जब आतंकवादी हमले और हिंसा की खबरें सुर्खियों में हों, तब बच्चों से इस बारे में कैसे बात करें
पवनेश
- 02 May 2026, 03:52 PM
- Updated: 03:52 PM
(ट्रुडी मीहान, आरसीएसआई यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिसिन एंड हेल्थ साइंसेज)
डबलिन, दो मई (द कन्वरसेशन) लंदन के गोल्डर्स ग्रीन में जब एक व्यक्ति ने यहूदी लोगों पर चाकू से हमला किया और पुलिस ने इसे आतंकवादी घटना करार दिया तो यह खबर समाचारों की सुर्खियों, सोशल मीडिया और चिंतित वयस्कों की बातचीत के जरिए तेजी से फैली। जब ऐसा होता है तो बच्चे माहौल में आए इस बदलाव को महसूस कर लेते हैं।
चाहे वे टीवी बुलेटिन का कोई हिस्सा सुन लें, माता-पिता को फोन पर बात करते सुन लें या घर के माहौल में आया बदलाव महसूस कर लें, खबरें उन तक किसी न किसी तरह अक्सर तभी पहुंच जाती हैं, जब वे इसके लिए तैयार नहीं होते। सवाल यह नहीं है कि बच्चों से हिंसा और डर के बारे में बात की जाए या नहीं, असली सवाल यह है कि उनसे कैसे बात की जाए।
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि बच्चों में कठिन विषयों को समझने और उनसे उबरने की क्षमता होती है, लेकिन यह सब सहायक और सुरक्षित माहौल में होना चाहिए।
बातचीत की शुरुआत सुरक्षा के भाव से करें। सुनिश्चित करें कि आपका बच्चा सहज और सुरक्षित महसूस करे। सुरक्षा का भाव दिनचर्या, रोजमर्रा की लय बनाए रखने और छोटी-छोटी ऐसी पारिवारिक परंपराओं से आता है जो सबको यह याद दिलाती हैं कि वे साथ हैं और सुरक्षित हैं, जैसे रात में कहानी या गीत सुनाना या रात के खाने के बाद सोफे पर साथ बैठने का खास समय।
हिंसा और डर जैसे मुद्दों से निपटने की आपकी क्षमता इस बात में सबसे अहम भूमिका निभाती है कि ऐसी बातचीत के दौरान आपका बच्चा कितना सुरक्षित महसूस करेगा। अगर आप खुद बहुत परेशान या बेचैन महसूस कर रहे हैं तो बच्चों से इस विषय पर तब तक बात नहीं करें जब तक आप शांत और स्थिर महसूस नहीं करते या ऐसी बातचीत में मदद के लिए किसी और का सहयोग लें। सबसे जरूरी है कि आप ईमानदार और स्पष्ट रहें। सीधे और साफ बात करें। रूपकों, घुमा-फिराकर कही गई बातों और ''बुरे लोग'' जैसे अस्पष्ट शब्दों से बचें।
बच्चे की उम्र के हिसाब से भाषा का इस्तेमाल करें लेकिन इसे लेकर जरूरत से ज्यादा न सोचें। बीच-बीच में रुकें, सवाल पूछें और उसके चेहरे पर आने वाले उलझन के भावों को ध्यान से देखें।
बच्चे लंबे समय तक डरे नहीं रहते। वे इस प्रकार की भावनाओं से जल्दी प्रभावित होते हैं और जल्दी ही इनसे उबर भी जाते हैं इसलिए बड़ी और गंभीर बातचीत के बजाय छोटी-छोटी और बार-बार बातचीत करना बेहतर रहता है।
बाद में यह जानने के लिए फिर उनसे संवाद करें कि उन्होंने बात को कैसे समझा और कहीं कोई गलतफहमी तो नहीं है। उनसे पूछें कि क्या उनके मन में कोई सवाल है। अगर बच्चा ऊबा हुआ या रुचि न लेता हुआ दिखाई दे, तो हैरान न हों। बच्चों को वयस्कों की गंभीर बातचीत की तुलना में आनंद, खुशी और खेल ज्यादा पसंद होते हैं। इसका यह मतलब नहीं कि वे सुन नहीं रहे या बात को समझ नहीं रहे, बल्कि इसका मतलब है कि उनकी प्राथमिकताएं कुछ और हैं और यह अच्छी बात है।
डर के बीच बच्चों को स्थिर रखना
मीडिया के संपर्क को सीमित करें और बच्चों के सामने डरावनी घटनाओं पर बातचीत करने से बचने की कोशिश करें। वे हमेशा सुन रहे होते हैं और जब वे बातचीत में शामिल होने के बजाय केवल सुनते हैं तो गलतफहमी की गुंजाइश बहुत ज्यादा होती है।
अनुसंधान बताते हैं कि अगर बच्चे मीडिया के संपर्क में आते हैं और डर पैदा करने वाली घटनाओं के बारे में सुनते हैं तो यह जरूरी है कि वे जो सुनें, उसे कोई वयस्क सही तरीके से समझाए।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आप अपने और अपने बच्चे के सुरक्षा घेरे को देखें। बच्चे को याद दिलाएं कि वह यहां आपके साथ सुरक्षित है तथा वह ऐसे समुदाय का हिस्सा है जो आपका साथ देने और आपको सुरक्षित रखने के लिए मौजूद है।
द कन्वरसेशन
सिम्मी पवनेश
पवनेश
0205 1552 डबलिन