भगत सिंह की तस्वीरों के साये में दिल्ली के जंतर-मंतर पर जारी है युवाओं का आंदोलन
नरेश
- 23 Jul 2026, 05:31 PM
- Updated: 05:31 PM
नयी दिल्ली, 23 जुलाई (भाषा) ''क्रांति मानव जाति का एक अकाट्य अधिकार है। स्वतंत्रता सभी का एक कभी न मिटने वाला जन्मसिद्ध अधिकार है।'' शहीद भगत सिंह ने वर्ष 1929 के असेंबली बम कांड के मुकदमे के दौरान ये ऐतिहासिक शब्द कहे थे। लगभग एक सदी बाद, कुछ वैसी ही भावनाएं दिल्ली के जंतर-मंतर पर गूंज रही हैं, जहां उत्तर प्रदेश के प्रयागराज से आया 15 वर्षीय राज बिना किसी सामान, कपड़ों और घर लौटने की निश्चितता न होने के बावजूद यहां डटा हुआ है।
कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) के नेतृत्व में जारी आंदोलन में शामिल होने के लिए चार दिन पहले अपने घर से चुपचाप निकला राज उन्हीं कपड़ों में बाकी प्रदर्शनकारियों के साथ खाना खा रहा है।
साथी प्रदर्शनकारियों को ठंडा पानी और पेय पदार्थ बांटते हुए राज ने कहा, "मैं घर से भागकर आया हूं, इसलिए बैग नहीं ला सका। अगर मेरे परिवार को ज़रा भी भनक लगती, तो वे मुझे रोक लेते।"
राज देश के अलग-अलग हिस्सों से आए उन तमाम छात्रों और युवाओं में से एक है, जो अपने परिवारों से बात छिपाकर, रातों-रात ट्रेन या बसों में सफर करके जंतर-मंतर पहुंचे हैं। उनका मानना है कि जिस मकसद के लिए वे लड़ रहे हैं, वह उनके निजी जीवन से कहीं बड़ा है।
प्रयागराज की ही एक अन्य युवती ने न केवल अपनी योजना बल्कि अपनी पहचान भी छिपाई हुई है। उसने बताया कि उसके पिता, गांव के लोग और कई रिश्तेदार सत्तारूढ़ दल के समर्थक हैं। आंदोलन में शामिल होने पर परिवार के विरोध के डर से वह चेहरे पर मास्क पहनकर अपनी पहचान छिपा रही है।
उसने कहा, "मुझे डर तो लग रहा है। वे इस आंदोलन का समर्थन नहीं करेंगे। लेकिन जो हो रहा है वह गलत है। सरकार इस पर चुप क्यों है?"
इन युवाओं की अपनी कहानियों की तरह ही, वे जो प्रतीक अपने साथ लाए हैं, वे भी एक दास्तां बयां करते हैं। महीने भर से जारी इस आंदोलन में भगत सिंह, डॉ. बी.आर. आंबेडकर, चंद्रशेखर आजाद, सावित्रीबाई फुले और ज्योतिराव फुले जैसे महान क्रांतिकारियों और समाज सुधारकों की तस्वीरें केंद्रीय आकर्षण बनी हुई हैं।
सबसे प्रमुख दृश्यों में एक ऐसा बैनर शामिल है, जिस पर 1929 में भगत सिंह के जेल आंदोलन का उल्लेख है। सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली बम कांड के सिलसिले में जेल में रहने के दौरान उन्होंने राजनीतिक बंदी का दर्जा मांगने के लिए लंबी भूख हड़ताल की थी, जो ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ प्रतिरोध का एक बड़ा प्रतीक बन गई थी।
अपने मुकदमे के दौरान भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने कहा था कि उनके इस कदम का मकसद किसी की जान लेना नहीं, बल्कि बहरों के कानों तक अपनी आवाज पहुंचाना था।
जंतर-मंतर पर मौजूद कई युवा प्रदर्शनकारियों के लिए ये कहानियां सिर्फ इतिहास की किताबों के पन्ने नहीं, बल्कि प्रेरणा का स्रोत हैं।
मुंबई की एक किशोरी अपने माता-पिता को बताए बिना 20 जुलाई के संसद मार्च में हिस्सा लेने के लिए दिल्ली की ट्रेन में सवार हो गई। उसने बताया, "जब मैंने अपने परिवार को फोन कर बताया कि मैं आंदोलन में हूं, तो मां ने पूछा कि तुम्हें वहां जाने की इजाज़त किसने दी? पिता ने तुरंत वापस लौटने को कहा।"
लेकिन उसने लौटने से इनकार कर दिया और कहा, "मैंने उनसे साफ कह दिया कि मैं अपने अधिकारों के लिए लड़ूंगी।"
उसे नहीं पता कि वह कब तक दिल्ली में रहेगी, लेकिन उसका कहना है कि वह अपने हक की लड़ाई जारी रखेगी। उसके माता-पिता ने जेब खर्च बंद करने की चेतावनी भी दी है।
इस पर किशोरी का कहना है, "अगर पॉकेट मनी बंद हो जाएगी, तो मैं काम ढूंढ लूंगी। मुझे ग्राफिक डिजाइनिंग, आर्ट और वीडियो एडिटिंग आती है। मैं आत्मनिर्भर बनने की कोशिश कर रही हूं।"
वह 20 जुलाई के उस प्रदर्शन का भी हिस्सा थी जब पुलिस ने संसद की ओर बढ़ रहे मार्च को रोकने के लिए आंसू गैस और बल प्रयोग का सहारा लिया था। इसके बावजूद वह अगले ही दिन फिर से धरना स्थल पर लौट आई और 'इंकलाब जिंदाबाद' के नारे लगाने लगी।
भगत सिंह द्वारा अमर किया गया नारा 'इंकलाब जिंदाबाद' दिन में कई बार भीड़ में गूंजता है। यह प्रदर्शनकारियों की पहचान का हिस्सा बन चुका है। सोमवार को संसद मार्च के दौरान कॉजपा के संस्थापक अभिजीत दीपके 'इंकलाब जिंदाबाद' लिखी काली टी-शर्ट पहनकर प्रदर्शनकारियों के साथ चले।
हालांकि, इस आंदोलन के बीच कुछ परिवार अपने उन सदस्यों की तलाश में भी भटक रहे हैं जो घर वापस नहीं लौटे हैं। सोशल मीडिया पर 19 वर्षीय नीट अभ्यर्थी रोहिणी कुमार की गुमशुदगी के पोस्ट शेयर किए जा रहे थे, जो जंतर-मंतर पर पेंटिंग करने के लिए जानी जाती है। हालांकि बाद में एक अन्य पोस्ट में उसके सही-सलामत मिलने की पुष्टि की गई।
वहीं सीलमपुर के एक 33 वर्षीय व्यक्ति के मित्र रिज़वान ने बताया कि उसका दोस्त पिछले एक महीने से धरना स्थल पर डटा हुआ था और भूख हड़ताल पर था।
रिज़वान के अनुसार, "पुलिस ने सोमवार शाम करीब 4:30 बजे उसे हिरासत में लिया था, जिसके बाद से उसकी कोई जानकारी नहीं मिल पा रही है।"
ये व्यक्तिगत कहानियां सोमवार को हुए उस विशाल संसद मार्च की पृष्ठभूमि में सामने आई हैं, जब बार-बार होने वाले परीक्षा पेपर लीक के विरोध में और केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर हजारों की संख्या में युवा प्रदर्शनकारी मध्य दिल्ली की ओर बढ़े थे।
इस दौरान जब भीड़ आगे बढ़ी और कुछ अवरोधक तोड़ दिए गए, तो दिल्ली पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने मार्च को रोकने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़े और लाठीचार्ज किया था।
भाषा सुमित नरेश
नरेश
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