महाराजा के दिये तोहफे से जमीन विवाद का केंद्र बना जयपुर पोलो ग्राउंड
रंजन
- 13 Jun 2026, 07:11 PM
- Updated: 07:11 PM
(वर्षा सागी)
नयी दिल्ली, 13 जून (भाषा) जयपुर के महाराजा सवाई मान सिंह द्वितीय ने करीब 100 साल पहले दिल्ली की अपनी जमीन का एक हिस्सा दिल्ली पोलो क्लब को तोहफे में दिया था लेकिन वर्तमान में ऐतिहासिक जयपुर पोलो ग्राउंड अपने भविष्य को लेकर कानूनी लड़ाई लड़ने को मजबूर है।
मशहूर शासक और पोलो खिलाड़ी के नाम पर बना दिल्ली के रेस कोर्स इलाके में यह 15.2 एकड़ का मैदान लंबे समय से भारत के सबसे प्रतिष्ठित और पुराने पोलो मैदानों में से एक माना जाता रहा है।
पीढ़ियों से यहां देश के कुछ सबसे बड़े पोलो टूर्नामेंट आयोजित होते रहे हैं और यह उस खेल परंपरा से गहराई से जुड़ा रहा है। इसकी जड़ें भारत के रियासती दौर से जुड़ी हैं।
केंद्रीय आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय के तहत आने वाले भूमि एवं विकास कार्यालय के अधिकारियों ने 20 मई को जारी बेदखली के आदेश के बाद शनिवार को जमीन का कब्जा ले लिया।
आदेश में जमीन के टुकड़े के लिए 'बड़े जनहित और फायदे' का जिक्र किया गया था लेकिन इसके प्रस्तावित इस्तेमाल के बारे में साफ तौर पर कुछ नहीं बताया गया।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने आठ जून को जिला अदालत को बेदखली के नोटिस पर रोक लगाने का अनुरोध करने वाली इंडियन पोलो एसोसिएशन की याचिका पर फैसला लेने का निर्देश दिया था।
जिला अदालत ने हालांकि अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया, जिसके बाद अधिकारियों ने संपत्ति का कब्जा लेने की कार्रवाई शुरू कर दी।
एसोसिएशन के मुताबिक, यह जमीन पहले दिल्ली के जयपुर एस्टेट का हिस्सा थी और जयपुर के पूर्व राजपरिवार की थी। करीब 1930 में महाराजा सवाई मान सिंह द्वितीय ने यह मैदान दिल्ली पोलो क्लब को उपहार में दिया था।
इसके बाद यह दिल्ली में पोलो खेल के सबसे महत्वपूर्ण केंद्रों में से एक बन गया।
एसोसिएशन की ओर से वकील मेजर निर्विकार सिंह (सेवानिवृत्त) ने कहा कि सवाई मान सिंह द्वितीय अपने समय के सबसे बेहतरीन पोलो खिलाड़ियों में गिने जाते थे और उनके नेतृत्व में जयपुर पोलो टीम ने 20वीं सदी के शुरुआती व मध्य वर्षों में इस खेल में लंबे समय तक दबदबा बनाए रखा।
उन्होंने कहा कि यह भारत के सबसे पुराने पोलो मैदानों में से एक है और लंबे समय से देश में पोलो के सबसे प्रतिष्ठित मैदानों में माना जाता है।
सिंह ने कहा कि यहां हर साल दिल्ली के शीतकालीन और वसंतकालीन पोलो सत्र आयोजित किए जाते हैं।
दशकों के दौरान जयपुर पोलो ग्राउंड देश में पोलो के सबसे प्रतिष्ठित और पसंदीदा मैदानों में से एक बन गया।
यहां कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पोलो टूर्नामेंट आयोजित किए गए।
सिंह ने कहा कि इस मैदान में एशियाई खेलों से जुड़े मुकाबलों, एसोसिएशन राष्ट्रीय पोलो चैंपियनशिप और इंडियन मास्टर्स ट्रॉफी सहित कई प्रमुख घुड़सवारी प्रतियोगिताओं का भी आयोजन हुआ।
उन्होंने कहा कि यह कोई सामान्य सदस्यता वाला क्लब नहीं बल्कि पोलो खेल को बढ़ावा देने के लिए समर्पित एक खेल परिसर है।
वकील ने कहा, "इसने अर्जुन पुरस्कार विजेताओं सहित कई पीढ़ियों के खिलाड़ियों को आगे बढ़ने का अवसर दिया है। जयपुर के अलावा यह देश के उन गिने-चुने मैदानों में से एक है, जो विशेष रूप से पोलो खेल के लिए समर्पित हैं।"
इस मैदान का इतिहास भूमि से जुड़े एक लंबे कानूनी विवाद से भी जुड़ा रहा है। एसोसिएशन के अनुसार, 1951 में केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (सीपीडब्ल्यूडी) ने इस संपत्ति के लिए 20 वर्ष के पट्टे पर हस्ताक्षर किए थे और इसके बाद भी यहां पोलो गतिविधियां जारी रहीं।
एसोसिएशन के मुताबिक, 1971 में पट्टे की अवधि समाप्त होने के बाद इसे समय-समय पर उन्हीं शर्तों पर बढ़ाया जाता रहा और यह व्यवस्था 1982 के अंत तक जारी रही।
इसके बाद 1983 में एक बड़ा बदलाव आया, जब दिल्ली पोलो क्लब भंग हो गया।
तब पोलो खेल की राष्ट्रीय संचालन संस्था के रूप में मान्यता प्राप्त एसोसिएशन ने इस मैदान का प्रबंधन और कब्जा अपने हाथ में ले लिया।
एसोसिएशन का कहना है कि 1983 और 1984 में जारी सरकारी पत्रों में इस मैदान के प्रबंधन के
एसोसिएशन को हस्तांतरण का उल्लेख किया गया था और पट्टा व्यवस्था भी उसके पक्ष में आगे बढ़ाई गई थी।
एसोसिएशन के अनुसार, 1991 के एक सरकारी पत्र में जयपुर पोलो ग्राउंड को एक ऐतिहासिक मैदान बताया गया था, जहां नयी दिल्ली की स्थापना के समय से ही पोलो खेला जाता रहा है।
उस पत्र में पट्टे को नवीनीकृत करने की सिफारिश की गई थी।
पत्र में कहा गया था कि दिल्ली रेस क्लब से जुड़ी गतिविधियों को कहीं और स्थानांतरित करने की योजनाओं में समय लग सकता है और इस विषय पर बाद में विचार किया जा सकता है।
एसोसिएशन का कहना है कि वह आज भी मैदान का किराया चुकाता है और मैदान उसके कब्जे में है।
एसोसिएशन ने दलील दी कि वर्षों के दौरान सरकारी अधिकारियों द्वारा जारी किए गए नोटिस और अन्य पत्राचार यह दिखाते हैं कि सरकार इस पट्टे व्यवस्था को लेकर लगातार संपर्क और संवाद में रही है।
एसोसिएशन का यह भी कहना है कि उसने 31 मार्च 2030 तक की अवधि के लिए अप्रैल 2025 में 30,400 रुपये किराये के रूप में जमा किए थे और यह भुगतान सरकार के ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से स्वीकार भी किया गया था। हालांकि, सरकार का पक्ष अलग है।
सरकार का कहना है कि इस जमीन का पट्टा मार्च 1993 में ही समाप्त हो गया था और उसके बाद से एसोसिएशन बिना किसी वैध अधिकार के इस भूमि पर कब्जा किए हुए है।
भाषा जितेंद्र रंजन
रंजन
1306 1911 दिल्ली