बैंक लापरवाही के आरोप पर वकील को 'सतर्कता सूची' में नहीं डाल सकतेः उच्चतम न्यायालय
अजय
- 07 Jul 2026, 06:33 PM
- Updated: 06:33 PM
नयी दिल्ली, सात जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि बैंक और भारतीय बैंक संघ (आईबीए) केवल पेशेवर लापरवाही के आरोपों के आधार पर वकीलों को 'सतर्कता बरतने की सूची' में नहीं डाल सकते हैं।
न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि अधिवक्ताओं को काली सूची में डालना बार काउंसिल के वैधानिक अनुशासनात्मक अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप के समान है।
पीठ ने कहा, "कानूनी पेशे की स्वतंत्रता न्यायपालिका की स्वतंत्रता जितनी ही महत्वपूर्ण है। असल में, कार्यपालिका और विधायिका से इसकी स्वतंत्रता ही विधि का शासन और लोकतंत्र की आधारशिला है।"
शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी वकील पर पेशेवर लापरवाही या कदाचार का आरोप है, तो बैंक को संबंधित राज्य बार काउंसिल के समक्ष मामला रखना चाहिए, जो अधिवक्ता अधिनियम के तहत उचित कार्रवाई कर सकती है।
इसके साथ ही पीठ ने कहा, ''केवल लापरवाही के आरोप के आधार पर किसी वकील का नाम सतर्कता सूची में डाल देना टिकाऊ नहीं है।... संबंधित बैंक एवं आईबीए को निर्देश दिया जाता है कि अपीलकर्ता वकील का नाम तत्काल प्रभाव से इस सूची से हटाया जाए।''
उच्चतम न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत न्यायिक समीक्षा का दायरा स्पष्ट करते हुए कहा कि रिट याचिका केवल 'राज्य' या उसके अंगों तक सीमित नहीं है, बल्कि 'किसी भी व्यक्ति या प्राधिकरण' के खिलाफ दायर की जा सकती है।
इस तरह शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस दृष्टिकोण को खारिज कर दिया कि आईबीए के 'राज्य' नहीं होने के कारण उसके खिलाफ रिट याचिका स्वीकार्य नहीं है।
पीठ ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) को निर्देश दिया कि वह वरिष्ठ एवं कनिष्ठ वकीलों और शिक्षा क्षेत्र के विशेषज्ञों की एक टीम गठित कर वकीलों के लिए 'राष्ट्रीय विधिक अकादमी' स्थापित करने के विचार पर विचार करे।
इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने बीसीआई से अपनी अनुशासनात्मक व्यवस्था का व्यापक मूल्यांकन कराने और इस संबंध में उठाए गए कदमों पर हलफनामा दाखिल करने को कहा।
अदालत ने यह भी कहा कि देश में लंबित मामलों की बढ़ती संख्या न्याय व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती है और इसे कम करने के लिए बार एवं बेंच दोनों की साझा जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।
यह मामला केनरा बैंक द्वारा अधिवक्ता अजय विज को अपने पैनल से हटाने और उन्हें आईबीए की सतर्कता सूची में शामिल करने से जुड़ा है। बैंक का आरोप था कि वकील ने 2015 में दी गई कानूनी राय में लापरवाही बरती थी, जिससे उसे वित्तीय जोखिम का सामना करना पड़ा।
हालांकि, शीर्ष अदालत ने कहा कि वकील के खिलाफ आरोप केवल लापरवाही से संबंधित हैं और इनमें धोखाधड़ी या आपराधिक कदाचार का कोई तत्व नहीं है।
भाषा प्रेम
प्रेम अजय
अजय
0707 1833 दिल्ली