हिरासत में मारपीट मामला : अदालत ने चार पुलिस अधिकारियों को जारी समन खारिज किया
अविनाश
- 14 Jul 2026, 07:45 PM
- Updated: 07:45 PM
नयी दिल्ली, 14 जुलाई (भाषा) राष्ट्रीय राजधानी की एक अदालत ने मजिस्ट्रेट के उस आदेश को रद्द कर दिया है जिसमें दिल्ली पुलिस के एसीपी सहित चार अधिकारियों को थाने के भीतर एक व्यक्ति के साथ कथित तौर पर मारपीट के मामले में मुकदमे का सामना करने के लिए तलब किया गया था। अदालत ने कहा कि अधिकारियों की कथित गतिविधि 'कर्तव्य निर्वहन' के दौरान हुई।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सुभाष कुमार मिश्रा ने पुलिस अधिकारियों द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। अधिकारियों ने मजिस्ट्रेट अदालत द्वारा 22 अगस्त, 2023 को दिये उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 323 और 34 के तहत तलब किया गया था।
सत्र न्यायालय ने 11 जुलाई को दिये आदेश में कहा, ''इस मामले में भी, आरोपी ने कथित कृत्य एक दर्ज आपराधिक मामले की जांच के दौरान किए। इसलिए, ये काम 'ड्यूटी के दौरान' किए गए माने जाएंगे और इस वजह से, इन पर संज्ञान लेने के लिए भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 197 और दिल्ली पुलिस अधिनियम की धारा 140 के तहत मंजूरी की जरूरत थी।''
शिकायत के मुताबिक नवंबर 2012 में गीता कॉलोनी में सरकारी जमीन पर कथित कब्जे का विरोध करने पर पुलिसकर्मियों ने राम गोपाल की पिटाई की।
गोपाल ने दावा किया कि उसे पुलिस थाना ले जाया गया, बेहोश होने तक उसके साथ मारपीट की गई और बाद में अस्पताल ले जाया गया। शिकायतकर्ता का दावा है कि अस्पताल में भी पुलिस के प्रभाव के कारण उसका ठीक से इलाज नहीं किया गया। उसने यह भी आरोप लगाया कि उसके खिलाफ झूठी प्राथमिकी दर्ज की गई थी।
पुलिस अधिकारियों का पक्ष रखने के लिए पेश हुए अधिवक्ता निशांक मट्टू ने दलील दी कि आरोप झूठे हैं और जिन कथित कृत्यों की शिकायत की गई है, वे हर कसौटी पर आपराधिक मामले की जांच के दौरान आधिकारिक कर्तव्यों का पालन करते हुए किए गए थे।
गोपाल के वकील ने मट्टू की दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि हिरासत में हिंसा को सरकारी कर्तव्य का हिस्सा नहीं माना जा सकता, इसलिए इसके लिए पहले से मंजूरी लेने की जरूरत नहीं थी।
हालांकि, अदालत ने पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार करते हुए कहा कि शिकायतकर्ता को एक दर्ज प्राथमिकी की जांच के सिलसिले में थाना ले जाया गया था और कथित कृत्य 'ड्यूटी के दौरान' किये गए थें।
अदालत ने उच्चतम न्यायालय और दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि भले ही कोई सरकारी कर्मचारी अपने आधिकारिक कर्तव्यों के दायरे से बाहर जाकर काम करे, फिर भी अगर उस काम और आधिकारिक कार्यों के बीच कोई उचित संबंध हो, तो अभियोजन के लिए पहले से मंजूरी लेना आवश्यक है।
अदालत ने चार पुलिस अधिकारियों के खिलाफ समन जारी करने के आदेश को रद्द करते हुए कहा, '' सुनवाई अदालत ने ऐसी मंजूरी के बिना ही कथित अपराध का संज्ञान लिया और यह पुनरीक्षण याचिका दायर करने वालों को समन जारी कर दिया। इसलिए, पुनरीक्षण याचिका स्वीकार की जाती है और चुनौती दिये गए आदेश को रद्द किया जाता है।''
भाषा धीरज अविनाश
अविनाश
1407 1945 दिल्ली