न्यायालय ने मुफ्त सुविधा संस्कृति की आलोचना की, कहा-राज्यों को रोजगार के अवसर पैदा करने चाहिए
माधव
- 19 Feb 2026, 09:48 PM
- Updated: 09:48 PM
नयी दिल्ली, 19 फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने चुनावों से पहले लोगों को मुफ्त सुविधाएं देने की संस्कृति की कड़ी आलोचना करते हुए बृहस्पतिवार को कहा कि देश के आर्थिक विकास में बाधा डालने वाली ऐसी नीतियों पर पुनर्विचार करने का समय आ गया है।
इस बात पर गौर करते हुए कि इस तरह के लोकलुभावन कदमों का वित्तीय बोझ सीधे तौर पर करदाताओं के कंधों पर पड़ता है, प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने पूछा, ''लेकिन यह पैसा जो राज्य सरकार अभी देने की बात कह रही है, उसका भुगतान कौन करेगा? यह तो करदाताओं का पैसा है।''
'तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड' ने एक याचिका दायर कर उपभोक्ताओं की वित्तीय स्थिति पर गौर किए बिना हर किसी को नि:शुल्क बिजली प्रदान करने का प्रस्ताव दिया है।
प्रधान न्यायाधीश ने पूछा, ''इस बात को समझना स्वाभाविक है कि जब कुछ लोग खर्च वहन नहीं कर सकते, तो आपको उनकी मदद करनी होगी।
ऐसे बच्चे भी हैं जो शिक्षा का खर्च वहन नहीं कर सकते, इसलिए राज्य को शिक्षा प्रदान करनी चाहिए। यह राज्य का कर्तव्य है। कुछ बच्चे प्रतिभाशाली तो हैं, लेकिन मेडिकल कॉलेजों में पढ़ने का खर्च वहन नहीं कर सकते। सरकार को उनकी मदद करनी चाहिए। लेकिन जो लोग सुविधाओं का खर्च वहन कर सकते हैं, उनके पास सभी साधन उपलब्ध हैं और वे धनी हैं, इसलिए किसी भी प्रकार की मुफ्त सुविधा सबसे पहले उनकी जेब में जाती है। क्या राज्यों के लिए इन नीतिगत ढांचों पर पुनर्विचार करने का यह सही समय नहीं है?
पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली भी शामिल थे।
प्रधान न्यायाधीश ने पूछा, ''अब समय आ गया है कि सभी राजनीतिक नेताओं, पार्टियों और सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं को हर चीज पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। अगर हम इसी तरह मुफ्त सुविधाएं देते रहे तो राष्ट्र के विकास में बाधा उत्पन्न होगी। संतुलन होना जरूरी है। लेकिन यह सिलसिला कब तक चलेगा?''
बिजली वितरण कंपनी ने विद्युत संशोधन नियम, 2024 के एक नियम को चुनौती दी है।
विवादित नियम के अनुसार, बिजली आपूर्ति की स्वीकृत लागत और उपभोक्ताओं से वास्तव में वसूले गए शुल्क के बीच का अंतर तीन प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए और ऐसे अंतर को एक निश्चित समय सीमा के भीतर पूरा किया जाना चाहिए।
द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) शासित तमिलनाडु में इस साल विधानसभा चुनाव प्रस्तावित है।
इस याचिका पर केंद्र और अन्य को नोटिस जारी करने वाले उच्चतम न्यायालय ने कहा कि यदि राज्य जरूरतमंद गरीबों की मदद करते हैं तो यह पूरी तरह से समझ में आता है।
पीठ ने कहा, ''हां, कुछ लोग इसे वहन नहीं कर सकते। कुछ लोग शिक्षा या बुनियादी जीवन यापन की जरूरतों को पूरा नहीं कर सकते। जी हां, यह सरकार का कर्तव्य है कि वह सुविधाएं प्रदान करे। लेकिन जो लोग मुफ्त सुविधाओं का लाभ सबसे पहले उठा रहे हैं, क्या यह ऐसा मुद्दा नहीं है जिस पर ध्यान देने की जरूरत है?''
इसने कहा, ''देश के ज्यादातर राज्य राजस्व घाटे वाले राज्य हैं, फिर भी वे विकास की अनदेखी करते हुए इस तरह की मुफ्त सुविधाएं दे रहे हैं।''
पीठ ने कहा, ''राज्यों को रोजगार के रास्ते खोलने के लिए काम करना चाहिए। अगर आप सुबह से शाम तक मुफ्त भोजन देना शुरू कर देंगे, फिर मुफ्त साइकिल, मुफ्त बिजली देंगे, तो कौन काम करेगा और फिर कार्य संस्कृति का क्या होगा।''
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ''हम यहां सिर्फ तमिलनाडु की बात नहीं कर रहे हैं। हम पूरे भारत की बात कर रहे हैं। हम किस तरह की संस्कृति विकसित कर रहे हैं? बिजली का बिल चुकाने में सक्षम व्यक्तियों और हाशिए पर रहने वाले व्यक्तियों के बीच क्या अंतर है? यह समझना स्वाभाविक है कि एक कल्याणकारी कदम उठाते हुए आप हाशिए पर रहने वाले लोगों को राहत प्रदान करना चाहते हैं। लेकिन जो वहन कर सकते हैं और जो नहीं कर सकते, उनमें भेद किए बिना आप वितरण शुरू कर देते हैं। क्या यह तुष्टीकरण की नीति नहीं होगी?''
उन्होंने कहा कि इन लोकलुभावन उपायों के कारण, ज्यादातर राज्य सरकारें केवल दो ही कार्य कर रही हैं: सरकारी सहायता राशि का वितरण करना और वेतन का भुगतान करना, और अस्पतालों और अच्छी सड़कों के निर्माण जैसे अन्य सभी विकास कार्यों को दरकिनार कर दिया गया है।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ''राज्य सरकारों को रोजगार पैदा करना चाहिए, सड़कें और अस्पताल बनाने चाहिए ताकि गरीबों को बचाया जा सके... लेकिन कल्याणकारी योजनाओं के नाम पर हम सभी को नकद, मुफ्त राशन, मुफ्त केरोसिन, मुफ्त साइकिल दे रहे हैं।''
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि कुछ राज्यों में, बड़े जमींदारों को भी मुफ्त बिजली मिलती है, जिससे वे बिना किसी लागत के रोशनी और मशीनें चला सकते हैं। उन्होंने कहा, ''यदि आप कोई सुविधा चाहते हैं, तो आपको उसके लिए भुगतान करना होगा।''
तमिलनाडु की फर्म की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमण्यम ने कहा कि संसाधनों के आवंटन में समानता होनी चाहिए और राजस्व और व्यय के बीच बढ़ता अंतर शासन का मामला है।
न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने राजकोषीय नियोजन और नियामक प्रक्रियाओं, विशेष रूप से बिजली सब्सिडी के संदर्भ में, चिंता व्यक्त की।
न्यायमूर्ति बागची ने बिजली आयोगों जैसे वैधानिक नियामकों द्वारा शुल्क तय किए जाने के बाद सरकारों के हस्तक्षेप को लेकर भी चिंता व्यक्त की।
भाषा
देवेंद्र माधव
माधव
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