नियमितीकरण की मांग करने वाले बंगाल के 360 मदरसा शिक्षकों-कर्मचारियों की याचिकाएं न्यायालय में खारिज
मनीषा
- 13 Jul 2026, 12:38 PM
- Updated: 12:38 PM
नयी दिल्ली, 13 जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को पश्चिम बंगाल के विभिन्न मदरसों में कार्यरत करीब 360 शिक्षण एवं गैर-शिक्षण कर्मचारियों की उन याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिसमें राज्य सरकार की अनुदान सहायता योजना के तहत सेवाओं के नियमितीकरण और वेतन संबंधी लाभ नहीं दिए जाने को चुनौती दी गई थी।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति ए. जी. मसीह की पीठ ने 350 से अधिक कर्मचारियों में से 13 याचिकाकर्ताओं के मामलों पर गौर करने के बाद फैसला सुनाया। पीठ ने यह पता लगाने के लिए इन मामलों पर गौर किया कि राहत देने का कोई आधार बनता है या नहीं।
फैसला सुनाते हुए पीठ ने कहा, ''हमने यह आधार अपनाया कि यदि इन 13 याचिकाकर्ताओं में से कोई एक भी हमें अपने पक्ष में निर्णय देने के लिए संतुष्ट कर देता, तो हम शेष मामलों का भी अध्ययन करते। दुर्भाग्यवश, इन 13 में से कोई भी याचिकाकर्ता हमें प्रभावित नहीं कर सका।''
सभी याचिकाएं खारिज करते हुए पीठ ने कहा, ''इसलिए हमने न केवल उन 13 याचिकाकर्ताओं के दावों को खारिज किया है, जिनके मामलों पर गौर किया गया, बल्कि अन्य सभी याचिकाकर्ताओं के दावों को भी अस्वीकार कर दिया है। सभी रिट याचिकाएं गुण-दोष के आधार पर निराधार हैं और इसलिए इन्हें खारिज किया जाता है।''
पश्चिम बंगाल के विभिन्न मदरसों में कार्यरत लगभग 360 शिक्षण और गैर-शिक्षण कर्मचारियों ने उच्चतम न्यायालय में करीब 48 याचिकाएं दायर की थीं।
विवाद पश्चिम बंगाल मदरसा सेवा आयोग अधिनियम, 2008 से जुड़ा है। इस अधिनियम के तहत मान्यता प्राप्त मदरसों में शिक्षकों की नियुक्ति की सिफारिश के लिए एक वैधानिक आयोग का गठन किया गया था।
कलकत्ता उच्च न्यायालय ने 2014 में इस अधिनियम को निरस्त कर दिया था। वर्ष 2015 में उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने भी इस फैसले को बरकरार रखा था।
हालांकि, मार्च 2016 में उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगा दी थी।
फरवरी 2023 में उच्चतम न्यायालय ने एक समिति का गठन किया था, ताकि यह तय किया जा सके कि कलकत्ता उच्च न्यायालय के 2015 के फैसले के बाद, लेकिन 2020 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 2008 के अधिनियम को वैध ठहराए जाने से पहले की गई नियुक्तियां वैध थीं या नहीं।
समिति ने अपनी रिपोर्ट में ऐसी नियुक्तियों को अवैध माना। इसके बाद प्रभावित कर्मचारियों ने समिति की रिपोर्ट को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी थी।
भाषा गोला मनीषा
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