अंतरिक्ष से लौटे शुभांशु शुक्ला ने साझा किए अनुभव, पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में सुनाए दिलचस्प किस्से
माधव
- 04 Jul 2026, 07:02 PM
- Updated: 07:02 PM
बेंगलुरु, चार जुलाई (भाषा) अंतरिक्ष यात्री और वायुसेना के ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने शनिवार को पिछले साल इसी दिन अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष केंद्र (आईएसएस) पर बिताए समय को याद किया, जहां उन्होंने पांच दिनों की मशक्कत के बाद इसरो द्वारा सौंपा गया एक चुनौतीपूर्ण 'एसटीईएम' प्रदर्शन सफलतापूर्वक पूरा किया था।
अपनी किताब 'द सेकेंड ऑर्बिट: बिलीफ ऑफ ए मैन… ड्रीम्स ऑफ 1.4 बिलियन हार्ट्स' के विमोचन के मौके पर आईएसएस जाने वाले पहले भारतीय शुक्ला ने कहा, "आज चार जुलाई है और पिछले साल इसी दिन मैं धरती पर नहीं था। मै अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर अंतरिक्ष में था।"
आईएसएस पर बिताए अपने समय के दौरान, उन्हें एक 'एसटीईएम'प्रदर्शन याद आया जिसे वे कई दिनों से करने की कोशिश कर रहे थे। इसमें भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (आईएसआरओ) ने उन्हें पानी का एक बुलबुला बनाने, उसके अंदर हवा का एक बुलबुला डालने और फिर उस हवा के बुलबुले के अंदर कॉफी का एक बुलबुला डालने का काम सौंपा था।
शुक्ला ने कहा, "तो, अंतरिक्ष में तीन बुलबुले और पिछले पांच दिनों से मैं यही करने की कोशिश कर रहा था। पानी के इस बुलबुले को पकड़ना मेरे लिए बहुत मुश्किल था, और आज (चार जुलाई) वह दिन था जब मैं इसे सफलतापूर्वक कर पाया। मुझे बहुत खुशी थी कि आखिरकार उस दिन यह काम हो पाया।"
शुक्ला उस चार सदस्यीय दल का हिस्सा थे, जिसने नासा के एक्सियोम-4 मिशन के तहत आईएसएस पर 18 दिन बिताए। यह चार दशकों के बाद किसी भारतीय की अंतरिक्ष यात्रा थी। इससे पहले 1984 में विंग कमांडर राकेश शर्मा ने ऐसा किया था।
अंतरिक्ष यात्री ने बताया कि उन्होंने आईएसएस पर कपोला खिड़की से एक खास लेंस का इस्तेमाल करके पूरी पृथ्वी की अपनी पहली तस्वीर ली।
उन्होंने कहा कि ये सब जमीन पर काम करने वाली एक बड़ी टीम की कोशिशों की वजह से ही संभव हो पाया।
उन्होंने कहा, "जब हम किसी को अंतरिक्ष में भेजते हैं या प्रक्षेपित करते हैं, तो इसमें हजारों लोग और जमीन पर एक बड़ी टीम शामिल होती है, और उनमें से हर एक व्यक्ति अहम होता है। एक तरह से, यह किताब कुछ हद तक इसी बारे में है।"
अपने अंतरिक्ष मिशन के सबसे मजेदार पल का जिक्र करते हुए शुक्ला ने कहा कि हालांकि अंतरिक्ष एक ऐसा माहौल है जहां "जीवन नहीं होना चाहिए", इसके बावजूद वहां मज़ेदार स्थितियां भी सामने आती हैं।
आईएसएस तक के सफर को याद करते हुए शुक्ला ने बताया कि कक्षा में पहुंचने और स्टेशन से जुड़ने के बीच चालक दल के पास लगभग 22 घंटे का समय था, जिसमें उन्हें सोने के लिए कुछ समय मिल गया।
उन्होंने बताया कि अंतरिक्ष में कोई बिस्तर नहीं होता और अंतरिक्ष यात्री यान के अंदर कहीं भी सो सकते हैं। उनके साथी चालक दल के सदस्यों ने जहां खुद को अपनी सीटों से बांध लिया था, वहीं शुक्ला ने एक सीट के नीचे जगह बनाकर सोने का फ़ैसला किया; ठंड लगने पर वे स्पेससूट रखने के लिए बने एक बड़े काले बैग में घुस गए।"
उन्होंने कहा, "मैं अंदर जाता रहा... जब तक कि मेरे कंधे लगभग बैग के अंदर नहीं चले गए, और मैं आराम से सो गया।"
शुक्ला ने बताया कि शून्य गुरुत्वाकर्षण में सोते समय उनका शरीर धीरे-धीरे तैरने लगा, जिससे 'कैप्सूल' में सिर्फ एक और बैग जैसा कुछ दिखाई दे रहा था।
उन्होंने कहा, "जब बाकी लोग जागे और खाना खाने का फैसला किया, तो उन्हें मैं नहीं मिला। उन्होंने चार बैग देखे, लेकिन चालक दल के सिर्फ तीन सदस्य ही थे। कुछ समय के लिए यह एक रहस्य बना रहा—आख़िर अंतरिक्ष में इतनी छोटी सी कैप्सूल में कोई कैसे खो सकता है?"
शुक्ला के अनुसार, कक्षा में रहने के दौरान उन्होंने पृथ्वी के 320 चक्कर लगाए और अंतरिक्ष में अपने समय के दौरान लगभग 1.4 करोड़ किलोमीटर की दूरी तय की।
उन्होंने कहा, "अगर हम 140 करोड़ भारतीयों को लें, तो मैंने आप में से हर एक के लिए लगभग 100 मीटर की यात्रा की है। एक तरह से, आप सभी इस यात्रा का हिस्सा रहे हैं।"
भाषा प्रशांत माधव
माधव
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