नकद बरामदगी मामला: न्यायाधीश यशवंत वर्मा ने इस्तीफा दिया, महाभियोग की प्रक्रिया निष्प्रभावी हुई
माधव
- 10 Apr 2026, 08:59 PM
- Updated: 08:59 PM
(पवन सिंह)
नयी दिल्ली/इलाहाबाद, 10 अप्रैल (भाषा) विवादों में घिरे इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपना इस्तीफा सौंप दिया है, जिससे उनके खिलाफ जारी महाभियोग की कार्यवाही निष्प्रभावी हो गई है।
पिछले साल न्यायमूर्ति वर्मा के दिल्ली स्थित आवास से जले हुए नोटों की गड्डियां बरामद होने के बाद से वह आलोचनाओं का सामना कर रहे हैं।
अधिकारियों ने शुक्रवार को कहा कि न्यायमूर्ति वर्मा के तत्काल प्रभाव से इस्तीफे के बाद अब लोकसभा द्वारा उन्हें पद से हटाने संबंधी प्रस्ताव पर जारी कार्यवाही स्वत: निष्प्रभावी हो गई है।
न्यायाधीश ने नौ अप्रैल को राष्ट्रपति मुर्मू को अपना त्यागपत्र भेजा।
संसद द्वारा पद से हटाए जाने की प्रक्रिया को रोकने के लिए भ्रष्टाचार के आरोपी न्यायाधीश के लिए इस्तीफा ही एकमात्र विकल्प बचा था। इस प्रक्रिया को आमतौर पर 'महाभियोग' कहा जाता है।
न्यायाधीश को पांच जनवरी, 2031 को सेवानिवृत्त होना था।
दिल्ली उच्च न्यायालय के तत्कालीन न्यायाधीश न्यायमूर्ति वर्मा के दिल्ली स्थित आवास में 14 मार्च, 2025 को होली की रात लगभग 11 बजकर 35 मिनट पर आग लगने के बाद भारी मात्रा में नकदी मिलने का दावा किया गया था। आग बुझाने के लिए अग्निशमन विभाग के कर्मचारी मौके पर पहुंचे और आग पर काबू पाया।
नौ अप्रैल को राष्ट्रपति को भेजे गए एक पत्र में 57 वर्षीय न्यायमूर्ति वर्मा ने कहा कि वह ''अत्यंत दुख'' के साथ अपना इस्तीफा दे रहे हैं और इस पद पर सेवा करना उनके लिए सम्मान की बात थी।
राष्ट्रपति को भेजे गए त्यागपत्र में उन्होंने कहा, ''राष्ट्रपति महोदया, मैं आपके सम्मानित कार्यालय पर उन कारणों का बोझ नहीं डालना चाहता जिनके चलते मुझे यह पत्र प्रस्तुत करना पड़ रहा है, लेकिन अत्यंत पीड़ा के साथ मैं इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पद से तत्काल प्रभाव से अपना त्यागपत्र दे रहा हूं। इस पद पर सेवा करना मेरे लिए सम्मान की बात रही है।''
वर्मा के इस्तीफे के कारण उन्हें उनके पद से हटाने के उद्देश्य से लंबित महाभियोग की कार्यवाही अब निष्प्रभावी हो जाती है।
इस बीच 'इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन' के अध्यक्ष राकेश पांडेय ने कहा कि न्यायमूर्ति वर्मा को काफी पहले इस्तीफा दे देना चाहिए था।
उन्होंने 'पीटीआई भाषा' से कहा, "न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा को इस्तीफा ही देना था तो काफी पहले दे देते... यह हम सभी के लिए बेहतर रहता। इससे अनावश्यक विवाद पैदा होता रहा। इससे सभी की- उच्च न्यायालय, पूरी न्यायपालिका और स्वयं उनकी भी छवि धूमिल हुई।"
पांडेय ने कहा, "अगर वह लड़ रहे थे तो उन्हें लड़ते रहना चाहिए था, और अगर इस्तीफा देना था तो इसे शुरू में ही दिया जा सकता था। उन्होंने अब जाकर इस्तीफा दिया है तो भी यह स्वागत योग्य कदम है... उन्होंने समझदारी का काम किया।"
किसी संवैधानिक न्यायालय के न्यायाधीश को केवल संसद द्वारा पारित महाभियोग प्रस्ताव के माध्यम से ही पद से हटाया जा सकता है।
न्यायमूर्ति वर्मा ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा नियुक्त जांच समिति को एक अलग पत्र भी लिखा और अपनी ''व्यथा'' व्यक्त की। उन्होंने जांच से खुद को अलग करने के कारण भी बताए।
न्यायाधीश ने कहा कि उनकी लगातार भागीदारी से उस पूर्व जांच को वैधता मिल जाती, जिसमें उनसे उनके आवास से मिले धन के स्रोत पर "ऐसे प्रश्न का उत्तर देने" के लिए कहा गया था, जिसका उत्तर देना संभव नहीं था।
अपने 13 पृष्ठ के पत्र में न्यायमूर्ति वर्मा ने कहा कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में अपने 11 वर्षों से अधिक के पूरे करियर में उन पर कभी भी भ्रष्टाचार या न्यायिक अनुचित व्यवहार का आरोप नहीं लगा।
न्यायमूर्ति वर्मा ने कहा, ''वर्तमान कार्यवाही में भाग लेना जारी रखने से उनका खुद का और संस्था दोनों को सबसे बड़ा नुकसान होता।''
उन्होंने कहा, ''इसलिए मैं तत्काल प्रभाव से इन कार्यवाहियों से खुद को अलग करता हूं और अपने वकीलों को इस संबंध में निर्देश दे दिए हैं।''
न्यायाधीश ने आरोप लगाया कि 54 में से 27 गवाह, जिन्होंने उनके खिलाफ कुछ नहीं कहा, उन्हें शीर्ष अदालत की आंतरिक जांच समिति की कार्यवाही से ''बिना किसी स्पष्टीकरण'' के हटा दिया गया। उन्होंने कहा कि ''उन पर कभी कोई आरोप तय नहीं किया गया और न ही कोई ऐसा साक्ष्य पेश किया गया जिससे यह साबित हो सके कि स्टोर रूम में नकदी मैंने रखी थी, या मेरे कहने पर रखी गई थी, या फिर मेरी जानकारी या सहमति से रखी गई थी।''
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने न्यायाधीश के इस्तीफे के मुद्दे पर भी बात की।
पणजी में संवाददाता सम्मेलन में 'पीटीआई' के एक सवाल के जवाब में बिरला ने कहा, ''जब महाभियोग प्रस्ताव संसद में आया था, तब हमने एक समिति गठित की थी। अब उनका इस्तीफा पहुंचा है या नहीं, यह केवल राष्ट्रपति कार्यालय ही बता सकता है।''
घटना के बाद महाभियोग प्रस्ताव से पहले एक पूर्व शर्त के तहत उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, मद्रास उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश मनिंद्र मोहन श्रीवास्तव और वरिष्ठ अधिवक्ता बी वी आचार्य सहित तीन सदस्यीय जांच समिति जांच कर रही थी।
न्यायमूर्ति वर्मा के मामले में कई उतार-चढ़ाव आए। उन्होंने न्यायाधीशों की दो निंदात्मक रिपोर्ट के बाद तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना की इस्तीफे की सलाह को मानने से इनकार कर दिया।
कोई विकल्प नहीं होने पर न्यायमूर्ति खन्ना ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का अनुरोध किया।
बाद में उन्हें दिल्ली उच्च न्यायालय से इलाहाबाद उच्च न्यायालय वापस भेज दिया गया।
शीर्ष अदालत ने 16 जनवरी को वर्मा की उस याचिका को खारिज कर दिया था जिसमें उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष के महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार करने के फैसले और उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए गठित समिति की वैधता को चुनौती दी थी। अदालत ने कहा था कि कानून के किसी प्रावधान का इस्तेमाल संसदीय कार्यवाही को बाधित करने के हथियार के रूप में नहीं किया जा सकता है।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने पिछले साल 12 अगस्त को न्यायमूर्ति वर्मा को हटाने के लिए बहुदलीय प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया था।
एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए शीर्ष अदालत ने पिछले साल 22 मार्च को अपनी वेबसाइट पर न्यायमूर्ति वर्मा के आवास पर भारी मात्रा में नकदी की कथित बरामदगी से संबंधित आंतरिक जांच रिपोर्ट को तस्वीरों और वीडियो के साथ अपलोड किया था।
तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश खन्ना ने 22 मार्च 2025 को जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया था।
न्यायमूर्ति वर्मा ने ''स्पष्ट रूप से'' कहा था कि भंडारगृह में कभी भी कोई नकदी न तो मेरे द्वारा और न ही मेरे परिवार के किसी सदस्य द्वारा रखी गई थी और ''(मैं) इस बात की कड़ी निंदा करता हूं कि कथित नकदी हमारी थी।''
न्यायमूर्ति वर्मा आठ अगस्त, 1992 को अधिवक्ता के रूप में अदालत से जुड़े थे। उन्हें 13 अक्टूबर, 2014 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अतिरिक्त न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया था। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त होते हैं।
उन्होंने एक फरवरी, 2016 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के स्थायी न्यायाधीश के रूप में शपथ ली जिसके बाद 11 अक्टूबर, 2021 को उन्हें दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया।
भाषा देवेंद्र माधव
माधव
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