शीर्ष अदालत ने हत्या मामले में आरोपियों की सजा निलंबित करने संबंधी आदेश निरस्त किया
माधव
- 10 Apr 2026, 08:35 PM
- Updated: 08:35 PM
नयी दिल्ली, 10 अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि दोषसिद्धि के बाद सजा के निलंबन को नियंत्रित करने वाले मापदंड, मुकदमे से पहले जमानत के चरण में लागू होने वाले मानदंडों से गुणात्मक रूप से भिन्न हैं।
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने पटना उच्च न्यायालय के उस आदेश को रद्द करते हुए की, जिसमें 2016 के एक हत्या मामले में दो दोषियों की अपील लंबित रहने के दौरान उनकी सजा को निलंबित कर दिया गया था।
पीठ ने कहा कि दोष सिद्ध होने पर, निर्दोषता की धारणा न्यायिक रूप से दोषी ठहराए जाने के निर्धारण से विस्थापित हो जाती है और अपीलीय न्यायालय के लिए सीआरपीसी की धारा 389 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग उचित सावधानी एवं संयम के साथ करना आवश्यक है।
पूर्ववर्ती दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 389 में अपील लंबित रहने के दौरान सजा के निलंबन और अपीलकर्ता को जमानत पर रिहा करने का प्रावधान था।
अदालत ने मामले में शिकायतकर्ता द्वारा दायर दो अलग-अलग अपील पर अपना फैसला सुनाया, जिसमें उच्च न्यायालय के उन आदेशों को चुनौती दी गई थी, जिनमें निचली अदालत द्वारा दो व्यक्तियों को उनकी अपील लंबित रहने के दौरान दी गई सजा को निलंबित कर दिया गया था और उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया गया था।
पीठ ने कहा, ''शुरू में ही इस बात पर जोर देना जरूरी है कि दोषसिद्धि के बाद सजा के निलंबन को नियंत्रित करने वाले मापदंड, मुकदमे से पहले जमानत के चरण में लागू होने वाले मापदंडों से गुणात्मक रूप से भिन्न हैं।''
शीर्ष अदालत के एक पूर्व फैसले का हवाला देते हुए, पीठ ने कहा कि उसमें स्पष्ट रूप से कहा गया था कि गंभीर अपराधों में सजा को नियमित रूप से निलंबित नहीं किया जाना चाहिए और अपीलीय न्यायालय को अपराध की प्रकृति, उसके किए जाने के तरीके और निचली अदालत द्वारा दर्ज किए गए निष्कर्षों की गंभीरता पर विचार करना चाहिए।
पीठ ने कहा, ''रिकॉर्ड की जांच से पता चलता है कि अभियोजन पक्ष का मामला प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्यों पर आधारित है, जिसे निचली अदालत ने विधिवत रूप से स्वीकार किया है।''
इसने कहा कि उचित परिप्रेक्ष्य में विचार किए बिना, उच्च न्यायालय ने एक आरोपी की सजा निलंबित करने और उसे जमानत पर रिहा करने में गलती की है।
इसमें कहा गया कि उच्च न्यायालय द्वारा इस परिस्थिति पर भरोसा करना कि घातक गोली का आरोप किसी अन्य सह-आरोपी पर लगाया गया था, जबकि एक आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 34 की सहायता से दोषी ठहराया गया था, ''पूरी तरह से गलत'' था।
पीठ ने कहा, ''भादंसं की धारा 34 के तहत रचनात्मक दायित्व का सिद्धांत अच्छी तरह से स्थापित है; जहां कोई अपराध एक सामान्य इरादे को आगे बढ़ाने के लिए किया जाता है, वहां प्रत्येक भागीदार उस कृत्य के निष्पादन में किए गए कार्य के लिए समान रूप से उत्तरदायी होता है।''
इसने कहा कि इस मामले में सजा को निलंबित करने का उच्च न्यायालय का निर्णय उचित नहीं था।
पीठ ने अपील स्वीकार करते हुए दोनों आरोपियों को दो सप्ताह के भीतर निचली अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया। इसने कहा कि ऐसा न करने पर निचली अदालत कानून के अनुसार उनकी हिरासत सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाएगी।
वर्ष 2016 में बक्सर में दर्ज प्राथमिकी में आरोप लगाया गया था कि शिकायतकर्ता अपने बड़े भाई के साथ मोटरसाइकिल पर अपने गांव की ओर जा रहा था, तभी आरोपियों ने उसके भाई को पकड़ लिया और उसके सिर में गोली मार दी, जिससे उसे जानलेवा चोट आई।
आरोपियों ने कथित तौर पर सूचना देने वाले पर भी गोली चलाई थी, जो बाल-बाल बच गया था।
निचली अदालत ने अगस्त 2018 में इस मामले में कुछ आरोपियों को दोषी ठहराया था, जिसके बाद उन्होंने उच्च न्यायालय में अपील दायर की थी।
अपील लंबित रहने के दौरान, उच्च न्यायालय ने सजा को निलंबित कर दिया और दो आरोपियों को जमानत पर रिहा कर दिया।
भाषा
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