अहमदाबाद धमाके: पीड़ित परिवारों ने 'पूर्ण न्याय' के लिए दोषियों को जल्द सजा दिए जाने की मांग की
नरेश
- 07 Jul 2026, 05:59 PM
- Updated: 05:59 PM
अहमदाबाद, सात जुलाई (भाषा) अहमदाबाद सिलसिलेवार बम धमाकों के पीड़ितों के परिजनों ने मंगलवार को गुजरात उच्च न्यायालय के उस फैसले पर संतोष जताया, जिसमें 38 दोषियों को मृत्युदंड और 11 अन्य की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा गया है। हालांकि, उन्होंने कहा कि वे सजा के शीघ्र क्रियान्वयन के जरिए ''पूर्ण न्याय'' का इंतजार कर रहे हैं।
प्रत्यक्षदर्शियों और धमाकों से बचे लोगों ने उस भयावह मंजर को याद किया। इनमें से एक ने बताया कि 18 वर्ष पहले सरकारी अस्पताल में हुए विस्फोट के बाद उसने अपने आसपास लोगों को ''मोम की तरह पिघलते'', जबकि धमाके के असर से कुछ शवों को पेड़ों से लटके हुए देखा था।
अहमदाबाद में 26 जुलाई, 2008 को 70 मिनट के भीतर 21 सिलसिलेवार बम धमाके हुए थे जिनमें 56 लोगों की मौत हो गई थी और 200 से अधिक अन्य घायल हुए थे। शहर के कुछ अस्पतालों को भी निशाना बनाया गया था।
गुजरात उच्च न्यायालय ने बम धमाकों के मामले में विशेष अदालत के 2022 के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिदीन के 38 सदस्यों को मृत्युदंड और 11 अन्य को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी।
न्यायमूर्ति ए. वाई. कोगजे और न्यायमूर्ति समीर दवे की खंडपीठ ने विशेष अदालत के फैसले के खिलाफ दायर सभी अपीलों को खारिज कर दिया और सुनाई गई सजाओं की पुष्टि करते हुए उसके फैसले को बरकरार रखा।
अल्पेशकुमार शाह ने अहमदाबाद के मणिनगर क्षेत्र में हुए एक विस्फोट में अपने भाई चिराग शाह को खो दिया था।
उच्च न्यायालय के फैसले के बाद 'पीटीआई-भाषा' से बातचीत में अल्पेशकुमार ने कहा, ''आतंकवादियों में मानवता नहीं होती, उन्हें मुकदमों के लंबे समय तक चलने का फ़ायदा नहीं मिलना चाहिए। आज गुजरात उच्च न्यायालय के फैसले से हमें उतनी ही राहत मिली है, जितनी 2022 में तब मिली थी जब विशेष अदालत ने 38 दोषियों को फांसी की सजा सुनाई थी।''
उन्होंने कहा, ''पुलिस, प्रशासन और जांच एजेंसियों ने बहुत अच्छा काम किया। हालांकि, मुझे लगता है कि मुकदमे में बहुत ज़्यादा समय लगा। उम्मीद थी कि न्याय बिना किसी देरी के मिलेगा। हम आज के फ़ैसले से खुश हैं और बस यही उम्मीद करते हैं कि सजा पर तेजी से अमल हो।''
घटना को याद करते हुए शाह ने बताया कि उनके भाई मणिनगर क्रॉस रोड के पास एक सड़क किनारे चाय की दुकान पर चाय पी रहे थे, तभी पास में खड़ी एक साइकिल पर टिफिन बॉक्स में छिपाकर रखे गए बम में विस्फोट हो गया।
एक अन्य पीड़ित परिवार ने कहा कि न्याय में देरी, न्याय से वंचित करने के समान है, इसलिए दोषियों को जल्द से जल्द सजा मिलनी चाहिए।
गुजरात के वडोदरा ज़िले के रहने वाले जगदीश अंतानी ने कहा, ''विशेष अदालत को 2022 में अपना फ़ैसला सुनाने में लगभग 14 साल लग गए और उच्च न्यायालय को अपील पर फैसला सुनाने में चार साल और लग गए। भगवान जाने, कानूनी प्रक्रिया पूरी होने में और कितने साल लगेंगे। न्याय कहां है?''
अंतानी के रिश्तेदार हिमांशु छाया, सरखेज के पास एक बस में हुए धमाके में मारे गए थे। अंतानी (80) ने कहा कि वह अपनी पत्नी रोहिणी (79) की ओर से बात कर रहे हैं, जो पार्किंसंस बीमारी से पीड़ित हैं।
अंतानी ने कहा, ''अपने छोटे भाई की मौत से रोहिणी बिल्कुल टूट गईं। पिता के निधन के बाद उन्होंने उसे तीन वर्ष की उम्र से ही पाल-पोसकर बड़ा किया था। उसे खोने के बाद इतने सालों से उन्होंने जो दर्द सहा है, उसका कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकता।''
उन्होंने कहा, ''हमने अपने परिवार के एक बेहद प्रिय सदस्य को खो दिया, जिसकी उम्र केवल 45 वर्ष थी। आज भी हम पूर्ण न्याय मिलने का इंतजार कर रहे हैं।''
अहमदाबाद के असरवा इलाके में एक अस्पताल के वार्ड में हुए धमाके के बाद, चश्मदीदों और धमाकों में बचे लोगों ने उस खौफनाक मंजर को याद किया।
विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के कार्यकर्ता लक्ष्मण चुडासमा ने बताया कि वह धमाके में घायल हुए कुछ लोगों को असरवा सिविल अस्पताल ले जा रहे थे, तभी वहां एक और धमाका हुआ।
उन्होंने कहा, ''विहिप कार्यकर्ता के तौर पर मैं घायलों को असरवा सिविल अस्पताल ले जा रहा था। वहां पहुंचकर एम्बुलेंस खड़ी करने के बाद एक धमाका हुआ।''
चुडासमा के बाल बुरी तरह जल गए और उनके हाथों और पैरों में गंभीर चोटें आईं। उन्होंने याद करते हुए कहा, ''वह मंजर बहुत डरावना था। मेरे आस-पास लोग मोमबत्तियों की तरह जल रहे थे। धमाके की वजह से मैंने लोगों की लाशों को पेड़ों पर लटके हुए भी देखा।''
चुडासमा (71) ने कहा, ''मुझे गंभीर चोटें आई थीं और मैं एक महीने तक अस्पताल में भर्ती रहा। मैं उस दिन को कभी नहीं भूल सकता।''
चुडासमा ने यह भी बताया कि जब गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी घायलों और जीवित बचे लोगों से मिलने अस्पताल पहुंचे थे, तब उनकी उनसे मुलाकात हुई थी।
एक अन्य पीड़ित नरेंद्र परमार ने कहा कि वह आज भी धमाके में लगी चोटों के दुष्प्रभावों के साथ जीवन बिता रहे हैं।
परमार (74) ने कहा, ''मैं अपनी बेटी को छोड़ने गया था, जो उस समय नर्सिंग की पढ़ाई कर रही थी। वापस लौटते समय मैंने देखा कि बड़ी संख्या में घायल लोगों को एम्बुलेंस के जरिए असरवा सरकारी अस्पताल लाया जा रहा था।''
परमार ने बताया कि वह अन्य लोगों के साथ मिलकर घायलों को स्ट्रेचर पर अस्पताल के भीतर ले जा रहे थे, तभी अस्पताल के पास एक और विस्फोट हो गया।
उन्होंने कहा, ''मैंने एक जोरदार धमाके की आवाज सुनी और खुद को खून से लथपथ जमीन पर पड़ा पाया। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद मैं किसी तरह बाहर भागा और एक व्यक्ति ने मुझे घर पहुंचने में मदद की।''
परमार ने बताया कि विस्फोट के तुरंत बाद वह सीधे अस्पताल वापस नहीं गए, बल्कि पहले अपने घर पहुंचे। उन्होंने कहा, ''उस समय मैं अपने परिवार के साथ रहना चाहता था। इसके बाद मेरे परिजन मुझे तुरंत अस्पताल ले गए।''
भाषा आशीष नरेश
नरेश
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