असम में वन क्षेत्रों से अतिक्रमण हटाने को लेकर उच्चतम न्यायालय का फैसला ऐतिहासिक: हिमंत
पवनेश
- 11 Feb 2026, 06:15 PM
- Updated: 06:15 PM
गुवाहाटी, 11 फरवरी (भाषा) असम के मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा ने बुधवार को उच्चतम न्यायालय के उस फैसले को "ऐतिहासिक" करार दिया, जिसमें राज्य को विशेष तौर पर गठित समिति की मंजूरी के बाद आरक्षित वन क्षेत्रों में अतिक्रमण हटाने की अनुमति दी गई है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि इससे अतिक्रमण रोधी अभियानों को सुव्यवस्थित करने में मदद मिलेगी।
उन्होंने कहा कि अब तक 1.25 लाख बीघा से अधिक वन भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराया जा चुका है, जबकि लगभग 20 लाख बीघा भूमि अभी भी अवैध कब्जे में है।
शर्मा ने यहां एक संवाददाता सम्मेलन में कहा, "यह हमारे वन विभाग के इतिहास में एक ऐतिहासिक फैसला है...। राज्य सरकार को एक महत्वपूर्ण मामले में जीत मिली है, जिससे सरकार को वन भूमि से अतिक्रमण हटाने का पूरा अधिकार मिल गया है। न्यायालय ने यह भी कहा है कि यदि वन पंचायत क्षेत्र में आता है तो इसे अतिक्रमण रोधी अभियान के खिलाफ दलील नहीं माना जा सकता।"
उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को असम सरकार को गोलाघाट जिले के दोयांग आरक्षित वन और उससे सटे गांवों में अतिक्रमण की जांच के लिए वन और राजस्व अधिकारियों की एक समिति गठित करने की अनुमति दी थी।
अदालत ने कहा था कि वन देश के सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधनों में से एक हैं।
न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि समिति कथित अवैध अतिक्रमणकारियों को नोटिस जारी करेगी और उन्हें यह साबित करने का अवसर देगी कि संबंधित भूमि पर उनका वैध अधिकार है।
अदालत ने कहा कि यदि आरक्षित वन क्षेत्र में अवैध कब्जा पाया जाता है तो संबंधित व्यक्ति को उचित और पर्याप्त कारण बताते हुए आदेश जारी किया जाएगा और 15 दिन के भीतर कब्जा छोड़ने का नोटिस दिया जाएगा।
मुख्यमंत्री ने कहा कि शीर्ष अदालत द्वारा किया गया याचिका का निपटारा असम के लिए बाधा बन गया था, क्योंकि कुछ क्षेत्रों में अदालत के आदेशों के चलते बेदखली पर रोक लगी हुई थी और अनिश्चितता बनी हुई थी।
उन्होंने कहा, "अब अतिक्रमण रोधी प्रक्रिया को सुव्यवस्थित किया जाएगा।"
शर्मा ने दावा किया कि राज्य में अब तक कुल 1,25,326 बीघा वन भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराया गया है।
उन्होंने बताया कि करीब 25-26 लाख बीघा वन भूमि अभी भी कब्जे में है, लेकिन इसमें आदिवासी और पारंपरिक वनवासियों के कब्जे वाली भूमि भी शामिल है, जिन्हें संबंधित कानूनों के तहत 'वन पट्टा' दिया जाएगा।
उन्होंने कहा, "यदि पात्र वनवासियों को दिए जाने वाले अधिकारों वाली भूमि को अलग कर दिया जाए, तो लगभग 20 लाख बीघा भूमि अब भी अतिक्रमण के दायरे में आती है।"
मुख्यमंत्री ने बताया कि उच्चतम न्यायालय के निर्देशानुसार गठित की जाने वाली समिति को बुधवार शाम तक अधिसूचित कर दिया जाएगा और वह फैसले के अनुरूप आगे की कार्रवाई करेगी।
भाषा राखी पवनेश
पवनेश
पवनेश
1102 1815 गुवाहाटी