मैंने किसी फिल्म को दर्शकों को इतनी खामोशी से देखते हुए नहीं देखाः 'मैं वापस आउंगा' पर इम्तियाज अली
पवनेश
- 17 Jun 2026, 04:32 PM
- Updated: 04:32 PM
(बेदिका)
नयी दिल्ली, 17 जून (भाषा) फिल्म निर्देशक इम्तियाज अली जब भी अखबार देखते तो उनके मन में विस्थापन और तबाही की सुर्खियों को विभाजन की अपनी कहानी से जोड़ने की इच्छा होती। उन्होंने अपने इसी दृष्टिकोण को "मैं वापस आऊंगा" में साकार किया है। यह फिल्म अतीत से वर्तमान तक, और भारतीय उपमहाद्वीप से लेकर दुनिया के बाकी हिस्सों तक फैले घटनाक्रम को एक सूत्र में पिरोती है।
इम्तियाज अली ने 'पीटीआई-भाषा' को दिए एक साक्षात्कार में कहा, ''मैं लगातार ऐसी खबरें पढ़ रहा था कि कहीं तबाही मची है, कहीं युद्ध छिड़ा हुआ है और बड़ी संख्या में लोग घर-बार छोड़ने को मजबूर होकर शरणार्थी बन रहे हैं तथा अस्तित्व के संकट का सामना कर रहे हैं... यह सब देखकर मेरे मन में बार-बार यही ख्याल आता था कि विभाजन के समय भी ठीक ऐसा ही हुआ था।''
निर्देशक ने मंगलवार को अपना 55वां जन्मदिन मनाया। उनके लिए जन्मदिन का सबसे बड़ा उपहार संभवतः इस फिल्म को मिल रही प्रतिक्रिया है। इस फिल्म में नसीरुद्दीन शाह, दिलजीत दोसांझ, वेदांग रैना और शरवरी मुख्य भूमिकाओं में है। दर्शकों, खासकर युवाओं का शांत होकर बैठना और कहानी से जुड़ाव महसूस करना इस बात को दर्शाता है कि 95 वर्षीय एक व्यक्ति द्वारा सीमा के उस पार छूट गए अपने प्रेम को याद करने की यह कहानी उन्हें गहराई से छू रही है।
फिल्म की कहानी बुजुर्ग (शाह) द्वारा अपने पोते (दोसांझ) को सुनाई गई अतीत की यादों के जरिए आगे बढ़ती है, जिसके सहारे पोता विभाजन के दर्द और दशकों पुराने उस अमर प्रेम की कहानी को समझने की कोशिश करता है।
फिल्म के अंत में जब कलाकारों और तकनीकी टीम के नाम पर्दे पर आते हैं तब युद्ध, बमबारी और हिंसा की समकालीन घटनाओं की खबरों के दृश्य दिखाए जाते हैं। दुनिया भर से विभिन्न समुदायों और जातियों के विस्थापित लोगों की झलकियां भी सामने आती हैं। साथ ही, इन सबके बीच मुस्कुराते हुए बच्चों के दृश्य आशा का संदेश भी देते हैं।
इसे शांति के संदेश वाले गीत "क्या कमाल है" की पृष्ठभूमि में दर्शाया गया है, जिसे दोसांझ ने आवाज़ दी है और जिसका संगीत ए.आर रहमान ने तैयार किया है। एक शरणार्थी का अज्ञात उद्धरण इस पूरे दृश्य को जोड़ता है: "अगर मेरे पास अपनी मौत और अपना घर छोड़ने में से किसी एक को चुनने का विकल्प होता, तो मैं खुशी-खुशी मौत को गले लगा लेता। दुर्भाग्य से, मेरे पास ऐसा कोई विकल्प नहीं था।"
अली ने कहा, ''मुझे लगा कि 'इसे फिल्म के अंत में रखते हैं'। हमने ऐसे लोगों के वास्तविक वीडियो भी प्रस्तुत किए जो अपने घरों से बिछुड़ने की पीड़ा झेल रहे हैं, ठीक वैसे ही जैसे 1947 में हुआ था। मैं इन दृश्यों को आपस में जोड़ना चाहता था और इसी वजह से मैंने इस गाने को इसके लिए चुना।"
'जब वी मेट', 'रॉकस्टार', 'लव आज कल' और 'अमर सिंह चमकीला' जैसी फिल्में बना चुके निर्देशक दर्शकों की प्रतिक्रिया जानने के लिए विभिन्न सिनेमाघरों का दौरा कर रहे हैं।
निर्देशक के लिए यह एक बेहद सुखद और संतोषजनक अनुभव रहा है।
अली ने कहा, "मुझे लग रहा है कि जो बात मैं कहना चाहता था, वह दर्शकों तक सही तरीके से पहुंच गई है... मैंने कभी किसी फिल्म को दर्शकों द्वारा इतनी शांति से देखते नहीं देखा। मेरी पिछली सफल फिल्मों में भी लोग बीच-बीच में हिलते-डुलते रहते थे, लेकिन इस बार सभी पूरी तरह ध्यान से देख रहे हैं। विशेषकर युवा दर्शक इसे बहुत ध्यान से देख रहे हैं। वे इतनी बड़ी संख्या में सिनेमाघर आ रहे हैं और फिल्म को बेहद सकारात्मक प्रतिक्रिया दे रहे हैं।''
रिश्तों पर अपनी अनूठी फिल्मों के लिए मशहूर निर्देशक इस बात से विशेष रूप से खुश हैं कि कहानी के केंद्र में मौजूद "आत्मीयता और आपसी स्नेह" की भावना से युवा वर्ग खुद को गहराई से जोड़ पा रहा है।
उन्होंने कहा कि यह फिल्म पीढ़ियों के बीच के संबंधों को खोजने के बारे में है, जो वर्तमान को समझने के लिए जरूरी हैं।
अली ने कहा, ''78 साल पहले के हालात बिल्कुल अलग थे और उस दौर में लोगों को जीवित रहने के लिए जिन परिस्थितियों से गुजरना पड़ा, वह तौर-तरीका अलग था। आज (फिल्म के मुख्य किरदार) निरवैर (दोसांझ) के पास उस अतीत से दोबारा जुड़ने का मानसिक अवसर और सुकून है, और उसे ऐसा करना भी चाहिए। अगर वह ऐसा नहीं करता है, तो वह मन से कभी खुद को पूरा या शांत महसूस नहीं कर पाएगा।''
उन्होंने कहा कि विभाजन की इस कहानी को पर्दे पर उतारने के पीछे उनका मकसद यह है कि फिल्म देखने वाले लोग अपने भीतर की इंसानियत और मानवीय संवेदनाओं को जगा सकें।
भाषा सुमित पवनेश
पवनेश
1706 1632 दिल्ली