मीडिया संगठनों ने प्रेस की आजादी की मौजूदा स्थिति पर चिंता जताई
सुरेश
- 03 May 2026, 09:27 PM
- Updated: 09:27 PM
नयी दिल्ली, तीन मई (भाषा) विभिन्न संगठनों का प्रतिनिधित्व करने वाले कई प्रमुख पत्रकारों ने अलग-अलग स्थानों पर मीडिया पेशेवरों की वर्तमान स्थिति और प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर चिंता जताई है।
इंडियन वुमेन प्रेस कोर (आईडब्ल्यूपीसी) द्वारा रविवार को जारी एक विज्ञप्ति के अनुसार, विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आईडब्ल्यूपीसी की ओर से आयोजित एक चर्चा में प्रेस एसोसिएशन के अध्यक्ष सी के नाइक, एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के महासचिव राघवन श्रीनिवासन और दक्षिण एशिया के विदेशी संवाददाता क्लब (एफसीसी) के अध्यक्ष वाएल अव्वाद ने अपने विचार साझा किये।
विज्ञप्ति के मुताबिक, इस परिचर्चा का विषय ''वैश्विक उथल-पुथल के बीच प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा करना'' था।
इसमें कहा गया कि यह कार्यक्रम उस हालिया रिपोर्ट की पृष्ठभूमि में आयोजित किया गया था, जिसमें बताया गया है कि रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स द्वारा जारी 2026 के विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत 180 देशों में 157वें स्थान पर खिसक गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में छह स्थान की गिरावट है।
इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ प्रेस क्लब्स (आईएपीसी) के अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी निभा रहे अव्वाद ने चेतावनी दी कि संवाददाताओं पर हमले आकस्मिक घटनाओं से हटकर जानबूझकर किए जाने लगे हैं।
अव्वाद ने कहा, ''यह सच को सामने आने से रोकने के लिए एक सुनियोजित प्रयास का हिस्सा है।'' उन्होंने जमीनी स्तर पर पत्रकारों की सुरक्षा के लिए मजबूत अंतरराष्ट्रीय तंत्र की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित किया।
श्रीनिवासन ने उद्योग के भीतर मौजूद गहरी संरचनात्मक विफलताओं की ओर इशारा करते हुए कहा, ''मीडिया में कई परेशान करने वाले रुझान सामान्य हो गए हैं, जिनमें स्वामित्व-प्रेरित पूर्वाग्रह से लेकर संपादकीय दबाव तक शामिल हैं।''
नाइक ने कहा, ''हम खुद ही अपने दुश्मन बन गए हैं।'' उन्होंने समन्वित प्रतिरोध की कमी और प्रेस निकायों की कमजोरी को उन गंभीर कमजोरियों में प्रमुख बताया, जब पत्रकारों को सबसे ज्यादा एकजुटता की जरूरत है।
आईडब्ल्यूपीसी की अध्यक्ष सुजाता राघवन ने परिचर्चा में समापन टिप्पणी की, ''हम यहां सामूहिक रूप से विचार-विमर्श करने, अपनी बात रखने और पत्रकारिता के लिए एक अधिक मजबूत वातावरण बनाने के लिए एकत्रित हुए हैं, जो लोकतांत्रिक मूल्यों का केंद्र बिंदु बनी हुई है।''
भाषा धीरज सुरेश
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