बिहार : प्रवासी श्रमिकों के शव पैतृक गांव पहुंचाने का मुद्दा विधानसभा में उठा
शफीक
- 18 Feb 2026, 02:57 PM
- Updated: 02:57 PM
पटना, 18 फरवरी (भाषा) बिहार विधानसभा में बुधवार को प्रवासी श्रमिकों के अधिकारों और सामाजिक सुरक्षा को लेकर उस समय तीखी राजनीतिक बहस छिड़ गई, जब असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की मौत के बाद उनके पार्थिव शरीर को सरकारी खर्च पर पैतृक गांव तक पहुंचाने का मुद्दा जोरदार तरीके से उठाया गया।
यह मुद्दा केवल मानवीय संवेदनाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सामाजिक सुरक्षा नीति, प्रवासी श्रमिकों के अधिकार और सरकार की जिम्मेदारी जैसे बड़े सवालों को केंद्र में ले आया।
सदन की कार्यवाही के दौरान ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के प्रदेश अध्यक्ष और विधायक अख्तरुल ईमान ने कहा कि बिहार से बड़ी संख्या में मजदूर रोजगार की तलाश में देश के विभिन्न राज्यों और विदेशों तक जाते हैं।
उन्होंने कहा कि जोखिम भरे काम और असंगठित क्षेत्र की असुरक्षित परिस्थितियों के कारण कई बार दुर्घटनाएं होती हैं और मजदूरों की मौत हो जाती है। ऐसे मामलों में गरीब परिवारों के सामने सबसे बड़ी समस्या पार्थिव शरीर को घर तक लाने की होती है, क्योंकि इसमें भारी आर्थिक खर्च आता है।
ईमान ने सरकार से मांग की कि मानवीय आधार पर ऐसी व्यवस्था बनाई जाए, जिससे मृतक मजदूरों के शव को सरकारी खर्च पर उनके पैतृक गांव तक पहुंचाया जा सके।
सरकार की ओर से जवाब देते हुए श्रम संसाधन मंत्री संजय टाइगर ने कहा कि वर्तमान विभागीय नियमों में स्वाभाविक मौत के मामलों में शव को पैतृक आवास तक पहुंचाने का कोई प्रावधान नहीं है। मंत्री के इस बयान के बाद विपक्ष ने इसे सरकार की संवेदनहीनता बताते हुए जोरदार विरोध दर्ज कराया।
अख्तरुल ईमान ने सरकार पर कटाक्ष करते हुए कहा कि यदि सरकार चाह ले तो नया प्रावधान बनाना मुश्किल नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि गरीब मजदूरों के परिवार आर्थिक रूप से कमजोर होते हैं और कई बार शव को घर तक लाने में लाखों रुपये तक खर्च हो जाते हैं।
उन्होंने भावुक अंदाज में कहा कि जरूरत पड़े तो विधायकों का वेतन रोककर भी मजदूरों की मदद की जा सकती है, लेकिन सरकार को मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
इस मुद्दे पर राष्ट्रीय जनता दल के विधायकों ने भी सरकार को घेरते हुए कहा कि चुनाव के समय प्रवासी मजदूरों के लिए विशेष व्यवस्थाएं की जाती हैं, लेकिन जब उनकी मौत हो जाती है तो उनके परिवारों को अकेला छोड़ दिया जाता है। विपक्ष ने इसे नीति स्तर की कमी बताते हुए तत्काल ठोस व्यवस्था लागू करने की मांग की।
सदन में बढ़ते विवाद के बीच उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को हस्तक्षेप करना पड़ा। उन्होंने कहा कि विपक्ष द्वारा उठाया गया मुद्दा गंभीर और संवेदनशील है तथा सरकार इस पर भविष्य में विचार करेगी।
भाषा कैलाश मनीषा शफीक
शफीक
1802 1457 पटना