पॉपकॉर्न का संक्षिप्त इतिहास और सिनेमाघर में इस अल्पाहार का सेवन
पवनेश
- 07 Jul 2026, 04:25 PM
- Updated: 04:25 PM
(गैरेट सी. वैन डाइक, यूनिवर्सिटी ऑफ वाइकाटो)
वाइकाटो (न्यूजीलैंड), सात जुलाई (द कन्वरसेशन) सिनेमा जाना सिर्फ फिल्म देखने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा संपूर्ण अनुभव है जिसमें बड़ी स्क्रीन, शानदार ध्वनि और स्वादिष्ट अल्पाहार का अपना अलग आनंद होता है। किसी शानदान फिल्म का असली आनंद विशाल पर्दे, गूंजती ध्वनि और टॉफियों बड़े-बड़े डिब्बों और ढेर सारे पॉपकॉर्न के साथ ही आता है, जिनका स्वाद घर पर कभी वैसा नहीं लगता।
हालांकि, सिनेमा के इतिहास में पॉपकॉर्न को कभी गंदगी फैलाने वाले आम लोगों के अल्पाहार के रूप में नापसंद किया गया, तो कभी संकट से जूझते फिल्म उद्योग के लिए मुनाफा कमाने वाले सहारे के रूप में सराहा गया।
प्राचीन काल से पॉपकॉर्न का अल्पाहार के रूप में इतिहास
पॉपकॉर्न उन सबसे पुराने खाद्य पदार्थों में शामिल है, जिन्हें आज भी लोग अल्पाहार के रूप में खाते हैं। पेरू में मिले पुरातात्विक प्रमाणों से पता चलता है कि करीब 6,700 साल पहले भी इसका सेवन किया जाता था।
पेरू में 17वीं सदी की शुरुआत में रहने वाले जेसुइट मिशनरी बर्नाबे कोबो ने स्थानीय लोगों को पॉपकॉर्न बनाते देखा था। वे मक्के के दानों को तब तक सेंकते थे, जब तक वे फूटकर खिल नहीं जाते थे। इसके बाद इसे 'पिसानकल्ला' नामक व्यंजन के रूप में खाया जाता था।
उत्तरी अमेरिका के ग्रेट लेक्स क्षेत्र में 1612 में पहुंचे फ्रांस के खोजकर्ताओं ने देखा कि इरोक्वॉय समुदाय के लोग मिट्टी के बर्तन में गर्म रेत भरकर उसमें मक्के के दानों को गर्म करते थे, जिससे वे फूटकर खिल जाते थे। बाद में वे इन्हें सूप में मिलाकर खाते थे।
अमेरिका में आए उपनिवेशवादियों ने भी यह तरीका अपना लिया। वे या तो आग पर जाली वाली बंद टोकरी का इस्तेमाल करते थे या फिर हाथ से घुमाए जाने वाले पतले धातु के बेलनाकार बर्तन को चूल्हे के सामने रखकर मक्के के दाने भूनते थे।
मेले से सिनेमा हॉल तक का सफर
शिकागो के चार्ल्स क्रेटर्स ने 1885 में भाप से चलने वाली एक नयी स्वचालित पॉपकॉर्न मशीन का आविष्कार किया, जिसमें वनस्पति तेल और पशु वसा के मिश्रण में मक्के के दाने पकाए जाते थे।
उन्होंने 1893 में शिकागो में आयोजित विश्व मेले में इस मशीन का प्रदर्शन किया। वर्ष 1900 तक उन्होंने इसे बिजली से चलने वाली मशीन में बदल दिया और पॉपकॉर्न की मशीनें सड़क किनारे लगने वाली ठेलियों से निकलकर दुकानों तक पहुंच गईं।
जब चलचित्रों ने मेलों में उपलब्ध मनोरंजन के साधनों में अपनी जगह बनानी शुरू की, तब तक पॉपकॉर्न और मूंगफली मेले में काफी लोकप्रिय हो चुके थे। इसके बाद ये अल्पाहार भी दर्शकों के साथ सिनेमाघरों तक पहुंच गए।
वर्ष 1896 में सिनेमा केवल मेले के आकर्षण से आगे बढ़कर अपने आप में एक अलग मनोरंजन स्थल बन गया। निकेलोडियन (जहां प्रवेश शुल्क एक निकेल था और ग्रीक भाषा में ओडियन का अर्थ थिएटर होता है) या ब्रिटेन में 'पेनी गैफ' जैसे सस्ते सिनेमाघर लोगों को कम कीमत में फिल्में देखने का अवसर देते थे।
थिएटर मालिकों ने 1920 के दशक तक फिल्मों को अधिक परिष्कृत और भव्य बनाने की कोशिश शुरू कर दी। आलीशान कालीनों और शानदार साज-सज्जा वाले ये 'मूवी पैलेस' भव्य मनोरंजन स्थलों की तरह बनाए गए।
ऐसे भव्य माहौल में पॉपकॉर्न या मूंगफली खाते दर्शक उस परिष्कृत वातावरण से मेल नहीं खाते थे। साथ ही, मूक फिल्मों के दौरान अल्पाहार सेवन की आवाज भी फिल्म देखने में बाधा बनती थी।
सस्ती लेकिन खास विलासिता
न्यूयॉर्क में 1927 में पहली बोलती फिल्म 'द जैज सिंगर' रिलीज हुई। बोलती फिल्मों ने फिल्म उद्योग में नई जान फूंक दी और अब फिल्म के संगीत के कारण पॉपकॉर्न खाने की आवाज पहले जितनी परेशान करने वाली नहीं रही।
वर्ष 1930 के दशक की महामंदी के दौरान अधिकांश लोगों की पहुंच से कई विलासितापूर्ण चीजें बाहर हो गईं। लेकिन फिल्म का टिकट अब भी किफायती था और पांच सेंट में मिलने वाला पॉपकॉर्न का एक पैकेट लोगों को सिनेमाघरों तक खींच लाता था, जिससे टिकटों की बिक्री भी बढ़ी।
शुरुआत में सिनेमाघर मालिक लॉबी या बाहर की जगह अल्पाहार बेचने वालों को किराए पर देते थे। लेकिन जब उन्हें पता चला कि पॉपकॉर्न पर 70 प्रतिशत से अधिक का मुनाफा होता है, तो उन्होंने खुद इसकी बिक्री शुरू कर दी।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान चीनी के वितरण में कटौती होने लगी। इससे कई तरह की मिठाइयां या तो बाजार से गायब हो गईं या बहुत महंगी हो गईं।
ऐसे में पॉपकॉर्न उनका सस्ता विकल्प बन गया और इसकी खपत में 300 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
पॉपकॉर्न के साथी
दुनिया भर के सिनेमाघरों में पॉपकॉर्न बेहद लोकप्रिय है। कहीं इसे मीठा पसंद किया जाता है, तो कहीं नमकीन, और कई जगह इसमें स्थानीय स्वाद भी जोड़े जाते हैं।
भारत में मसालेदार पॉपकॉर्न लोकप्रिय है। जापान में इसमें उमामी स्वाद से भरपूर समुद्री शैवाल के छोटे टुकड़े मिलाए जाते हैं, जबकि चीन में मीठे पॉपकॉर्न का बाजार सबसे बड़ा है।
और भले ही पॉपकॉर्न इस कहानी का मुख्य किरदार हो, लेकिन फिल्मी जलपान की जोड़ी में आइसक्रीम उसका भरोसेमंद साथी है।
ऑस्ट्रेलिया के सिनेमाघरों में 1930 के दशक में 'आइसक्रीम मैटिनी' का चलन था जिसमें फिल्म देखने आने वाले हर बच्चे को मुफ्त में एक कप आइसक्रीम दी जाती थी। इसके अलावा चॉकलेट से लिपटी आइसक्रीम 'एस्किमो पाई' भी बेहद लोकप्रिय थी। मध्यांतर के दौरान परिचारिकाएं 'ट्रे' में इन्हें लेकर सिनेमाघर के गलियारों में घूम-घूमकर बेचती थीं।
चॉकलेट से लिपटे आइसक्रीम कोन 1940 के दशक में ऑस्ट्रेलिया में आए, लेकिन सिनेमाघरों में इनकी शुरुआत 1980 के दौरान हुई।
चॉक टॉप आज भी ऑस्ट्रेलिया और आओटेआरोआ (न्यूज़ीलैंड) में फिल्म देखने वालों का पसंदीदा अल्पाहार है, हालांकि 'ऑस्ट्रेलेशिया' के बाहर यह ज्यादा लोकप्रिय नहीं है।
'ऑस्ट्रेलेशिया' एक भौगोलिक और सांस्कृतिक क्षेत्र है जिसमें मुख्य रूप से ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और न्यू गिनी द्वीप शामिल हैं।
नीदरलैंड की नमकीन लिकोरिस का मीठा-नमकीन स्वाद हर किसी को पसंद नहीं आता। वहीं, कोलंबिया के सिनेमाघरों में मिलने वाली भुनी हुई चींटियां दर्शकों को स्वाद का बिल्कुल अलग और अनोखा अनुभव कराती हैं।
'हॉर्मिगास कुलोनास', अट्टा लेविगाटा नामक पत्ती खाने वाली चींटी की एक प्रजाति है। कोलंबिया के सैंटेंडर क्षेत्र में इसे बेहद खास व्यंजन माना जाता है और इसे 'कोलंबिया का कैवियार' भी कहा जाता है। रानी चींटियों के पैर और पंख हटाने के बाद उनके शरीर को भूनकर कुरकुरा, उच्च प्रोटीन वाला अल्पाहार तैयार किया जाता है। यह ऐसा व्यंजन है, जो आपकी थाली में भी उतना ही रोमांच परोसता है, जितना पर्दे पर चल रही फिल्म।
लेकिन चाहे पॉपकॉर्न हो या भुनी हुई चींटियां, अंधेरे सिनेमाघर में फिल्म देखते हुए कुछ न कुछ खाते रहना, बहुत से लोगों के लिए सिनेमा अनुभव का अभिन्न हिस्सा है।
मक्खन युक्त पॉपकॉर्न की मोहक खुशबू, चॉक टॉप की कुरकुरी परत और विशाल पर्दे का सम्मोहक अनुभव-ये सब मिलकर ऐसा माहौल रचते हैं, जिसे घर पर चाहकर भी दोहराया नहीं जा सकता।
द कन्वरसेशन खारी पवनेश
पवनेश
0707 1625 वाइकाटो (न्यूजीलैंड)