शाह ने कोलकाता में 'शब्द संग्रहालय' का उद्घाटन किया, भारतीय भाषाओं को संरक्षित करने की पैरवी की
संतोष
- 19 Jul 2026, 10:37 PM
- Updated: 10:37 PM
(फोटो सहित)
कोलकाता, 19 जुलाई (भाषा) केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने रविवार को 'शब्द संग्रहालय' का उद्घाटन करते हुए कहा कि हर युवा को अपनी मातृभाषा के अलावा कम से कम एक अन्य भारतीय भाषा जरूर सीखनी चाहिए। उन्होंने देश की भाषाई विविधता को संरक्षित करने पर जोर देते हुए कहा कि यह भारत की सभ्यतागत पहचान को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक है।
उन्होंने संग्रहालय को ''भारत की सांस्कृतिक विरासत के पुनरुद्धार की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल'' बताया।
केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय पुस्तकालय द्वारा विकसित यह संग्रहालय 'शब्दलोक' भारत की समृद्ध भाषाई विरासत को समर्पित है। इसमें अत्याधुनिक तकनीक और संवादात्मक प्रस्तुतियों के जरिए देश की मौखिक और लिखित भाषाई परंपराओं के विकास की यात्रा को दर्शाया गया है।
भाषा और सभ्यता के अटूट संबंध पर जोर देते हुए शाह ने कहा कि किसी भी देश या क्षेत्र की संस्कृति की अभिव्यक्ति भाषा के बिना संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि भाषा भी मानव भावनाओं और अभिव्यक्तियों से जन्मे शब्दों के बिना अस्तित्व में नहीं रह सकती।
शाह ने कहा, ''हर युवा को अपनी मातृभाषा के साथ-साथ एक भारतीय भाषा भी सीखनी चाहिए। इससे हम अपनी भाषाओं को लंबे समय तक कायम रख सकते हैं।''
उन्होंने कहा, ''हमारी भाषा हमारी विरासत को संजोए रखती है और भाषाओं के माध्यम से किसी देश की संस्कृति को समझा जा सकता है। भाषा संस्कृति का मूल आधार है। शब्दों और भाषा के बिना संस्कृति अधूरी रहती है।''
शाह ने कहा कि यह संग्रहालय आने वाली पीढ़ियों को सदियों के दौरान भाषाओं के विकास को समझने में मदद करेगा और देश के सांस्कृतिक पुनर्जागरण में महत्वपूर्ण योगदान देगा।
उन्होंने कहा, ''जब तक हमारी आने वाली पीढ़ियां इस यात्रा को नहीं समझेंगी, तब तक देश का सांस्कृतिक पुनरुत्थान वास्तव में संभव नहीं हो सकता। मुझे पूरा विश्वास है कि यह शब्द संग्रहालय सांस्कृतिक पुनर्जागरण की प्रक्रिया में एक बुनियादी आवश्यकता को पूरा करेगा और अपने उद्देश्य में सफल होगा।''
गृह मंत्री ने कहा कि भाषा के बिना किसी भी देश की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति संभव नहीं है।
उन्होंने युवाओं से पुस्तकालयों से जुड़ने की अपील करते हुए कहा कि देश का भविष्य केवल उसके शैक्षणिक संस्थानों की मजबूती पर निर्भर नहीं करता, बल्कि नागरिकों की पढ़ने की आदतों पर भी निर्भर करता है।
गृह मंत्री ने कहा कि भारत की बौद्धिक परंपरा हमेशा खुलेपन और संवाद पर आधारित रही है। उन्होंने कहा, ''हमने विचारों पर कभी कोई रोक नहीं लगाई। हमने धर्मग्रंथों पर संवाद किया, दर्शन पर चर्चा की और परंपरा के साथ-साथ लगातार नयी सोच को अपनाया।''
संग्रहालय का दौरा करने के बाद शाह ने सुझाव दिया कि डिजिटल युग को दर्शाने के लिए इसके दायरे का और विस्तार किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा, ''मैं संस्कृति सचिव से आग्रह करता हूं कि इस पहल को कंप्यूटर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के क्षेत्र तक भी विस्तारित किया जाए, ताकि आधुनिक दौर में हमारी भाषाओं को पूरी स्वीकृति मिल सके। हमने कभी नवाचार से दूरी नहीं बनाई। हमने हमेशा उपयोगी चीजों को अपनाया और उन्हें अपनी परंपराओं के साथ जोड़कर उनके सकारात्मक प्रभाव को कई गुना बढ़ाया।''
'शब्दलोक' को एक अभिनव पहल बताते हुए शाह ने कहा कि यह संग्रहालय दृश्य, श्रव्य और जीवंत अनुभवों के माध्यम से भारत की बहुभाषी चेतना, ज्ञान परंपराओं और सामूहिक स्मृतियों को संरक्षित करने का प्रयास करता है।
बंगाल की बौद्धिक विरासत का जिक्र करते हुए शाह ने कहा कि इस राज्य ने देश को कई महान साहित्यकार, वैज्ञानिक, क्रांतिकारी और विद्वान दिए हैं। उन्होंने रवींद्रनाथ टैगोर, बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय और श्री अरविंद के योगदान को याद करते हुए कहा कि दशकों तक बंगाल ने बौद्धिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में भारत का नेतृत्व किया।
शाह ने हालांकि आरोप लगाया कि वर्षों के दौरान बंगाल की सांस्कृतिक चेतना कमजोर हुई है। उन्होंने कहा, ''एक लंबा दौर ऐसा रहा जब बंगाल को भारतीय सांस्कृतिक चेतना से अलग करने के प्रयास किए गए। संकीर्ण विचारधाराओं और विदेशी विचारधाराओं ने देश और दुनिया के लिए योगदान देने की बंगाल की क्षमता को कमजोर किया।''
उन्होंने विश्वास जताया कि बंगाल एक बार फिर देश का मार्गदर्शन करने वाली शक्ति के रूप में उभरेगा। उन्होंने कहा, ''मैं पिछले नौ महीनों से पश्चिम बंगाल की स्थिति पर करीब से नजर रख रहा हूं। यह राज्य अब देश के लिए प्रकाश स्तंभ के रूप में उभर रहा है।''
संग्रहालय का पहला चरण भारत की भाषाई विविधता, विभिन्न लिपियों और समृद्ध साहित्यिक विरासत की विकास यात्रा को दर्शाता है। पारंपरिक संग्रहालय की तरह केवल वस्तुओं का प्रदर्शन करने के बजाय इसे एक सहभागी सांस्कृतिक अनुभव के रूप में विकसित किया गया है। आगंतुकों को आकर्षित करने के लिए इसमें डिजिटल डिस्प्ले, होलोग्राम और 'मोशन-सेंसर' जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है।
संग्रहालय में नौ दीर्घाएं हैं, जिनमें भाषाओं के इतिहास के विभिन्न पहलुओं और भारत की सभ्यता एवं संस्कृति पर उनके प्रभाव को प्रदर्शित किया गया है। संग्रहालय का उद्देश्य भाषा को एक जीवंत इकाई के रूप में प्रस्तुत करना है, जिसने समय-समय पर समाज को आकार दिया है और खुद भी समाज के साथ निरंतर विकसित होती रही है।
संग्रहालय भारत की 22 अनुसूचित भाषाओं को समर्पित है। इसमें मौखिक परंपरा से लेकर प्राचीन पांडुलिपियों, मुद्रित पुस्तकों और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक पाठ तक भाषाओं के विकास की यात्रा को प्रदर्शित किया गया है, जो देश की समृद्ध और स्थायी भाषाई विविधता को दर्शाती है।
भाषा आशीष संतोष
संतोष
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