न्यायाधीश को प्राथमिकी भेजने में देरी उसमें हेराफेरी की आशंका पैदा करती है : न्यायालय
वैभव
- 15 Jul 2026, 08:48 PM
- Updated: 08:48 PM
नयी दिल्ली, 15 जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को एक मामले की सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि अगर प्राथमिकी को न्यायिक दंडाधिकारी के पास भेजने में देरी के साथ ही रिकॉर्ड में 'गलत समय या तारीख डालने और उन्हें मनगढ़ंत तरीके से तैयार करने' के आरोप भी हों, तो यह देरी अहम हो जाती है और आशंका पैदा करती है।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने उत्तर प्रदेश में 1977 के एक हत्या मामले में दोषी करार दिये गए पांच लोगों को बरी करने का फैसला देते हुए यह टिप्पणी की।
पीठ के लिए लिखे 64 पन्नों के फैसले में न्यायमूर्ति मेहता ने कहा कि जांच में गंभीर खामियों, बिना वजह हुई देरी और प्राथमिकी की प्रमाणिकता पर आशंका की वजह से अभियोजन पक्ष यह साबित करने में नाकाम रहा कि पांचों आरोपी दोषी हैं।
शीर्ष अदालत ने कहा, ''केवल दंडाधिकारी को प्राथमिकी भेजने में हुई देरी को ही अभियोजन पक्ष के मामले के लिए घातक नहीं माना जा सकता और न ही ऐसी देरी को, अकेले, अभियोजन पक्ष के उस बयान को खारिज करने का एकमात्र आधार बनाया जा सकता है जो अन्यथा विश्वसनीय हो।''
पीठ ने हालांकि फैसले में कहा कि जहां ''समय या तारीख पहले की दिखाने और हेराफेरी के आरोप केवल अटकलें नहीं हैं, बल्कि रिकॉर्ड में मौजूद हालात से उन्हें ठोस आधार मिलता है, और साथ ही ऐसे तथ्य भी सामने आते हैं जिनसे जांच की निष्पक्षता और ईमानदारी को लेकर आशंका पैदा होती है, तो ऐसी देरी काफी अहम हो जाती है।''
पीठ ने कहा कि ऐसी स्थिति में, देरी केवल प्रक्रिया की एक मामूली गड़बड़ी नहीं रह जाती, बल्कि अभियोजन पक्ष के दावे की सच्चाई, प्राथमिकी के तुरंत दर्ज होने और बाद में उसमें कुछ जोड़ने या हेर-फेर करने की आशंका का आकलन करने में इसका अहम महत्व हो जाता है।
शीर्ष अदालत ने कहा, ''अभियोजन पक्ष के मामले की विस्तृत विश्वसनीयता की जांच करते समय, अदालत को ऐसी देरी के असर का आकलन अलग से नहीं, बल्कि रिकॉर्ड में मौजूद अन्य परिस्थितियों के साथ मिलाकर करना होगा।''
उच्चतम न्यायालय ने इस मामले में उच्च न्यायालय द्वारा दोषी ठहराने के अधीनस्थ अदालत के फैसले को बरकरार रखने के आदेश को भी रद्द कर दिया।
न्यायालय ने हीरा लाल, राज बक्स और सूबेदार की अपीलें मंजूर कर लीं, जबकि राज किशोर और देव प्रसाद से जुड़ी अपीलें कार्यवाही के दौरान उनकी मौत के कारण समाप्त कर दी गईं।
मामले में सह-आरोपी राम धनी की मौत इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अपील लंबित रहने के दौरान ही हो गई थी।
यह मामला 28 जून, 1977 को गोंडा जिले में हरिहर सरन नामक व्यक्ति की हत्या से जुड़ा था।
भाषा धीरज वैभव
वैभव
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