दिल्ली की हवा में हर समय बदलते रहते हैं प्रदूषण कणों का स्तर
माधव
- 23 Jun 2026, 06:26 PM
- Updated: 06:26 PM
(अहेली दास)
नयी दिल्ली, 23 जून (भाषा) दिल्ली में हवा को प्रदूषित करने वाले मुख्य तत्वों का हर घंटे विश्लेषण करने पर पता चला कि दिन के अलग-अलग समय पर प्रदूषण का स्तर घटता-बढ़ता रहता है। इससे हवा की खराब गुणवत्ता के कारणों और प्रदूषण कम करने के उपायों के सबसे असरदार समय के बारे में अहम जानकारी मिलती है।
विश्लेषण से पता चलता है कि दिल्ली के प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए न केवल मौसमी रणनीतियों, बल्कि समय-विशेष के अनुसार उपायों की भी जरूरत हो सकती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि पीएम2.5, पीएम10 और ओजोन जैसे प्रदूषकों के स्तर में रोजाना अलग-अलग तरह के बदलाव दिखते हैं, जिन पर यातायात से निकलने वाले धुएं और धूल के दोबारा हवा में उड़ने से लेकर मौसम की स्थितियों और सूरज की रोशनी से होने वाली रसायनिक प्रतिक्रियाओं तक का असर पड़ता है।
शोध एवं परामर्श विचारक संस्था 'एनवायरोकैटलिस्ट्स' द्वारा बनाए गए एक सार्वजनिक डैशबोर्ड में एक नयी विशेषता जोड़ी गयी है। यह फीचर 2015 से केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के हर घंटे के वायु गुणवत्ता के दर्ज आंकड़ों को एकत्र करता है, जिससे उपयोगकर्ता अलग-अलग प्रदूषकों और मौसमों के हिसाब से लंबे समय की प्रवृत्ति पर नजर रख सकते हैं।
'पीटीआई-भाषा' ने 15 अप्रैल से 15 जून, 2026 (गर्मी) और एक दिसंबर, 2025 से 31 जनवरी, 2026 (सर्दी) के आंकड़ों का विश्लेषण किया। इसमें कण प्रदूषण (पार्टिकुलेट मैटर) और ओज़ोन के व्यवहार में काफी अंतर पाया गया, जो राजधानी में वायु प्रदूषण की चुनौती की जटिलता को दिखाता है।
पीएम2.5 को सबसे खतरनाक प्रदूषकों में से एक माना जाता है क्योंकि यह फेफड़ों में गहराई तक जा सकता है और रक्तप्रवाह में प्रवेश कर सकता है; इसमें मौसम के अनुसार काफी उतार-चढ़ाव देखा गया।
गर्मियों में, रात और सुबह-सुबह पीएम2.5 का स्तर लगभग 61-66 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रहता था। सूरज उगने के बाद यह लगातार बढ़ता गया और सुबह 9 बजे 77 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के चरम पर पहुंच गया। इसके बाद दोपहर में स्तर कम हुआ और शाम छह बजे तक लगभग 40 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर पर आ गया, फिर सूरज डूबने के बाद यह दोबारा बढ़ने लगा।
सर्दियों में, पूरे दिन पीएम2.5 का स्तर लगातार ज्यादा बना रहा। आधी रात के आस-पास यह स्तर सबसे ज़्यादा 244 µमाइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुंच गया और दोपहर तक 180 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से ऊपर ही रहा। सबसे कम स्तर अपराह्न 3 बजे से शाम 6 बजे के बीच रहा, जब यह घटकर लगभग 140 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर हो गया, लेकिन शाम और रात में इसमें फिर से तेज़ी से बढ़ोतरी हुई।
मौसम के आधार पर की गई तुलना से पता चला कि गर्मी के मौसम में अध्ययन के दौरान पीएम2.5 की औसत सांद्रता 57 µमाइक्रोग्राम प्रति घन मीटर थी, जो सर्दियों के औसत 192 µमाइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से लगभग 70.3 प्रतिशत कम है।
गर्मियों में पीएम2.5 की सबसे ज़्यादा प्रति-घंटा सांद्रता 19 अप्रैल को सुबह 9 बजे 263 µमाइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज की गयी, जबकि सर्दियों में यह 18 जनवरी को रात 1 बजे अधिकतम 484 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज की गयी थी।
गर्मियों के 34.6 प्रतिशत दिनों और सर्दियों के 98.1 प्रतिशत दिनों में पीएम2.5 का स्तर 'राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानक' (एनएएक्यूएस) की 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की सीमा से ज्यादा रहा। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की 15 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के 24-घंटे के दिशानिर्देश की तुलना में, गर्मियों के 98.8 प्रतिशत दिनों और सर्दियों के 100 प्रतिशत दिनों में प्रदूषण का स्तर तय सीमा से ज़्यादा रहा।
पीएम10 के स्तर में भी मौसम के अनुसार काफी उतार-चढ़ाव देखा गया, लेकिन यह पूरे साल ऊंचे स्तर पर ही बना रहा।
पार्टिकुलेट मैटर के विपरीत, गर्मियों के दौरान ओज़ोन एक ज़्यादा बड़ी चिंता के रूप में सामने आया।
गर्मियों में रात और तड़के ओज़ोन का स्तर कम (औसतन 18-20 µमाइक्रोग्राम प्रति घन मीटर) रहता था, लेकिन सूरज उगने के बाद इसमें तेज़ी से बढ़ोतरी होती थी। सुबह के बाद यह स्तर 50 µमाइक्रोग्राम प्रति घन मीटर को पार कर जाता था और अपराह्न 3 से 4 बजे के बीच 65 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के उच्चतम स्तर पर पहुंच जाता था, जिसके बाद सूरज डूबने पर इसमें कमी आती थी।
सर्दियों में, दिन के समय ओज़ोन की मात्रा भी बढ़ी, लेकिन इसकी शुरुआत रात के निचले स्तरों से हुई। शाम को तेज़ी से घटने से पहले, अपराह्न तीन बजे सांद्रता लगभग 75 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के चरम पर पहुंच गयी।
'एनवायरोकैटलिस्ट्स' में स्वच्छ वायु कार्यक्रम प्रबंधक, जिनीथा वर्गीज ने कहा, "गर्मियों में सुबह के समय पीएम2.5 और पीएम10 का स्तर बढ़ना वाहनों से निकलने वाले धुएं, सड़क की धूल और सूरज उगने के बाद इंसानी गतिविधियों के बढ़ने का नतीजा है। सर्दियों में रात के समय कण प्रदूषण का बढ़ना परिवहन और उद्योग से होने वाले भारी उत्सर्जन के साथ-साथ स्थिर वायुमंडलीय स्थितियों का असर दिखाता है, जो प्रदूषकों को जमीन के करीब ही रोककर रखती हैं।"
भाषा प्रशांत माधव
माधव
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