राजस्थान : अभयारण्य से फिर बाहर निकला बाघ, ट्रेंकुलाइज कर पकड़ा
बाकोलिया रवि कांत
- 09 Mar 2026, 10:38 PM
- Updated: 10:38 PM
जयपुर, नौ मार्च (भाषा) रणथम्भौर बाघ अभयारण्य जुड़े क्षेत्र में सोमवार को फिर बाघ टी-2407 की हलचल सामने आई है। चार वर्षीय नर बाघ ग्राम रामसिंहपुरा के एक खेत में पहुंच गया। यह वही बाघ है जो रविवार को नाहरगढ़ होटल के पास भी नजर आया था। हालांकि बाघ को वन विभाग की टीम ने देर शाम को ट्रेंकुलाइज कर लिया गया। अधिकारियों ने यह जानकारी दी।
उपवन संरक्षक रणथम्भौर प्रथम मानस सिंह ने बताया कि यह वही बाघ है, जिसे रविवार को नाहरगढ़ होटल के पास देखा गया था। बाघ टी-2407 रविवार देर रात करीब 9 बजे वापस वन क्षेत्र में चला गया था।
उन्होंने बताया कि सोमवार को फिर से जंगल से निकलकर रामसिंहपुरा के खेतों में दिखाई दिया। सूचना पर वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची और स्थिति को नियंत्रित किया। इसके बाद जनसुरक्षा एवं वन्यजीव संरक्षण को ध्यान में रखते हुए वन विभाग एवं पशु चिकित्सक की टीम ने ट्रेंकुलाइज कर पकड़ा। परीक्षण के बाद बाघ स्वस्थ पाया गया है।
मानस सिंह ने बताया कि बाघ की गतिविधियों की निगरानी के लिए रेडियो कॉलर लगाया गया है। आवश्यक परीक्षण एवं अनुकूल परिस्थितियों के बाद इसे रणथम्भौर के वन क्षेत्र में पुनः छोड़ा जाएगा। इस दौरान विभाग के उच्चाधिकारी भी मौजूद रहे।
हाल के वर्षों में ऐसे मामले अधिक सामने आए हैं क्योंकि युवा बाघ नए क्षेत्र की तलाश में संरक्षित जंगल से बाहर निकलते हैं।
सवाई माधोपुर जिले में स्थित रणथम्भौर बाघ अभयारण्य में बाघों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। यह वन्यजीव संरक्षण की दिशा में एक बड़ी सफलता मानी जा रही है लेकिन यही सफलता वन विभाग के लिए चुनौती बन रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि बाघों का कुनबा बढ़ने से जंगल छोटा पड़ रहा है और उनके लिए पर्याप्त बाघ पर्यावास नहीं मिल पा रहा है। यही वजह है कि रणथम्भौर में युवा बाघ क्षेत्र की तलाश में लगातार जंगल की परिधि से बाहर निकल रहे हैं।
वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, लगभग 1,800 वर्ग किलोमीटर (सवाईमाधोपुर, धौलपुर और करौली जिले सहित बफर क्षेत्र) में फैले इस अभयारण्य में वर्तमान में लगभग 70 बाघ हैं।
वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि उपलब्ध आवास आदर्श रूप से 40 से 50 बाघों को ही सहारा दे सकता है, जिससे भीड़भाड़ और क्षेत्रीय संघर्ष की चिंता बढ़ रही है।
विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि एक बाघ 40 से 50 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में और बाघिन 20 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में रहती है। नया क्षेत्र बनाने के लिए बाघ कई बार राष्ट्रीय उद्यान से बाहर निकल जाते हैं।
वन्यजीव विशेषज्ञ धर्मेन्द्र खांडल ने बताया कि क्षेत्र की तलाश में रणथम्भौर के बाघ कई बार बाघ मुकुंदरा हिल्स बाघ अभयारण्य, रामगढ़ विषधारी अभयारण्य और कभी-कभी मध्यप्रदेश के जंगलों तक भी पहुंच जाते हैं।
उन्होंने बताया कि रणथम्भौर के अलावा जहां-जहां बाघ अभयारण्य बनाए गए हैं वहां अभी भी गांवों का विस्थापन पूर्ण नहीं हो रहा है। बाघों के लिए गांवों का विस्थापन करना बहुत जरूरी है।
खांडल ने बताया कि रणथम्भौर के अलावा कैलादेवी अभयारण्य को भी बाघों के अनुकूल बनाना होगा। उन्होंने कहा कि न तो वहां पर गांवों का विस्थापन हो पा रहा है और न ही समूचित वन प्रबंधन है।
विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती बाघ गतिविधियों ने रणथम्भौर बाघ अभयारण्य के भीतर पर्यटकों और तीर्थयात्रियों की सुरक्षा चिंताओं को भी बढ़ा दिया है। त्रिनेत्र गणेश मंदिर और ऐतिहासिक रणथम्भौर किले के मार्ग पर अक्सर बाघ देखे जाते हैं, जिसके चलते अधिकारियों को समय-समय पर मार्ग बंद करना पड़ता है।
पिछले वर्ष अप्रैल में मंदिर मार्ग पर एक बाघिन ने सात वर्षीय बच्चे पर हमला कर उसकी जान ले ली थी। मई में एक अन्य घटना में जोगी महल क्षेत्र में एक वन रेंजर की बाघ हमले में मौत हो गई थी।
भाषा
बाकोलिया रवि कांत
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