ओ़ब्रायन ने नाजी जर्मनी और भारत की घटनाओं की तुलना की, अस्वीकरण भी लिखा
पवनेश
- 10 Apr 2026, 09:05 PM
- Updated: 09:05 PM
नयी दिल्ली, 10 अप्रैल (भाषा) राज्यसभा में तृणमूल कांग्रेस के नेता डेरेक ओ'ब्रायन ने शुक्रवार को एक ब्लॉग पोस्ट में 1930 के दशक के जर्मनी और आज के भारत की घटनाओं के बीच समानताएं दिखाने की कोशिश की, लेकिन साथ ही एक 'अस्वीकरण' (डिस्क्लेमर) भी जोड़ा कि इसका मकसद किसी को बदनाम करना नहीं है और पाठक अपने विवेक का इस्तेमाल करें।
ओ'ब्रायन के ब्लॉग पर बृहस्पतिवार को प्रकाशित इस लेख में कहा गया कि 1938 में एडॉल्फ हिटलर 'टाइम मैगज़ीन' के 'पर्सन ऑफ़ द ईयर' थे और बाद में पत्रिका ने इस पर स्पष्टीकरण देते हुए कहा था कि उन्हें किसी के समर्थन के तौर पर नहीं, बल्कि उस व्यक्ति की पहचान के तौर पर चुना गया था जिसने खबरों और दुनिया की घटनाओं को सबसे ज़्यादा प्रभावित किया था।
ओ'ब्रायन ने नाज़ी-युग के जर्मनी के ऐतिहासिक संदर्भों की तुलना भारत के मौजूदा विधायी और प्रशासनिक उपायों से की, और कई राज्यों में लागू धर्मांतरण विरोधी कानूनों का ज़िक्र किया, खास तौर पर उन कानूनों का जो शादी से जुड़े धर्मांतरण को विनियमित करते हैं। उन्होंने नाजी कानूनों के तहत अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच रिश्तों पर लगाई गई पाबंदियों के बारे में भी लिखा।
ब्लॉग में आगे धार्मिक आयोजनों के दौरान कुछ कारोबारियों की पहचान से जुड़े हालिया निर्देशों और बयानों की ओर भी इशारा किया गया, और नाज़ी जर्मनी में कारोबारों के बहिष्कार और उन्हें निशाना बनाए जाने के ऐतिहासिक किस्सों का ज़िक्र किया गया।
इसके बाद इसमें राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) द्वारा स्कूली किताबों में किए गए बदलावों का ज़िक्र किया गया, और साथ ही उस ऐतिहासिक दौर में किताबों पर सेंसरशिप लगाने और उन्हें नष्ट करने की घटनाओं के उदाहरण भी दिए गए।
मीडिया की आज़ादी के मुद्दे पर, तृणमूल कांग्रेस सांसद ने उन भारतीय पत्रकारों का ज़िक्र किया जिनके खिलाफ गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) जैसे कानूनों के तहत कार्रवाई की गई, और इसकी तुलना करते हुए 1930 के दशक में जर्मनी में प्रेस पर सरकार के नियंत्रण की ओर भी इशारा किया गया।
तृणमूल कांग्रेस नेता ने ब्लॉग में एक अस्वीकरण भी जोड़ा, जिसमें कहा गया है कि अगर किसी वास्तविक व्यक्ति या घटना से कोई समानता पाई जाती है, तो वह महज़ एक संयोग है; और इस लेख का मकसद किसी भी व्यक्ति या समूह को बदनाम करना या उसके बारे में गलत जानकारी देना नहीं है।
भाषा वैभव पवनेश
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