिन्न धर्मों में और धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव से संबंधित याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई सात अप्रैल से शुरू करेगी।
सितंबर 2018 में, पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए उस प्रतिबंध को हटा दिया था, जो 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं को केरल के शबरिमला स्थित अय्यप्पा मंदिर में प्रवेश करने से रोकता था। शीर्ष अदालत ने कहा था कि सदियों पुरानी यह हिंदू धार्मिक प्रथा अवैध और असंवैधानिक है।
बाद में 14 नवंबर 2019 को, तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली एक अन्य पांच-सदस्यीय पीठ ने 3:2 के बहुमत से, विभिन्न उपासना स्थलों पर महिलाओं से भेदभाव के मुद्दे को एक वृहद पीठ के पास भेज दिया।
उस समय पीठ ने विभिन्न धर्मों की स्वतंत्रता से संबंधित व्यापक मुद्दे निर्धारित करते हुए कहा था कि विशिष्ट मामले के तथ्यों के बिना इन पर निर्णय नहीं लिया जा सकता।
शबरिमला मामले के अलावा, फैसले में मुस्लिम महिलाओं के मस्जिदों और दरगाहों में प्रवेश और गैर-पारसी पुरुषों से विवाहित पारसी महिलाओं को अज्ञारी के पवित्र अग्निस्थल में प्रवेश से प्रतिबंधित किए जाने के मुद्दों को भी वृहद पीठ के समक्ष संदर्भित किया गया था।
एक अन्य पीठ ने 11 मई 2020 को फैसला सुनाया कि शबरिमला मंदिर प्रवेश मामले में समीक्षा क्षेत्राधिकार के तहत अपनी सीमित शक्ति का प्रयोग करते हुए, उसकी पांच-सदस्यीय पीठ के पास विधि संबंधी प्रश्नों को निर्णय के लिए एक बड़ी पीठ को भेजने का अधिकार है।
इसके बाद, कोविड महामारी के कारण लगभग पांच वर्षों तक इन मामलों पर सुनवाई नहीं हो सकी और बाद में अन्य तत्कालीन प्रधान न्यायाधीशों ने भी इन पर सुनवाई नहीं की।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने कहा कि यह पीठ सात अप्रैल को विभिन्न याचिकाओं पर महत्वपूर्ण सुनवाई शुरू करेगी और उसे 22 अप्रैल तक पूरा करेगी।
प्रधान न्यायाधीश ने संबद्ध पक्षों को 14 मार्च या इससे पहले अपनी लिखित दलीलें दाखिल करने को कहा।
केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि उन्होंने शबरिमला से संबंधित उस फैसले पर पुनर्विचार के अनुरोध का समर्थन किया है, जिसमें केरल के इस पर्वतीय मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी गई थी।
शबरिमला फैसले की समीक्षा का समर्थन करने वाले पक्षों के लिए पीठ ने वकील कृष्ण कुमार सिंह को नोडल अधिवक्ता नियुक्त किया।
वहीं, फैसले की समीक्षा का विरोध करने वालों के लिए शाश्वती परी को नोडल अधिवक्ता बनाया गया है।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ''हम यह उचित समझते हैं कि वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर और शिवम सिंह को 'न्याय मित्र' नियुक्त किया जाए। सिंह इस न्यायालय के समक्ष सभी पक्षों के विचार प्रस्तुत करेंगे।''
आदेश में कहा गया, ''नौ-सदस्यीय पीठ सात अप्रैल 2026 को सुबह 10:30 बजे शबरिमला मामले में पुनर्विचार याचिकाओं की सुनवाई शुरू करेगी। पुनर्विचार याचिकाकर्ताओं या उनके समर्थकों के पक्ष को सात अप्रैल से नौ अप्रैल तक सुना जाएगा। पुनर्विचार याचिकाओं का विरोध करने वालों की सुनवाई 14 से 16 अप्रैल तक होगी। यदि कोई प्रतिवाद प्रस्तुत करना हो तो उसकी सुनवाई 21 अप्रैल, 2026 को होगी, जिसके बाद न्याय-मित्र द्वारा अंतिम और निर्णायक अभ्यावेदन दिए जाएंगे... जिसके 22 अप्रैल तक पूरा होने की उम्मीद है।''
पीठ ने दोनों पक्षों के वकीलों को समय-सीमा का पालन करने का निर्देश दिया।
इससे पहले, पीठ ने धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे पर तैयार किए गए सात प्रश्न पढ़कर सुनाए।
यह उल्लेख करते हुए कि न्यायालय तैयार किए गए प्रश्नों में कुछ जोड़ने या हटाने के लिए तैयार है, पीठ ने कहा कि वह इस पर विचार करेगी कि ''संविधान के अनुच्छेद 25 के अंतर्गत धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार का दायरा और सीमा क्या है?''
पीठ ने दूसरे मुद्दे के बारे में कहा, ''संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत व्यक्तियों के अधिकारों और अनुच्छेद 26 के तहत धार्मिक संप्रदायों के अधिकारों के बीच क्या परस्पर संबंध है?''
तीसरा प्रश्न यह है कि क्या अनुच्छेद 26 के तहत किसी धार्मिक संप्रदाय के अधिकार लोक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अलावा अन्य मौलिक अधिकारों के अधीन हैं।
चौथा प्रश्न यह है कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के अंतर्गत 'नैतिकता' शब्द का दायरा और विस्तार क्या है तथा क्या इसमें संवैधानिक नैतिकता भी शामिल है?
पीठ ने कहा कि वह संविधान के अनुच्छेद 25 के अंतर्गत वर्णित धर्म के पालन के संबंध में ''न्यायिक समीक्षा के दायरे और विस्तार'' की भी जांच करेगी।
छठा प्रश्न है, ''संविधान के अनुच्छेद 25(2)(ख) में प्रयुक्त अभिव्यक्ति 'हिंदुओं के वर्ग' का क्या अर्थ है?''
शीर्ष अदालत ने कहा कि वह सातवें प्रश्न के रूप में इस बात की जांच करेगी कि क्या कोई व्यक्ति जो किसी धार्मिक संप्रदाय या धार्मिक समूह से संबंधित नहीं है, जनहित याचिका (पीआईएल) दायर कर उस ''धार्मिक संप्रदाय या धार्मिक समूह'' की किसी प्रथा पर सवाल उठा सकता है।
शबरिमला मामले के अलावा, फैसले में मुस्लिम महिलाओं के मस्जिदों और दरगाहों में प्रवेश तथा गैर-पारसी पुरुषों से विवाहित पारसी महिलाओं को अज्ञारी के पवित्र अग्निस्थल में प्रवेश से प्रतिबंधित किए जाने के मुद्दों को भी वृहद पीठ के समक्ष संदर्भित किया गया था।
भाषा सुभाष सुरेश
सुरेश
1602 2140 दिल्ली