न्यायालय ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के प्रावधानों के खिलाफ याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा
नेत्रपाल
- 16 Apr 2026, 09:28 PM
- Updated: 09:28 PM
नयी दिल्ली, 16 अप्रैल (भाषा) समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को एक ''संवैधानिक उद्देश्य'' बताते हुए, उच्चतम न्यायालय ने मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 के कुछ प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका पर सुनवाई करने पर बृहस्पतिवार को सहमति व्यक्त की।
याचिका में इन प्रावधानों को इस आधार पर चुनौती दी गई है कि ये महिलाओं के खिलाफ कथित तौर पर भेदभावपूर्ण हैं, खासकर संपत्ति के अधिकारों के मामले में।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने पौलोमी पाविनी शुक्ला और न्याय नारी फाउंडेशन द्वारा दायर जनहित याचिका (पीआईएल) पर केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय से जवाब मांगा।
अदालत ने वकील प्रशांत भूषण को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि कुछ पीड़ित मुस्लिम महिलाएं भी इस सुनवाई का हिस्सा बनें।
शुरुआत में पीठ इस आधार पर हस्तक्षेप करने के लिए अनिच्छुक थी कि शरीयत कानून में किसी भी शब्द या प्रावधान को हटाना अदालत द्वारा कानून बनाने जैसा होगा, लेकिन बाद में भूषण के यह कहने के बाद कि एक धारा संविधान के तहत महिलाओं के समानता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करती है, पीठ ने इस मुद्दे पर विचार करने पर सहमति व्यक्त की।
उन्होंने कहा, ''इसके अलावा, महिलाओं के संपत्ति अधिकार किसी धर्म की अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं हो सकते और इसलिए, संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत इन्हें संरक्षित नहीं किया जा सकता।''
अनुच्छेद 25 सभी नागरिकों को धर्म की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार प्रदान करता है, जिसके तहत कोई भी व्यक्ति अपने धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने के लिए स्वतंत्र है। हालांकि, यह अधिकार निरपेक्ष नहीं है और सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य और अन्य मौलिक अधिकारों के अधीन है।
जब भूषण ने कहा कि किसी देश के दीवानी कानून सभी के लिए समान होने चाहिए, तो प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ''समान नागरिक संहिता एक संवैधानिक महत्वाकांक्षा है।''
याचिका में कहा गया कि वर्तमान शरीयत उत्तराधिकार नियम महिलाओं के खिलाफ ''स्पष्ट रूप से भेदभावपूर्ण'' हैं।
भूषण ने कहा कि 1937 का अधिनियम संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन करता है।
उन्होंने कहा कि उत्तराधिकार से जुड़े मामले दीवानी प्रकृति के होते हैं और ये अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षित ''आवश्यक धार्मिक प्रथा'' नहीं हैं।
वकील ने कहा, ''यह कहना कि महिलाओं को पुरुष समकक्षों की तुलना में आधा या उससे भी कम हिस्सा मिलेगा, भेदभावपूर्ण है।''
उन्होंने उच्चतम न्यायालय में लंबित इसी तरह के मामलों का हवाला दिया, जब पीठ ने जनहित याचिका पर सुनवाई करने में अपनी अनिच्छा व्यक्त की थी, और सुझाव दिया था कि यदि 1937 के कानून के भेदभावपूर्ण प्रावधानों को रद्द कर दिया जाता है, तो अदालत निर्देश दे सकती है कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम को मुसलमानों पर लागू किया जाए ताकि विधिक शून्यता से बचा जा सके।
पीठ ने न्यायिक हस्तक्षेप की संभावना के संबंध में सतर्कता व्यक्त की और कहा कि अदालत को हस्तक्षेप करने के लिए आलोचना का सामना करना पड़ सकता है।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि व्यक्तिगत कानूनों को भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम से प्रतिस्थापित करना ''कानून बनाने'' के क्षेत्र में हस्तक्षेप हो सकता है, जो कि संसद के लिए आरक्षित अधिकार है।
उन्होंने कहा, ''हम न तो कानून बना सकते हैं और न ही संशोधन कर सकते हैं।''
सुनवाई के दौरान, प्रधान न्यायाधीश ने इस बात पर जोर दिया कि इन कानूनों से प्रभावित लोगों की बात सीधे तौर पर सुनी जानी चाहिए।
जनहित के पहलू को स्वीकार करते हुए उन्होंने कहा, ''किसी न किसी पीड़ित व्यक्ति को तो आगे आना ही होगा।''
इससे पहले, पीठ ने भूषण को याचिका में संशोधन करने के लिए कहा था और टिप्पणी की थी कि एक समान नागरिक संहिता का समय आ गया है।
पीठ ने 1937 के शरीयत कानून के उन प्रावधानों को रद्द करने के अनुरोध संबंधी याचिका को, एक ''बहुत अच्छा मामला'' करार दिया था, जिस पर केवल विधायिका को ही विचार करना चाहिए।
इसने भूषण को शुक्ला और अन्य द्वारा दायर याचिका में संशोधन करने की अनुमति दी थी और मामले को यह कहते हुए चार सप्ताह बाद अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया था कि यह एक ''महत्वपूर्ण मुद्दा'' है।
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देवेंद्र नेत्रपाल
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