छत्तीसगढ़: अदालत ने 'धोखाधड़ी' मामले में पूर्व भारतीय क्रिकेटर राजेश चौहान के खिलाफ जांच के आदेश दिए
सुरेश
- 22 Jul 2026, 06:36 PM
- Updated: 06:36 PM
दुर्ग, 22 जुलाई (भाषा) छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले की एक अदालत ने पुलिस को पूर्व भारतीय क्रिकेटर राजेश चौहान के खिलाफ जांच करने का निर्देश दिया है। उनपर आरोप है कि उन्होंने एक व्यक्ति को इस्पात कंपनी में परिवहन ठेका दिलाने का झांसा देकर 15 लाख रुपये से अधिक की ठगी की।
न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी ऐश्वर्या दीवान ने 16 जुलाई को पारित आदेश में शिकायतकर्ता दिनकर विश्वामित्र की ओर से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 175(3) के तहत दायर अर्जी स्वीकार कर ली। अदालत ने मोहन नगर पुलिस को कानूनी प्रक्रिया के तहत जांच करने और अंतिम रिपोर्ट अदालत में पेश करने का निर्देश दिया।
आवेदन के अनुसार, चौहान ने विश्वामित्र से खुद का परिचय एक पूर्व अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर के रूप में कराया और बताया कि कुछ प्रमुख उद्योगपतियों से उनके करीबी संबंध हैं। उन्होंने दावा किया कि उनकी फर्म गोविंद ट्रांसपोर्ट कंपनी को ओडिशा के क्योंझर जिले में जिंदल स्टील लिमिटेड से लौह अयस्क और लंप्स के परिवहन का ठेका मिला है।
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि चौहान ने भारी मुनाफे का भरोसा दिलाया और साझेदार के रूप में ट्रक लगाकर परिवहन कारोबार में निवेश करने के लिए उसे राजी किया।
आवेदन में कहा गया है कि अपने दावों के समर्थन में चौहान ने उसे जिंदल स्टील लिमिटेड की ओर से कथित रूप से गोविंद ट्रांसपोर्ट कंपनी के पक्ष में जारी कार्यादेश के दस्तावेज भी दिखाए।
दस्तावेजों को असली मानते हुए विश्वामित्र ने 30 जुलाई, 2021 को चौहान के साथ एक समझौता किया और चेक के माध्यम से 2.51 लाख रुपये का भुगतान किया।
आवेदन में कहा गया है कि इसके बाद प्रस्तावित परिवहन कारोबार के लिए उन्होंने दो किस्तों में गोविंद ट्रांसपोर्ट कंपनी के बैंक खाते में 15.01 लाख रुपये हस्तांतरित किए।
आवेदन में आरोप लगाया गया है कि जब चौहान ने संतोषजनक जवाब देना बंद कर दिया तो विश्वामित्र ने जिंदल स्टील लिमिटेड से संपर्क किया। वहां उन्हें पता चला कि न तो चौहान और न ही गोविंद ट्रांसपोर्ट कंपनी को कभी कोई परिवहन ठेका दिया गया था। आवेदन में दावा किया गया है कि उन्हें दिखाया गया कार्यादेश फर्जी और मनगढ़ंत था।
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि मोहन नगर थाने और बाद में दुर्ग के पुलिस अधीक्षक को लिखित शिकायत देने के बावजूद कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई। इसके बाद उन्होंने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 175(3) के तहत अदालत का रुख किया।
अदालत ने आवेदन और अभिलेख पर उपलब्ध दस्तावेजों का परीक्षण करने के बाद कहा कि उपलब्ध सामग्री से संज्ञेय अपराध का संकेत मिलता है और शिकायतें दिए जाने के बावजूद पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की।
अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसी सामग्री मौजूद है, जिससे संकेत मिलता है कि प्रतिवादी ने शिकायतकर्ता के साथ कथित तौर पर धोखाधड़ी कर उससे रुपये प्राप्त किए। ऐसे में पुलिस जांच कराना आवश्यक है।
संपर्क किए जाने पर चौहान ने 'पीटीआई-भाषा' से कहा कि यह विवाद कारोबारी प्रकृति का है।
उन्होंने कहा, ''शिकायतकर्ता के कुछ रुपये पहले ही लौटाए जा चुके हैं, जबकि शेष राशि का भुगतान व्यक्तिगत परिस्थितियों के कारण विलंबित हुआ है।''
दुर्ग के पुलिस अधीक्षक विजय अग्रवाल ने कहा कि पुलिस को अभी अदालत का आदेश प्राप्त नहीं हुआ है।
उन्होंने कहा, ''अदालत का आदेश मिलने के बाद मामले की जांच की जाएगी और कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।''
भाषा तान्या सुरेश
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