छत्तीसगढ़ वेदांता पावर प्लांट धमाका: मृतकों के परिजनों के पास अब दुख और यादें ही शेष
राजकुमार
- 15 Apr 2026, 10:22 PM
- Updated: 10:22 PM
सक्ती, 15 अप्रैल (भाषा) छत्तीसगढ़ के सक्ती जिले में मंगलवार को वेदांता विद्युत संयंत्र में हुए हादसे में जान गंवाने वाले पश्चिम बंगाल निवासी शेख सैफुद्दीन (40) ने परिवार से जल्द ही वापस लौटने और विधानसभा चुनाव में वोट डालने का वादा किया था, जो अब कभी पूरा नहीं हो सकेगा।
छत्तीसगढ़ के सक्ती जिले के सिंघीतराई गांव में स्थित वेदांता विद्युत संयंत्र में हुए भीषण धमाके में मारे गए 20 मजदूरों में सैफुद्दीन भी शामिल थे। इस घटना ने कई राज्यों में कई परिवारों को उजाड़ दिया है।
सैफुद्दीन के भाई रफीक ने बताया, ''हमारे गांव के किसी व्यक्ति ने मुझे बताया कि सैफुद्दीन की तबीयत खराब है और वह आईसीयू में भर्ती हैं। मैं आधी रात को कार से निकला और बुधवार दोपहर तक यहां पहुंच गया। जब तक मैं यहां पहुंचा तब तक सैफुद्दीन इस दुनिया से जा चुके थे।''
सैफुद्दीन पश्चिम बंगाल के पूर्वी मेदिनीपुर जिले के हल्दिया के रहने वाले थे।
आठवीं कक्षा तक पढ़ाई करने वाले सैफुद्दीन ने अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए मजदूरी करते हुए जम्मू से लेकर केरल और ओडिशा तक देश के विभिन्न हिस्सों में कई साल बिताए थे।
रफीक ने बताया कि वह कुछ ही महीने पहले छत्तीसगढ़ आए थे, जहां वह महीने के 20 से 25 हजार रुपये कमा रहे थे।
उनकी पत्नी का दो साल पहले बीमारी के कारण निधन हो गया था। उसके बाद अकेले उनके ही कंधों पर अपने दो बच्चों - 18 साल की बेटी और 17 साल के बेटे - की परवरिश की जिम्मेदारी आ गई थी। दोनों बच्चे अभी पढ़ाई ही कर रहे हैं।
रफीक ने संवाददाताओं को बताया कि हाल में उन्होंने अपने बेटे के 'अपेंडिक्स' के 'ऑपरेशन' पर पांच हजार रुपये खर्च किए थे।
उन्होंने बताया, ''उन्होंने उनसे बस दो दिन पहले ही बात की थी। उन्होंने अपने बच्चों से वादा किया था कि बंगाल में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले वह वोट डालने और उनके साथ समय बिताने के लिए घर आएंगे। अब वह कभी वापस नहीं आएंगे।''
रफीक ने बताया कि सरकार को कम से कम उनके बच्चों की पढ़ाई में मदद करनी चाहिए और उन्हें सरकारी नौकरी देनी चाहिए।
मारे गए मज़दूरों में से पांच पश्चिम बंगाल के थे, जो रोज़ी-रोटी की तलाश में अपने घर से बहुत दूर आए थे।
बिहार के भागलपुर के संतोष कुमार के लिए, यह दुख और परिवार में एक और गम लेकर आया।
उन्होंने बताया, ''हमने इस हफ़्ते की शुरुआत में ही अपने चाचा को खोया था। अब भाई रितेश भी हमें छोड़कर चला गया।''
संतोष कहा, ''42 साल के रितेश कुमार ने तीन महीने पहले ही इस संयंत्र में काम शुरू किया था और अपने तीन बच्चों को अच्छी शिक्षा देने का सपना देखा था। अब वह उन्हें बड़ा होते देखने के लिए मौजूद नहीं होंगे।''
इस घटना के बाद, अफ़रा-तफ़री और दुख ने परिवारों की तकलीफ़ और बढ़ा दी। कई लोग अपने प्रियजनों की तलाश में एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल भटकते रहे।
सानी कुमार अनंत ने रायगढ़ के पांच अस्पतालों में अपने भाई, 29 साल के रामेश्वर महिलांगे की तलाश में घंटों बिताए। रामेश्वर भी इस हादसे में मारे गए लोगों में शामिल हैं।
अनंत ने कहा,''कोई मुझे कुछ भी नहीं बता पाया। उनका एक छोटा बच्चा है। अब उनके परिवार की देखभाल कौन करेगा?''
झारखंड से घटना की खबर सुनकर तुरंत रायगढ़ पहुंचे उदय राम को भी ऐसी ही मुश्किल का सामना करना पड़ा।
उनके दामाद, उत्तर प्रदेश के रहने वाले बृजेश कुमार ने मार्च में ही इस संयंत्र में काम शुरू किया था और बृजेश के एक और दो साल के दो छोटे बच्चे हैं।
उदय राम ने बताया, ''हमें बताया गया था कि वह रायगढ़ के जिंदल अस्पताल में हैं। जब हम वहां गए, तो हमें बताया गया कि उनके शव को रायगढ़ मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भेज दिया गया है। लेकिन वहां भी, किसी ने हमें कुछ नहीं बताया।''
प्रत्यक्षदर्शियों ने धमाके के उस पल को किसी प्रलय से कम नहीं बताया।
पश्चिम बंगाल के एक पेंटर, अजीत दास कर ने कहा कि धमाका ऐसा लगा "जैसे कोई मिसाइल आकर गिरी हो।" कुछ ही सेकंड में पूरे इलाके में घना धुआं फैल गया।
कर ने बताया, ''हमने अभी-अभी अपना दोपहर का खाना खत्म ही किया था कि यह हादसा हो गया। हम करीब 17 मीटर की ऊंचाई पर काम कर रहे थे। धमाका नीचे बॉयलर से हुआ था। मैं एक अलमारी के अंदर छिपकर बच गया। जो लोग नीचे थे, वे बुरी तरह जल गए थे। मैं अपनी पूरी ज़िंदगी इस घटना को कभी नहीं भूलूंगा।''
भाषा सं संजीव राजकुमार
राजकुमार
1504 2222 सक्ती