भारत में मंदिर-मस्जिद संबंधी विवाद: कृष्ण जन्मभूमि, काशी विश्वनाथ और अन्य
माधव
- 16 May 2026, 08:42 PM
- Updated: 08:42 PM
नयी दिल्ली, 16 मई (भाषा) मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को फैसला सुनाया कि धार जिले में भोजशाला-कमल मौला मस्जिद का विवादित स्थल देवी सरस्वती को समर्पित मंदिर है। यह मामला देश में उपासना स्थलों के धार्मिक स्वरूप से संबंधित प्रमुख कानूनी मामलों में से एक है।
उच्च न्यायालय ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के दशकों पुराने उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें केवल मुस्लिम समुदाय को ही उस स्थल पर शुक्रवार की नमाज अदा करने की अनुमति दी गई थी, जबकि परिसर के भीतर हिंदुओं के पूजा करने के अधिकार को प्रतिबंधित किया गया था।
अयोध्या से जुड़े मामले, जिसमें 2019 में उच्चतम न्यायालय के आदेश के बाद राम मंदिर का निर्माण हुआ, के अलावा कुछ अन्य समान महत्वपूर्ण मामले भी हैं।
इनमें से अधिकतर मामलों में, उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 का हवाला मुकदमेबाजी के दौरान दिया गया है, जो किसी स्थान के धार्मिक चरित्र को 15 अगस्त, 1947 को मौजूद स्थिति के अनुसार बनाए रखने की बात करता है।
वर्ष 1991 के कानून के विभिन्न प्रावधानों को चुनौती देने वाली छह से अधिक याचिकाएं उच्चतम न्यायालय में विचाराधीन हैं।
***कृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह मस्जिद, मथुरा, उत्तर प्रदेश
यह मामला मथुरा में स्थित 13.37 एकड़ के परिसर से संबंधित है, जिसमें भगवान कृष्ण का जन्मस्थान माना जाने वाला कृष्ण जन्मभूमि मंदिर परिसर और शाही ईदगाह मस्जिद शामिल हैं।
जहां एक ओर हिंदू समुदाय का दावा है कि शाही ईदगाह मस्जिद का निर्माण मुगल सम्राट औरंगजेब के शासनकाल में 17वीं शताब्दी के दौरान देवता के जन्मस्थान पर स्थित एक पुराने मंदिर के ऊपर किया गया था, वहीं मुस्लिम पक्ष ने उपासना स्थल अधिनियम, 1991 का हवाला दिया है।
देवता के 'अगले मित्र' कहे जाने वाले हिंदू उपासकों और संगठनों द्वारा जमीन पर कब्जा पाने और मंदिर को बहाल करने के लिए दायर किए गए 18 मुकदमे इलाहाबाद उच्च न्यायालय में लंबित हैं।
उच्च न्यायालय ने 1 अगस्त, 2024 को मुस्लिम पक्ष की उन अर्जियों को खारिज कर दिया, जिनमें हिंदू उपासकों के मुकदमों की वैधता को चुनौती दी गई थी।
इसी आदेश में अदालत ने यह भी कहा कि ये मुकदमे परिसीमा अधिनियम, वक्फ अधिनियम और उपासना स्थल अधिनियम, 1991 द्वारा वर्जित नहीं हैं।
***काशी विश्वनाथ मंदिर-ज्ञानवापी मस्जिद, वाराणसी, उत्तर प्रदेश
वाराणसी में एक-दूसरे से सटे दो धार्मिक स्थलों को लेकर जारी विवाद, अयोध्या और मथुरा के साथ-साथ तीन सबसे चर्चित मामलों में से एक है। हिंदू पक्ष का दावा है कि मूल काशी विश्वनाथ मंदिर को औरंगजेब के शासनकाल के दौरान ध्वस्त कर दिया गया था और उसके ऊपर ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण किया गया था।
मुस्लिम पक्ष का कहना है कि यह विवाद उपासना स्थल अधिनियम के तहत वर्जित है, क्योंकि वे सदियों से लगातार मस्जिद में नमाज अदा करते आ रहे हैं।
वर्ष 2021 में, पांच महिलाओं ने वाराणसी की एक अदालत में प्रार्थना करने की अनुमति मांगने के लिए मुकदमा दायर किया। बाद में किए गए सर्वेक्षण में वज़ूखाने के अंदर एक ''शिवलिंग'' मिला, जिसे मुस्लिम पक्ष एक फव्वारे की व्यवस्था का हिस्सा बताता है।
वर्ष 2022 में, शीर्ष अदालत ने उस स्थान को संरक्षित किया जहां ''शिवलिंग'' मिला था और साथ ही यह निर्देश भी दिया कि मुस्लिम उपासकों को मस्जिद तक पहुंचने में कोई बाधा नहीं डाली जानी चाहिए।
इसने 2024 में, वाराणसी अदालत के उस आदेश पर रोक लगाने से भी इनकार कर दिया था जिसमें मस्जिद के अंदर ''व्यास जी का तहखाना'' में एक हिंदू पुजारी को दैनिक रूप से पूजा-अर्चना करने की अनुमति दी गई थी।
***शाही जामा मस्जिद, संभल, उत्तर प्रदेश
वर्ष 2024 में, संभल जिला एक विवाद का केंद्र बन गया जब एक स्थानीय अदालत ने एक हिंदू श्रद्धालु द्वारा दायर मुकदमे पर शाही जामा मस्जिद का सर्वेक्षण करने का आदेश दिया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि यह एक प्राचीन हिंदू मंदिर के स्थल पर बनाई गई थी।
हिंदू पक्ष का दावा है कि शाही जामा मस्जिद का निर्माण मुगल सम्राट बाबर के शासनकाल के दौरान 1526 में भगवान विष्णु के अंतिम अवतार कल्कि को समर्पित हरिहर मंदिर को नष्ट करने के बाद किया गया था।
सर्वेक्षण के दूसरे दौर के दौरान, प्रदर्शनकारी स्थानीय लोगों की सुरक्षाकर्मियों के साथ झड़प हुई, जिसके परिणामस्वरूप चार लोगों की मौत हो गई और दर्जनों लोग घायल हो गए।
मुस्लिम पक्ष ने इस आधार पर सर्वेक्षण का विरोध किया कि इसे मस्जिद समिति की उचित सुनवाई किए बिना जल्दबाजी में कराया गया था। उसने उपासना स्थल अधिनियम के उल्लंघन का भी आरोप लगाया।
बाद में, उच्चतम न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा सर्वेक्षण कार्यवाही पर रोक लगाने से इनकार किए जाने को चुनौती देने वाली विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई करते हुए विवादित स्थल पर यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया।
*** कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद, दिल्ली
हिंदू और जैन श्रद्धालुओं ने 2021 में दिल्ली की एक दीवानी अदालत में कुतुब मीनार परिसर के अंदर हिंदू और जैन देवी-देवताओं की पुनर्स्थापना के लिए एक मुकदमा दायर किया, जिसमें दावा किया गया कि मोहम्मद गौरी की सेना के एक जनरल कुतुबदीन ऐबक द्वारा 27 मंदिरों को आंशिक रूप से ध्वस्त कर दिया गया था और उसी सामग्री का पुन: उपयोग करके परिसर के अंदर कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद का निर्माण किया गया था।
एएसआई ने कहा कि मस्जिद कुतुब परिसर के अंदर स्थित है, जो एक संरक्षित स्मारक है, और वर्तमान में वहां किसी भी प्रकार की धार्मिक पूजा की अनुमति नहीं है।
वर्ष 2021 में, अदालत ने यह कहते हुए मुकदमा खारिज कर दिया कि अतीत में हुई गलतियाँ वर्तमान और भविष्य में शांति भंग करने का आधार नहीं हो सकतीं। अपीलीय अदालत में अपील लंबित है।
***ईदगाह मैदान, हुबली (कर्नाटक)
स्थानीय अधिकारियों ने 2022 में कर्नाटक के हुबली ईदगाह मैदान में गणेश चतुर्थी समारोह की अनुमति दी, जिसका अंजुमन-ए-इस्लाम ने विरोध किया था।
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने धारवाड़ नगर आयुक्त के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि संपत्ति धारवाड़ नगरपालिका की है और अंजुमन-ए-इस्लाम केवल 999 वर्षों की अवधि के लिए 1 रुपये प्रति वर्ष के शुल्क पर पट्टेदार है।
अंजुमन-ए-इस्लाम ने दावा किया कि मैदान उपासना स्थल अधिनियम के तहत संरक्षित है, वहीं उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि यह एक धार्मिक पूजा स्थल नहीं है और इस पर केवल बकरीद और रमजान के दौरान प्रार्थना के लिए अनुमति दी गई है।
***मलाली मस्जिद, दक्षिण कन्नड़ (कर्नाटक)
मलाली मस्जिद 2022 में तब सुर्खियों में आई जब वहां जीर्णोद्धार कार्य के दौरान मस्जिद की संरचना में हिंदू शैली की स्थापत्य कला की विशेषताएं सामने आईं।
कुछ हिंदू पक्षों ने मंगलुरु की एक स्थानीय अदालत में संरचना का सर्वेक्षण कराने का अनुरोध करते हुए याचिका दायर की।
भाषा
नेत्रपाल माधव
माधव
1605 2042 दिल्ली