राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थान आयोग में पद इतने लंबे समय तक रिक्त नहीं छोड़े जा सकते: अदालत
सुरेश
- 13 Feb 2026, 06:28 PM
- Updated: 06:28 PM
(इंट्रो ठीक करते हुए)
नयी दिल्ली, 13 फरवरी (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थान आयोग में अध्यक्ष और सदस्यों के 2023 में रिक्त हुए पद इतने लंबे समय तक खाली नहीं छोड़े जा सकते, भले ही कानून में ऐसी नियुक्तियों के लिए कोई समय सीमा निर्धारित न हो।
मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने कहा कि केंद्र सरकार का यह रुख "एक बहुत बड़ी गलतफहमी", "अस्वीकार्य" और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थान आयोग अधिनियम में प्रदत्त "विधायी आदेश के विपरीत" है कि अदालत के पास इस तरह की नियुक्तियों का निर्देश देने का अधिकार नहीं है, क्योंकि कानून में इसके लिए कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं है।
पीठ ने इस बात पर गौर किया कि अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थानों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए काम करने वाला आयोग केवल एक सदस्य के साथ काम कर रहा है। उसने केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय को अध्यक्ष और सदस्यों के रिक्त पदों को भरने के लिए उठाए गए कदमों तथा नियुक्तियों के लिए निर्धारित समय-सीमा का विवरण देते हुए एक हलफनामा दाखिल का निर्देश दिया।
पीठ ने केंद्र की ओर से पेश वकील से पूछा, "कृपया अपने अधिकारियों को इस बारे में जागरूक करें। ढाई साल बीत चुके हैं। चूंकि, अधिनियम में कोई समय सीमा निर्धारित नहीं है, तो क्या आप केवल एक सदस्य के साथ ही काम करते रहेंगे?"
उसने कहा, "आयोग के अध्यक्ष का पद सितंबर 2023 से खाली है। यह सच है कि अधिनियम में अध्यक्ष या किसी सदस्य का कार्यकाल समाप्त होने पर प्रतिवादी के लिए रिक्त पद भरने के वास्ते कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं की गई है। हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि अधिकारियों की ओर से इतने लंबे समय तक कोई कदम नहीं उठाया जाएगा।"
उच्च न्यायलय केंद्र सरकार को आयोग में अध्यक्ष और सदस्यों के रिक्त पदों को भरने का निर्देश देने संबंधी याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
शिक्षा मंत्रालय के उच्च शिक्षा विभाग ने दलील दी कि रिक्तियों के कारण आयोग के कामकाज में कोई बाधा पैदा नहीं हुई है।
उसने कहा कि अधिनियम में भले ही आयोग के गठन और संचालन के साथ-साथ इसके अध्यक्ष और सदस्यों की योग्यता, कर्तव्यों और शक्तियों के सिलसिले में प्रावधान किए गए हैं, लेकिन इसमें उस अवधि के बारे में कुछ नहीं कहा गया है, जिसके भीतर रिक्तियों को भरा जाना चाहिए।
अदालत ने कहा कि आयोग न्यायिक, प्रशासनिक और सलाह संबंधी काम करता है तथा अधिकारियों के रुख को जायज नहीं ठहराया जा सकता है।
उसने स्पष्ट किया कि रिक्तियों को भरने के लिए कानून में कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं होने का बहाना बनाकर विधायी आदेश को "निष्क्रिय" नहीं होने दिया जा सकता है।
उच्च न्यायालय ने मामले की अगली सुनवाई के लिए चार मई की तारीख तय की।
भाषा पारुल सुरेश
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