ग्राहक के लिए एजेंट के समान हैं बैंक, वैधता अवधि में चेक प्रस्तुत करना वैधानिक दायित्व: न्यायालय
रंजन
- 15 Apr 2026, 09:48 PM
- Updated: 09:48 PM
नयी दिल्ली, 15 अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि बैंक अपने ग्राहकों के लिए एजेंट के रूप में कार्य करते हैं और चेक को वैधता अवधि के भीतर प्रस्तुत करना उनका "वैधानिक दायित्व" है, तथा ऐसा न किया जाना सेवा में कमी का मामला है।
न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने केनरा बैंक को वैधता अवधि के भीतर चेक प्रस्तुत करने में विफल रहने पर सेवा में कमी का दोषी ठहराया, जबकि शिकायतकर्ताओं को दिए गए मुआवजे को कम कर दिया।
न्यायमूर्ति भुइयां ने 57 पन्नों के आदेश में लिखा, ''संग्रह के लिए चेक प्राप्त करने वाला बैंक ग्राहक के एजेंट के रूप में कार्य करता है और निर्धारित वैधता अवधि के भीतर दस्तावेज को प्रस्तुत करने में उचित परिश्रम करने के लिए बाध्य है। ऐसा करने में विफलता, जिसके परिणामस्वरूप दस्तावेज पुराना हो जाएगा, किसी भी उचित स्पष्टीकरण के अभाव में, बैंकिंग कर्तव्यों के निर्वहन में लापरवाही होगी जो उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत सेवा प्रदान करने में कमी माना जाएगा।''
यह फैसला राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) के फैसले के खिलाफ केनरा बैंक की अपील पर आया, जिसने ग्राहक कविता चौधरी के पक्ष में फैसला सुनाया था।
यह विवाद मई 2018 में उत्पन्न हुआ, जब कविता और प्रिया चौधरी ने अपने केनरा बैंक खातों में लगभग 1.06 करोड़ रुपये के दो चेक जमा किए।
मेसर्स एसोटेक लिमिटेड द्वारा जारी किए गए चेक 3 मार्च, 2018 को लिखे गए थे, जिनकी समापन तिथि 2 जून, 2018 थी। 29 मई को जमा कराए जाने के बाद 30 मई और 31 मई को देशव्यापी बैंक हड़ताल हो गई।
बैंक को हड़ताल के दौरान देरी के लिए माफ़ कर दिया गया था, लेकिन पाया गया कि वह 1 जून या 2 जून को चेक फिर से प्रस्तुत करने में विफल रहा, जो दोनों ही कार्य दिवस थे।
जब बैंक ने इन चेक को संसाधित करने का प्रयास किया, तब तक वे ''बेकार'' हो चुके थे और अस्वीकार कर दिए गए।
बैंक ने तर्क दिया कि देरी उसके नियंत्रण से परे परिस्थितियों और तकनीकी विफलताओं के कारण हुई।
पीठ एनसीडीआरसी की इस बात से सहमत थी कि बैंक ने लापरवाही की, लेकिन उसने शिकायतकर्ताओं को दिए गए मुआवजे को संशोधित किया।
एनसीडीआरसी ने केनरा बैंक को चेक राशि का 10 प्रतिशत (लगभग 10.6 लाख रुपये) और आठ प्रतिशत ब्याज का भुगतान शिकायतकर्ता को करने का आदेश दिया था।
शीर्ष अदालत ने कहा कि वास्तविक नुकसान ''अनिश्चित'' था क्योंकि जारी करने वाली कंपनी दिवालिया थी और शिकायत दर्ज करने की तारीख से मुआवजे को संशोधित करते हुए चेक के अंकित मूल्य का 6 प्रतिशत और साथ ही 6 प्रतिशत प्रति वर्ष ब्याज कर दिया।
इसने एनसीडीआरसी के पहले आदेश के अनुसार, ग्राहकों को मुकदमेबाजी पर आई लागत के रूप में 50,000 रुपये प्रदान किए जाने का भी निर्देश दिया।
भाषा नेत्रपाल रंजन
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