शिवसेना(उबाठा) के टूटने की वजह हिंदुत्व से दूरी और 2019 में एमवीए का प्रयोग : संजय जाधव
मनीषा
- 23 Jun 2026, 05:53 PM
- Updated: 05:53 PM
छत्रपति संभाजीनगर, 23 जून (भाषा) शिवसेना (उबाठा) के बागी सांसद संजय जाधव ने एकनाथ शिंदे नीत शिवसेना में शामिल होने के फैसले का बचाव करते हुए मंगलवार को कहा कि हिंदुत्व की विचारधारा से दूरी, शीर्ष नेतृत्व में बदलाव की मांग को अस्वीकार करना और 2019 में एमवीए में शामिल होने का फैसला पार्टी में बिखराव का कारण बना।
उन्होंने शिवसेना(उबाठा) के नेतृत्व और पार्टी के जन-प्रतिनिधियों के बीच बढ़ती दूरी और जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत करने में नाकामी को भी पार्टी के टूटने की वजह बताया।
जाधव ने सोमवार रात नांदेड से परभणी जाते समय एक मराठी समाचार चैनल से बातचीत में कहा कि पार्टी कार्यकर्ताओं को लगता है कि सेना (उबाठा) उन सिद्धांतों से दूर हो गई है, जिन पर शिवसेना बनी थी।
जाधव उन छह लोकसभा सदस्यों में शामिल हैं जिन्होंने उद्धव ठाकरे नीत पार्टी से बगावत कर सोमवार शाम मुंबई में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हो गए।
परभणी से लोकसभा सदस्य ने कहा, ''मैंने शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल होने का फैसला इसलिए किया क्योंकि शिवसेना(उबाठा) में हिंदुत्व के प्रति प्रतिबद्धता कम हो रही थी और लोगों को लग रहा था कि हम पार्टी की मूल विचारधारा से भटक गए हैं।''
जाधव ने आरोप लगाया कि 2019 के विधानसभा चुनावों के बाद कांग्रेस और शरद पवार नीत अविभाजित राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के साथ महा विकास आघाडी (एमवीए) के तहत गठबंधन करने के साथ ही पार्टी का पतन शुरू हो गया।
उन्होंने दावा किया, ''कार्यकर्ता अंदर से टूट चुके थे। हिंदुत्व-आधारित पार्टी अपने मूल सिद्धांतों से दूर हो गई। एमवीए प्रयोग ने हमारे पतन की शुरुआत की।''
एमवीए का 26 नवंबर 2019 को औपचारिक रूप से गठन किया गया और उद्धव ठाकरे को महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनाया गया।
जाधव ने शिवसेना(उबाठा) नेतृत्व की आलोचना करते हुए कहा कि वह 2022 में पार्टी के विभाजन के बाद कोई बड़ा जन-आंदोलन खड़ा नहीं कर पाए। एकनाथ शिंदे ने 2022 में पार्टी विभाजित कर दी जिससे उद्धव ठाकरे नीत एमवीए सरकार का पतन हो गया।
परभणी से सांसद ने कहा, ''संगठन को मजबूत करने और सड़कों पर उतरने की ज़रूरत थी, लेकिन हम कमज़ोर पड़ गए। पार्टी में एकरूपता नहीं थी। हाल के स्थानीय निकाय चुनावों के बाद कार्यकर्ता हतोत्साहित हो गए थे।'' उन्होंने कहा कि शिवसेना(उबाठा) नेतृत्व ने कामकाज के कुछ पहलुओं को बेहतर बनाने की जरूरत को नजरअंदाज किया।
जाधव ने अन्य के अलावा राजनीति में प्रासंगिक बने रहने को भी अहम बताया। उन्होंने कहा, ''राजनीति हमेशा पैसे से नहीं चलती। मैं राजनीति में सक्रिय रहना चाहता था, इसलिए मुझे कोई न कोई निर्णय लेना ही था।''
शिवसेना में शामिल होने वाले छह बागी नेताओं का स्वागत करते हुए शिंदे ने कहा था कि सभी अपनी-अपनी सीट से अगला लोकसभा चुनाव लड़ेंगे।
जाधव ने दावा किया कि उनके मन में ठाकरे परिवार के प्रति कोई द्वेष की भावना नहीं है लेकिन 2019 के बाद पार्टी नेतृत्व की गलतियों की वजह से पार्टी में फूट पड़ी।
उन्होंने कहा, ''ठाकरे परिवार के प्रति मेरे मन में कोई कड़वाहट नहीं है और न ही भविष्य में कभी होगी। वे बाल ठाकरे के वंशज हैं, इसलिए उन्हें लगता है कि पार्टी पर उनका हक होना चाहिए। लेकिन यह भी सच है कि 2019 के बाद उनके (उद्धव ठाकरे के) उठाए गए कुछ कदम गलत साबित हुए।''
लोकसभा सदस्य ने कहा,''अगर उन्होंने सुधार के कदम उठाए होते, तो पार्टी में फूट नहीं पड़ती। पार्टी कार्यकर्ताओं की राय को ध्यान में रखते हुए, हमें (बागी सांसदों को) यह फैसला लेना पड़ा।''
जाधव ने शिवसेना(उबाठा) सांसद संजय राउत पर भी निशाना साधा और उन पर कई मौकों पर पार्टी की छवि खराब करने और आसानी से उपलब्ध न होने का आरोप लगाया।
परभणी के सांसद ने कहा, ''नेतृत्व को यह तय करना चाहिए कि किसी खास नेता को कितना महत्व दिया जाए। राउत कभी-कभी पार्टी का अच्छा समर्थन करते हैं, तो कभी उसकी छवि को नुकसान पहुंचाते हैं। वे लंबे समय से जन-प्रतिनिधि रहे हैं, लेकिन सांसदों के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल करना लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।'' उन्होंने दावा किया कि राउत आम लोगों की तो बात ही छोड़िए, शिवसेना(उबाठा) के निर्वाचित जन प्रतिनिधियों के फोन कॉल का भी जवाब नहीं देते हैं।
शिवसेना के साथ अपने लंबे जुड़ाव का ज़िक्र करते हुए जाधव ने कहा कि वह 1986 से पार्टी के साथ हैं और उन्होंने संघर्ष करके यह मुकाम हासिल किया है।
भाषा धीरज मनीषा
मनीषा
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