ग्रामीण आवास के लिए निधि स्वीकृति पत्र को वैध एसआईआर दस्तावेज मानने से आयोग का इनकार
रंजन
- 16 Feb 2026, 09:28 PM
- Updated: 09:28 PM
कोलकाता, 16 फरवरी (भाषा) निर्वाचन आयोग की ओर से सोमवार को जारी उस स्पष्टीकरण को लेकर सियासी विवाद खड़ा हो गया है, जिसमें कहा गया है कि केंद्र और राज्य सरकारों की ग्रामीण आवास योजनाओं के तहत जारी निधि स्वीकृति पत्र मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभ्यास से जुड़ी सुनवाई में स्वीकार्य दस्तावेज नहीं हैं।
पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस ने आरोप लगाया कि यह कदम बड़ी संख्या में वैध मतदाताओं को उनके मताधिकार से वंचित करने की निर्वाचन आयोग की एक और चाल है।
पार्टी ने कहा कि गणना प्रपत्रों में तार्किक विसंगतियों और जानकारियों का मिलान न होने को लेकर सुनवाई प्रक्रिया पूरी होने के एक दिन बाद मतदाताओं को निर्वाचन आयोग का नोटिस मिलना 28 फरवरी को प्रकाशित होने वाली अंतिम मतदाता सूची से अनुचित रूप से नाम हटाए जाने की आशंकाओं को और बढ़ावा देता है।
निर्वाचन आयोग ने पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) के कार्यालय की ओर से उठाए गए एक सवाल पर स्पष्टीकरण देने वाले पत्र में प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण (पीएमएवाई-जी), इंदिरा आवास योजना (आईएवाई) और बांग्लार बाड़ी (ग्रामीण) जैसी सरकारी आवास योजनाओं के तहत जारी निधि स्वीकृति पत्रों को एसआईआर सुनवाई के लिए वैध दस्तावेज के रूप में स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
आयोग ने पत्र में अक्टूबर 2025 के अपने एक निर्देश और शीर्ष अदालत के नौ फरवरी के आदेश का जिक्र करते हुए कहा, "आयोग ने 27.10.25 के अपने एसआईआर निर्देश में 'सरकार की ओर से जारी किसी भी भूमि/मकान आवंटन प्रमाण पत्र' को स्वीकार्य दस्तावेजों में से एक के रूप में निर्दिष्ट किया था। पीएमएवाई-जी, आईएवाई और बांग्लार बाड़ी (ग्रामीण) जैसी योजनाओं के तहत जारी निधि स्वीकृति पत्र माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश या ऊपर उल्लिखित एसआईआर निर्देशों में शामिल दस्तावेज नहीं हैं।"
शीर्ष अदालत के आदेश में कहा गया था, "जिन प्रभावित व्यक्तियों को नोटिस भेजे गए हैं, वे आयोग की ओर से एसआईआर नोटिस में उल्लिखित सभी या किसी भी दस्तावेज को पेश करने के हकदार होंगे, और ईआरओ (मतदाता पंजीकरण अधिकारी) नोटिस के जवाब में प्राप्त आपत्तियों पर आदेश पारित करते समय ऐसे सभी दस्तावेजों, जिनमें 19.01.2026 के हमारे आदेश में उल्लिखित दस्तावेज भी शामिल हैं, विचार करेंगे।"
पश्चिम बंगाल की वित्त मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य ने आयोग के स्पष्टीकरण पत्र पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह आयोग की ओर से "खास तौर पर बंगाल और उसके मतदाताओं को निशाना बनाने" के लिए उठाया गया एक और कदम है।
भट्टाचार्य ने कहा, "यह स्पष्टीकरण विरोधाभासी है। इसका क्या अर्थ है? निर्वाचन आयोग भूमि आवंटन प्रमाण पत्र को वैध दस्तावेजों में से एक मानता है। क्या पंजीकृत भूमि मालिक न होने पर भी सरकारी आवास निधि स्वीकृत की जा सकती है? अगर वित्तीय सहायता पत्र जारी किए गए हैं, तो इसका स्वतः ही अर्थ है कि लाभार्थी भूमि मालिक है।"
मंत्री ने सवाल किया कि पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने इस सिलसिले में स्पष्टीकरण क्यों मांगा, जबकि उन्हें "पता था" कि ग्रामीण आवास के लिए निधि स्वीकृति पत्र केवल भूमि मालिकों को ही दिए जा सकते हैं। उन्होंने दावा किया कि ऐसा राज्य के मतदाताओं के लिए "मुश्किलें बढ़ाने" के इरादे से किया गया है।
भट्टाचार्य ने कहा कि सरकार प्रायोजित बांग्लार बाड़ी ग्रामीण आवास योजना के तहत केंद्रीय अनुदान बंद किए जाने के बाद बंगाल में लगभग 32 लाख लाभार्थियों को धनराशि हासिल हुई है।
उन्होंने पूछा, "और यह स्पष्टीकरण सुनवाई पूरी होने के एक दिन बाद क्यों आया? लोगों ने यह जाने बिना ही स्वीकृति पत्रों को दस्तावेज के रूप में जमा कर दिया कि इन्हें स्वीकार किया जाएगा या नहीं। अब उनके पास अपने दस्तावेज का समर्थन करने का मौका नहीं है और उनके नाम अंतिम मतदाता सूची से हटाए जाने की आशंका है।"
तृणमूल कांग्रेस ने पत्र में आयोग की ओर से उद्घृत शीर्ष अदालत के आदेश का जिक्र करते हुए कहा कि चुनाव निकाय ने उस फैसले की भावना का उल्लंघन किया है और इसके बजाय, "तकनीकी अस्पष्टता" का फायदा उठाते हुए चुनाव नियमों को "बंगाल में पक्षपाती तौर पर" लागू किया है।
पार्टी ने 'एक्स' पर एक पोस्ट में कहा, "क्या हमें निर्वाचन आयोग को याद दिलाने की जरूरत है कि सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि एक संवैधानिक निकाय होने के नाते, उसे मतदाताओं के विश्वास को बनाए रखते हुए काम करना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हर पात्र मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर सके, न कि भय और बहिष्कार का माहौल बनाना चाहिए? आयोग संवैधानिक रूप से जनता के वोट की रक्षा करने के लिए बाध्य है, न कि किसी भी पार्टी के राजनीतिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए। वे 'इलेक्शन कमीशन' (निर्वाचन आयोग) हैं, न कि 'इलेक्शन ओमिशन' (मतदाताओं के नाम हटाने वाले निकाय)।"
भाषा पारुल रंजन
रंजन
1602 2128 कोलकाता