यदि नियोक्ता की जानकारी से बीमा शर्तों का उल्लंघन हुआ तो वही उत्तरदायी: उत्तराखंड उच्च न्यायालय
खारी
- 19 Feb 2026, 10:52 PM
- Updated: 10:52 PM
नैनीताल, 19 फरवरी (भाषा) उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि बीमा पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन नियोक्ता की जानकारी और सहमति से हुआ हो तो दुर्घटना की स्थिति में बीमा कंपनी को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता और ऐसे मामलों में मुआवजा नियोक्ता को ही देना होगा।
न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित के इस फैसले से बीमा कंपनी को राहत मिली, जबकि मृतक चालक के परिवार के लिए 17 वर्ष बाद मुआवजा पाने का रास्ता साफ हो गया।
डंपर दुर्घटना में चालक की मृत्यु से जुड़े मामले में याचिकाकर्ता कंपनी की अपील खारिज करते हुए अदालत ने कहा कि गढ़वाल आयुक्त द्वारा पारित मुआवजा आदेश में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है।
मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता भक्ति राम ने दावा किया कि उनका 22 वर्षीय पुत्र मनीष कुमार देवभूमि कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड में डंपर चालक के तौर पर काम करता था। 20 मार्च 2009 की मध्यरात्रि ऋषिकेश-श्रीनगर मार्ग पर डंपर गहरी खाई में गिर गया, जिससे उसकी मौके पर ही मृत्यु हो गई।
घटना के सबंध में मामला देवप्रयाग थाने में दर्ज किया गया।
कर्मचारी मुआवजा अधिनियम के तहत दायर याचिका में परिवार ने मनीष पर अपनी आर्थिक निर्भरता का हवाला देते हुए मुआवजे की मांग की थी।
वाहन के स्वामित्व वाली कंपनी ने स्वीकार किया कि दुर्घटना ड्यूटी के दौरान हुई, लेकिन कहा कि चूंकि वाहन का बीमा किया हुआ था, इसलिए भुगतान की जिम्मेदारी बीमा कंपनी की है।
बीमा कंपनी ने तर्क दिया कि मनीष के पास भारी वाहन चलाने का वैध लाइसेंस नहीं था। जांच में आयुक्त ने पाया कि उसके पास केवल हल्के वाहन का लाइसेंस था और उसे भारी डंपर चलाने देना नियोक्ता की लापरवाही थी।
इस आधार पर बीमा कंपनी को दायित्व से मुक्त कर दिया गया और पूरा मुआवजा वाहन मालिक पर डाल दिया गया।
उच्चतम न्यायालय के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि जब बीमा शर्तों का उल्लंघन नियोक्ता की जानकारी या अनुमति से होता है, तो बीमा कंपनी जिम्मेदार नहीं होती।
अदालत ने माना कि आयुक्त के निष्कर्ष विधिसम्मत हैं और मुआवजे की गणना भी सही है।
आयुक्त ने मूल मुआवजा 4,48,000 रुपये तय किया था, जिस पर दो वर्ष नौ माह के लिए आठ प्रतिशत साधारण ब्याज जोड़कर कुल राशि 5,46,560 रुपये हो गई।
उच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि अर्जित ब्याज सहित पूरी राशि तुरंत दावेदार भक्ति राम को दी जाए और यदि कोई पूर्व भुगतान हुआ हो तो उसका विधिवत समायोजन किया जाए।
भाषा सं दीप्ति खारी
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