भारत-पाक विवादों के समाधान के लिए बातचीत जरूरी : मीरवाइज
अविनाश
- 26 Jun 2026, 08:13 PM
- Updated: 08:13 PM
श्रीनगर, 26 जून (भाषा) कश्मीर के प्रमुख मुस्लिम धर्मगुरु मीरवाइज उमर फारूक ने भारत और पाकिस्तान के बीच विवादों के समाधान के लिए बातचीत का आह्वान करते हुए शुक्रवार को कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी संवाद की भावना को फिर से जीवित कर सकते हैं।
मीरवाइज यहां जामिया मस्जिद में शुक्रवार की नमाज के बाद लोगों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने हाल के वैश्विक घटनाक्रम, विशेषकर पश्चिम एशिया की स्थिति का भी उल्लेख किया।
मीरवाइज ने कहा कि हाल में अमेरिका और इजराइल का ईरान के साथ टकराव यह याद दिलाता है कि सैन्य शक्ति, चाहे वह कितनी भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसकी भी सीमाएं होती हैं।
उन्होंने कहा, ''युद्ध परिस्थितियों को बदल सकते हैं और व्यापक मानवीय पीड़ा पहुंचा सकते हैं, लेकिन स्थायी शांति और दीर्घकालिक समाधान अंततः संवाद, वार्ता और दूरदर्शी नेतृत्व से ही संभव हैं। महीनों तक चले टकराव, संसाधनों के व्यय और व्यापक मानवीय पीड़ा के बाद भी दोनों पक्ष आखिरकार बातचीत की मेज पर लौटे।''
उन्होंने कहा, ''यह किसी भी पक्ष की कमजोरी का संकेत नहीं है, बल्कि इस वास्तविकता को दर्शाता है कि विवादों का समाधान केवल बल प्रयोग से नहीं किया जा सकता।''
मीरवाइज ने कहा कि यह बात विशेष रूप से दक्षिण एशिया, खासकर भारत और पाकिस्तान के संदर्भ में प्रासंगिक है।
उन्होंने कहा, ''हमारा क्षेत्र दुनिया की लगभग एक-चौथाई आबादी का निवास है। यहां समृद्ध सभ्यतागत विरासत, असाधारण मानव संसाधन और अपार आर्थिक संभावनाएं हैं। इसके बावजूद दशकों से राजनीतिक तनाव, अविश्वास और अनसुलझे मुद्दों ने इस क्षेत्र के लोगों को इन संभावनाओं का पूरा लाभ उठाने से वंचित रखा है। इसका खामियाजा समाज को केवल आर्थिक रूप से ही नहीं, बल्कि भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक रूप से भी भुगतना पड़ता है।''
मीरवाइज ने कहा कि 1990 में उनके पिता मीरवाइज मौलवी फारूक की हत्या के बाद उन्हें न केवल मीरवाइज का पद और उसकी जिम्मेदारी विरासत में मिली, बल्कि उन सिद्धांतों को आगे बढ़ाने का दायित्व भी मिला, जिनके लिए उनके पिता ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
फारूक ने कहा, ''शहीद मीरवाइज न्याय के प्रबल समर्थक थे और हिंसा के बजाय संवाद में विश्वास रखते थे। वह लगातार भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत की वकालत करते रहे और उनका मानना था कि जम्मू-कश्मीर तथा पूरे क्षेत्र के लोगों के हित शांति, सम्मान और सार्थक संवाद के माहौल में ही सुरक्षित रह सकते हैं।''
उन्होंने कहा कि विपरीत परिस्थितियों और विरोध का सामना करने के बावजूद वह पिछले 36 वर्षों से लगातार इसी सिद्धांत पर कायम हैं।
उन्होंने कहा, ''स्थायी शांति युद्ध, बल प्रयोग या हिंसा से नहीं आ सकती। स्थायी समाधान के लिए संवाद, आपसी समझ और उन लोगों की बात सुनने का साहस आवश्यक है, जिनसे मतभेद हो।''
मीरवाइज ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी भारत के लगातार सर्वाधिक समय तक पद पर रहने वाले नेताओं में शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि जब मोदी ने पदभार संभाला था, तब उन्होंने क्षेत्रीय सहयोग की बात की थी और पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को बेहतर बनाने में रुचि दिखाई थी।
उन्होंने कहा, ''इन पहल से पूरे दक्षिण एशिया में उम्मीद जगी थी।''
मीरवाइज ने पूर्व प्रधानमंत्रियों अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह के साथ अपने तथा हुर्रियत कान्फ्रेंस के सहयोगियों के बीच हुई वार्ताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि मतभेद बने रहने के बावजूद उन संवादों ने एक महत्वपूर्ण सिद्धांत को रेखांकित किया कि बातचीत अपने आप में महत्वपूर्ण होती है।
उन्होंने कहा, ''बातचीत अविश्वास को कम करती है, एक-दूसरे के दृष्टिकोण को मानवीय आधार पर समझने का अवसर देती है और ऐसी संभावनाओं के द्वार खोलती है, जो अन्यथा बंद रह जाते हैं। हमें उम्मीद है कि प्रधानमंत्री मोदी के शुरुआती कार्यकाल में दिखी संवाद की भावना तथा वाजपेयी और मनमोहन सिंह जैसे नेताओं के प्रयास एक बार फिर देखने को मिलेंगे।''
मीरवाइज ने कहा, ''शांति हासिल करना कठिन हो सकता है। संवाद की प्रक्रिया धीमी हो सकती है। कूटनीति में धैर्य की आवश्यकता होती है लेकिन यही वे सबसे विश्वसनीय माध्यम हैं, जिनके जरिए विवादों का समाधान किया जा सकता है और बेहतर भविष्य सुनिश्चित किया जा सकता है।''
भाषा
राखी अविनाश
अविनाश
2606 2013 श्रीनगर