अकाल तख्त के जत्थेदार 1990 के दशक की हिंसा के सभी पीड़ितों को अरदास में याद करें : बिट्टू
सुभाष
- 14 Jul 2026, 06:15 PM
- Updated: 06:15 PM
लुधियाना, 14 जुलाई (भाषा) केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने मंगलवार को अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज से अपील की कि वह 1990 के दशक में पंजाब में हुई हिंसा के सभी पीड़ितों को अपनी 'अरदास' में याद करें।
यह अपील उन सिख युवकों के लिए प्रस्तावित विशेष अरदास से पहले की गई है, जिनकी कथित न्यायेतर हत्याओं का मामला मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा ने उजागर किया था।
बिट्टू ने सोशल मीडिया मंच 'एक्स' पर लिखा, ''उस समय जो खून बहा था, वह केवल आतंकवादियों का नहीं था, न केवल पुलिस का और न ही सिर्फ निर्दोष नागरिकों का था। वह पंजाब का खून था, वह पंजाबियों का खून था।''
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता बिट्टू ने अभिनेता दिलजीत दोसांझ अभिनीत फिल्म 'सतलुज' पर सवाल उठाते हुए रविवार को कहा था कि इसमें ''निर्दोष हिंदुओं के नरसंहार'' और ''पंजाब पुलिस, सुरक्षाबलों तथा आतंकवाद के खिलाफ लड़ने वाले अनगिनत बहादुर नागरिकों के बलिदान'' को महत्व नहीं दिया गया है।
फिल्म को लेकर जारी विवाद के बीच, अकाल तख्त के जत्थेदार ने मंगलवार शाम हरिके पत्तन में सतलुज नदी के किनारे विशेष धार्मिक सभा बुलाकर उन सिख युवकों के लिए 'अरदास' करने का आह्वान किया था, जिनकी कथित न्यायेतर हत्याओं का मामला मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा ने उजागर किया था।
गड़गज ने कहा था कि अब तक पंजाब में सरकार और पुलिस की कथित ज्यादतियों के शिकार हुए ''निर्दोष युवकों, महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों'' के लिए सामूहिक 'अरदास' नहीं की गई है।
बिट्टू ने मंगलवार को 'एक्स' पर अपने पोस्ट में कहा कि पूरा पंजाब और दुनिया भर में बसे पंजाबी, जत्थेदार और उनकी अरदास की ओर देख रहे हैं।
केंद्रीय मंत्री ने कहा, ''जत्थेदार साहिब, आपसे विनम्र निवेदन है कि आज की अरदास में 1990 के दशक में पंजाब में हुए नरसंहार को भी याद करें।''
उन्होंने कहा कि चाहे वे हथियारबंद हों या निहत्थे, वर्दी में हों या आम नागरिक, जिन लोगों की जान गई वे सभी पंजाबी थे।
बिट्टू ने कहा, ''आज भी वे हजारों आत्माएं श्री अकाल तख्त साहिब की ओर देखकर सवाल करती हैं कि क्या कोई हमारी भी बात करेगा? क्या हमारे लिए भी कभी अरदास होगी?''
भाजपा नेता ने कहा कि उनकी यह अपील किसी एक समुदाय के लिए नहीं, बल्कि ''पंजाब, पंजाबियों और पंजाबियत'' के लिए है।
केंद्रीय मंत्री ने आग्रह किया कि हिंसा से प्रभावित प्रत्येक भाई, बहन और परिवार को याद किया जाए, ताकि ''जिनके खून से यह धरती लाल हुई'' उनकी आत्माओं को शांति मिल सके।
उन्होंने कहा, ''इस धरती का ऋण नफरत से नहीं चुकाया जा सकता। यह केवल अरदास से ही चुकाया जा सकता है, जत्थेदार साहिब।''
इससे पहले, जसवंत सिंह खालड़ा की पत्नी परमजीत कौर खालड़ा ने सोमवार को अकाल तख्त से 'पीपुल्स कमीशन' गठित करने की अपील की थी, ताकि 1980 और 1990 के दशक में पंजाब में लापता हुए लोगों, अज्ञात शवों तथा कथित फर्जी पुलिस मुठभेड़ों में मारे गए लोगों की वास्तविक संख्या का पता लगाया जा सके।
कौर की यह टिप्पणी फिल्म 'सतलुज' के प्रदर्शन और बाद में उसे ओटीटी मंच 'जी5' से हटाए जाने के बाद, खालड़ा मामले पर फिर से सार्वजनिक चर्चा शुरू होने के बीच आई। यह फिल्म पहले 'पंजाब 95' शीर्षक से बनाई गई थी और जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित है।
केंद्रीय मंत्री बिट्टू ने रविवार को कहा था कि फिल्म निर्माता विवादित दावों को स्थापित इतिहास के रूप में पेश करते हुए 'रचनात्मक स्वतंत्रता' की आड़ नहीं ले सकते।
पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के पोते बिट्टू ने कहा था कि पंजाब के दर्दनाक अतीत को किसी विशेष दृष्टिकोण के अनुरूप चुनिंदा ढंग से संपादित नहीं किया जा सकता।
बेअंत सिंह की 31 अगस्त 1995 को चंडीगढ़ स्थित उच्च सुरक्षा वाले सिविल सचिवालय में हत्या कर दी गई थी।
उन्होंने कहा कि पंजाब के लोगों को राज्य के सबसे काले अध्याय के चयनात्मक चित्रण पर जवाब मिलना चाहिए।
बिट्टू ने सवाल किया, ''आतंकवादियों द्वारा निर्दोष हिंदुओं, बस यात्रियों, दुकानदारों, सरकारी कर्मचारियों, मजदूरों और आम लोगों की नृशंस हत्याओं को उतनी ही प्रमुखता से क्यों नहीं दिखाया गया? आतंकवाद के खिलाफ लड़ने वाले पंजाब पुलिस के जवानों, सुरक्षाबलों और अनगिनत बहादुर नागरिकों के बलिदान को कमतर क्यों दिखाया गया? आतंकवादी हिंसा से तबाह हुए हजारों परिवारों को कहानी से लगभग पूरी तरह क्यों बाहर रखा गया?''
जसवंत सिंह खालड़ा का सितंबर 1995 में अमृतसर स्थित उनके घर के बाहर से कथित तौर पर अपहरण कर लिया गया था। बाद में उनकी हत्या किए जाने की पुष्टि हुई, हालांकि उनका शव कभी बरामद नहीं हुआ।
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1407 1815 लुधियाना