'सतलुज' ने मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया
दिलीप
- 07 Jul 2026, 08:02 PM
- Updated: 08:02 PM
चंडीगढ़, सात जुलाई (भाषा) दिलजीत दोसांझ अभिनीत फिल्म ''सतलुज'' की रिलीज और उसके बाद इसे ओटीटी मंच से हटाए जाने के घटनाक्रम ने मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन और मानवाधिकारों के लिए किये गए उनके संघर्ष को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
खालड़ा ने वर्ष 1984 से 1994 के बीच पंजाब में हजारों अज्ञात शवों के कथित अंतिम संस्कार की जांच-पड़ताल की थी।
जनवरी 1995 में, उन्होंने दावा किया था कि इस 10 साल की अवधि के दौरान केवल अमृतसर में ही लगभग 2,000 सामूहिक दाह संस्कार किये गए। उन्होंने इस दावे के समर्थन में जिले के श्मशान घाटों में चिता की लकड़ी की खरीद से जुड़े अभिलेखों का हवाला दिया था।
करीब आठ महीने बाद, 6 सितंबर 1995 को अमृतसर स्थित अपने आवास के बाहर कार की सफाई करते समय खालड़ा का कथित तौर पर अपहरण कर लिया गया। इसके बाद वह फिर कभी दिखाई नहीं दिए।
जसवंत सिंह खालड़ा के लापता होने के बाद उनकी पत्नी परमजीत कौर खालड़ा ने न्याय के लिए लंबी कानूनी लड़ाई शुरू की।
उनके वकील बृजिंदर सिंह सोढ़ी ने सोमवार को बताया कि 6 सितंबर 1995 को जसवंत सिंह खालड़ा को उनके घर से उठा लिया गया था।
बाद में, उच्चतम न्यायालय ने जसवंत सिंह खालड़ा के लापता होने के मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपने का आदेश दिया था।
सीबीआई ने 1996 में अपनी जांच रिपोर्ट में मानवाधिकार कार्यकर्ता खालड़ा के अपहरण के लिए पंजाब पुलिस के नौ अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया था।
खालड़ा परिवार के वकील सोढ़ी ने बताया कि मुकदमे की सुनवाई के बाद नवंबर 2005 में पटियाला स्थित सीबीआई की विशेष अदालत ने खालड़ा के अपहरण और उनकी हत्या के मामले में दो पुलिस अधिकारियों को आजीवन कारावास और चार अधिकारियों को सात साल कैद की सजा सुनाई थी।
अक्टूबर 2007 में, पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने चार पुलिसकर्मियों को सुनाई गई सात वर्ष कैद की सजा को बढ़ाकर आजीवन कारावास में तब्दील कर दिया।
न्यायमूर्ति मेहताब सिंह गिल और न्यायमूर्ति ए.एन. जिंदल की खंडपीठ ने उपनिरीक्षक सतनाम सिंह, सुरिंदर पाल सिंह और जसबीर सिंह के साथ-साथ मुख्य आरक्षी पृथीपाल सिंह को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
पीठ गवाहों के बयानों के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुंची थी कि खालड़ा को उनके घर से तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अजीत सिंह संधू के कहने पर उठाया गया था।
पीठ ने कहा था, ''सात साल की सजा अपर्याप्त है, इसलिए इसे आजीवन सश्रम कारावास में बदला जाता है।''
कार्यवाही के अनुसार, खालड़ा को झबाल पुलिस थाने में प्रताड़ित किया गया और वहीं गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई। इसके बाद, पुलिसकर्मियों ने सतलुज नदी पर बने हरिके पुल के पास उनके शव को ठिकाने लगा दिया।
उच्चतम न्यायालय ने नवंबर 2011 में आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा था।
इस मामले को याद करते हुए सोढ़ी ने बताया कि 1998 में उन्हें जान से मारने की धमकियां मिली थीं। उन्होंने यह भी दावा किया कि कई गवाहों पर दबाव डाला गया और उन्हें झूठे मामलों में फंसाया गया।
खालड़ा की मानवाधिकार टीम का हिस्सा रहे वकील नवकिरण सिंह ने कहा कि ऐसा लगता है कि केंद्र के निर्देश पर फिल्म को ओटीटी मंच से हटा दिया गया है।
उन्होंने कहा, ''सरकार को सच सामने आने देना चाहिए था। लोगों को पता होना चाहिए कि पंजाब किन हालात से गुज़रा है।''
उन्होंने कहा कि फिल्म सच्ची घटनाओं पर आधारित है।
हनी त्रेहान की इस फिल्म में दोसांझ ने मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा का किरदार निभाया है, जिन्हें 1995 में अगवा कर लिया गया था और उसके बाद वह कभी नहीं नजर आए।
इस फिल्म का मूल शीर्षक "पंजाब 95" था और यह तीन साल से अधिक समय तक सेंसर बोर्ड के पास अटकी रही। निर्देशक और अभिनेता ने केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) द्वारा सुझाए गए 127 कट के साथ इसे रिलीज करने से मना कर दिया था।
फिल्म को बिना किसी काट-छांट के एक ओटीटी मंच पर रिलीज किया गया, लेकिन रविवार शाम को उक्त ओटीटी मंच ने दर्शकों को बताया कि यह अब भारत में दर्शकों के लिए उपलब्ध नहीं है।
वर्ष 2023 में इस फिल्म का 'वर्ल्ड प्रीमियर' टोरंटो अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (टिफ्फ) में निर्धारित था, लेकिन आयोजकों की ओर से कोई आधिकारिक बयान जारी किए बिना ही इसे महोत्सव के कार्यक्रम से हटा दिया गया।
''पंजाब 95'' को भारत को छोड़कर दुनियाभर में बिना किसी काट-छांट के 7 फरवरी 2025 को रिलीज किए जाने की योजना थी, लेकिन ऐसा नहीं हो सका था।
भाषा सुभाष दिलीप
दिलीप
दिलीप
0707 2002 चंडीगढ़