न्यायालय ने 25 साल की कानूनी लड़ाई के बाद सीआरपीएफ अधिकारी को बकाया वेतन भुगतान का आदेश दिया
सुरेश
- 21 Jul 2026, 09:18 PM
- Updated: 09:18 PM
नयी दिल्ली, 21 जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को 25 वर्षों से अधिक समय तक चले अनुशासनात्मक मामले में अदालत के आदेशों का सही ढंग से पालन न करने के कारण एक सेवानिवृत्त सीआरपीएफ अधिकारी के करियर को नुकसान पहुंचने की बात कहते हुए उसे बकाया वेतन, संशोधित पेंशन संबंधी लाभ और मुकदमे के खर्च के रूप में 10 लाख रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया।
न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने हालांकि प्रकाश कुमार दीक्षित को महानिरीक्षक (आईजी) के पद पर पदोन्नति देने का निर्देश देने से इनकार कर दिया। पीठ ने कहा कि वह इस पद के लिए निर्धारित पात्रता शर्तों को पूरा नहीं करते थे।
अदालत ने अधिकारियों के 'लापरवाह रवैये' और 'महज फाइलें आगे बढ़ाने वाली कार्यशैली' की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि इससे केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) में एक होनहार अधिकारी का करियर अनावश्यक रूप से छोटा हो गया।
पीठ ने कहा, ''सजा की अवधि 10 जुलाई, 1998 को समाप्त हो गई। चूंकि अपीलकर्ता नौकरी में नहीं था, इसलिए उसपर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि उस दौरान सिर्फ़ काल्पनिक फायदे ही दिए जाते हैं... और इससे पेंशन पर कोई असर नहीं पड़ता।''
प्रकाश कुमार दीक्षित वर्ष 1986 में सीआरपीएफ में सहायक कमांडेंट के रूप में नियुक्त हुए थे। वर्ष 1995 में विभागीय जांच में उन्हें बिना अनुमति कार्यभार सौंपने और स्वीकृत अवकाश के बिना 420 दिनों तक अनुपस्थित रहने का दोषी पाए जाने के बाद सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था।
बाद में दिल्ली उच्च न्यायालय ने सेवा से बर्खास्त किए जाने के आदेश को रद्द कर दिया और कहा कि दीक्षित पर केवल मामूली दंड लगाया जाना चाहिए। उच्चतम न्यायाालय ने 2020 में इस फैसले को बरकरार रखा था।
उच्चतम न्यायालय के समक्ष विवाद इस बात को लेकर था कि मामूली दंड की अवधि वर्ष 2018 से मानी जाए, जब दूसरा बर्खास्तगी आदेश जारी किया गया था, या फिर वर्ष 1995 से, जब पहली बार उन्हें सेवा से हटाया गया था।
पीठ ने कहा कि यह दंड 10 जुलाई, 1995 से प्रभावी माना जाएगा और इसका प्रभाव वर्ष 1998 में समाप्त हो जाएगा। इसलिए इस दंड को अधिकारी को उनके वैध पदोन्नति अधिकार से वंचित करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।
अदालत ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि प्रकाश कुमार दीक्षित को उनके बैच के अन्य अधिकारियों के साथ जिस दिन डिप्टी कमांडेंट के पद पर पदोन्नति दी गई थी, उसी तारीख से पदोन्नति का लाभ दिया जाए। साथ ही, उन्हें इससे जुड़े सभी परिणामी लाभ और बकाया वेतन भी प्रदान किया जाए।
पीठ ने कहा, ''चौदह मार्च, 2023 को आयोजित समीक्षा विभागीय पदोन्नति समिति (रिव्यू डीपीसी) की सिफारिश के अनुसार, अपीलकर्ता को डिप्टी कमांडेंट के पद पर पदोन्नति की पात्रता की तिथि से पूरा बकाया वेतन दिया जाएगा।''
पीठ ने यह भी कहा कि अपीलकर्ता के वेतन, वार्षिक वेतनवृद्धि, पेंशन तथा अन्य सेवानिवृत्ति लाभों का भी इसी के अनुरूप पुनर्निर्धारण किया जाए।
अदालत ने केंद्र सरकार को यह भी निर्देश दिया कि वह दीक्षित को लंबे समय तक चले इस मुकदमे के खर्च के रूप में दो महीने के भीतर 10 लाख रुपये का भुगतान करे। यदि निर्धारित अवधि में भुगतान नहीं किया गया तो इस राशि पर सात प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।
साथ ही, अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि बकाया राशि के भुगतान और विस्तृत आदेश जारी करने सहित पूरी प्रक्रिया छह महीने के भीतर पूरी की जाए।
भाषा रंजन सुरेश
सुरेश
2107 2118 दिल्ली