राज्यों के पास खदानों और खनिज संपन्न भूमि पर कर लगाने का विधायी अधिकार है : न्यायालय
देवेंद्र सुभाष
- 25 Jul 2024, 09:29 PM
- Updated: 09:29 PM
नयी दिल्ली, 25 जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को एक ऐतिहासिक फैसले में कहा कि राज्यों के पास खदानों और खनिज वाली भूमि पर कर लगाने का विधायी अधिकार है और खनिजों पर दी जाने वाली ‘रॉयल्टी’ कोई कर नहीं है। शीर्ष अदालत के इस फैसले से खनिज संपन्न राज्यों के राजस्व में भारी वृद्धि होगी।
न्यायालय की नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 8:1 के बहुमत के फैसले में कहा कि खनिजों पर देय ‘रॉयल्टी’ कर नहीं है।
पीठ ने कहा कि संसद के पास संविधान की सूची एक की प्रविष्टि 54 के तहत खनिज संपदा अधिकारों पर कर लगाने की विधायी शक्ति नहीं है।
इस फैसले में कहा गया कि हालांकि संसद अभी भी खनिज संपदा पर कर लगाने के राज्यों के अधिकारों की सीमा निर्धारित करने के लिए कानून बना सकती है।
प्रधान न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ ने अपने और पीठ के सात न्यायाधीशों के फैसले को पढ़ा जिसमें कहा गया कि संविधान की दूसरी सूची की प्रविष्टि 50 के अंतर्गत संसद को खनिज संपदा अधिकारों पर कर लगाने की शक्ति नहीं है।
शुरू में प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि पीठ ने दो अलग-अलग फैसले दिए हैं और न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना ने असहमति वाला फैसला दिया है।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने अपने असहमति वाले फैसले में कहा कि रॉयल्टी एक कर की तरह ही है और केंद्र के पास इसे लगाने का अधिकार है।
पीठ द्वारा अपना फैसला सुनाए जाने के बाद, विभिन्न राज्यों की ओर से उपस्थित वकीलों ने उससे आग्रह किया कि वह केन्द्र द्वारा अब तक खदानों और खनिजों पर लगाए गए हजारों करोड़ रुपये के करों की वसूली पर निर्णय ले।
उन्होंने न्यायालय से आग्रह किया कि वह अपने फैसले को पूर्वव्यापी प्रभाव से लागू करे ताकि केंद्र से करों की वापसी सुनिश्चित हो सके।
केंद्र की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने हालांकि इन दलीलों का कड़ा विरोध किया।
पीठ ने केंद्र और राज्यों से इस पहलू पर लिखित दलीलें दाखिल करने को कहा और कहा कि वह 31 जुलाई को इस मुद्दे पर फैसला करेगी।
दो सौ पृष्ठों का बहुमत वाला फैसला प्रधान न्यायाधीश ने स्वयं तथा न्यायमूर्ति ऋषिकेश रॉय, न्यायमूर्ति अभय एस. ओका, न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला, न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा, न्यायमूर्ति उज्ज्ल भुइयां, न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की ओर से लिखा था।
बहुमत के फैसले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि वर्ष 1989 में सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ द्वारा दिया गया वह फैसला सही नहीं है जिसमें कहा गया था कि खनिजों पर ‘रॉयल्टी’ कर है।
रॉयल्टी वह भुगतान है जो उपयोगकर्ता पक्ष बौद्धिक संपदा या अचल संपत्ति परिसंपत्ति के मालिक को देता है।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने बहुमत के फैसले से असहमति जताई। हालांकि वह प्रधान न्यायाधीश से इस बात को लेकर सहमत थी कि सूची 2 की प्रविष्टि 50 के अंतर्गत ‘‘किसी सीमा’’ की अभिव्यक्ति का दायरा इतना व्यापक है कि इसमें संसद द्वारा कानून बनाकर प्रतिबंध, शर्तें, सिद्धांत तथा निषेध लगाना भी शामिल है।
प्रविष्टि 49 के अंतर्गत, राज्यों को भूमि और भवनों पर कर लगाने का अधिकार है, जबकि प्रविष्टि 50 राज्यों को खनिज विकास पर कर लगाने की अनुमति देता है, लेकिन यह खनिज विकास से संबंधित संसद द्वारा कानून के तहत लगाई गई किसी भी सीमा के अधीन है।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम (एमएमडीआर), 1957 राज्य को खदानों एवं खनिजों पर कर लगाने से प्रतिबंधित नहीं करता है।
पीठ ने कहा, ‘‘एमएमडीआर अधिनियम में राज्य की कर लगाने की शक्तियों पर सीमाएं लगाने वाला कोई विशिष्ट प्रावधान नहीं है। एमएमडीआरए के तहत रॉयल्टी कर की प्रकृति में नहीं है।’’
इसने कहा, ‘‘राज्यों के पास खदानों, खनिजों और खनिज युक्त भूमि पर कर लगाने का विधायी अधिकार है।’’
पीठ ने इन विवादास्पद मुद्दे पर फैसला सुनाया कि क्या खनिजों पर देय ‘रॉयल्टी’ खान तथा खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम 1957 के तहत कर है। क्या केवल केंद्र को ही ऐसा कर लेने का अधिकार है या राज्यों को भी अपने क्षेत्र में खनिज युक्त भूमि पर कर लेने का अधिकार है।
उच्चतम न्यायालय की नौ न्यायाधीशों की पीठ ने इस जटिल मामले की सुनवाई 27 फरवरी को शुरू की थी, क्योंकि इस मुद्दे पर संविधान पीठ के दो विरोधाभासी फैसले थे।
भाषा
देवेंद्र