न्यायालय ने बच्ची से दुष्कर्म-हत्या मामले में 'असंवेदनशील' जांच को लेकर पुलिस को फटकारा
पवनेश
- 10 Apr 2026, 06:16 PM
- Updated: 06:16 PM
नयी दिल्ली, 10 अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने गाजियाबाद में चार वर्षीय लड़की से दुष्कर्म और उसकी हत्या की जांच में ''असंवेदनशील रवैया'' अपनाने के लिए पुलिस को शुक्रवार को फटकार लगायी और पुलिस आयुक्त समेत वरिष्ठ अधिकारियों को 13 अप्रैल को मामले के रिकॉर्ड के साथ पेश होने को कहा।
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि इस मामले में अदालत की निगरानी में किसी विशेष जांच दल (एसआईटी) या केंद्रीय एजेंसी द्वारा समयबद्ध जांच की जरूरत है।
भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने मृतक बच्ची के पिता (जो एक दिहाड़ी मजदूर हैं) की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन की दलीलों पर गौर किया और मामले में अब तक राज्य पुलिस द्वारा की गई जांच के तरीके पर नाराजगी जतायी।
हरिहन ने पीठ से कहा, ''जैसे ही मैंने यह (वीडियो साक्ष्य) देखा, मेरी अंतरात्मा ने मुझे झकझोरा।'' उन्होंने मामले में न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की।
सीजेआई ने कहा, ''कथित अपराध का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि इसमें दो निजी अस्पतालों और स्थानीय पुलिस की पूरी तरह उदासीन और असंवेदनशील कार्यशैली सामने आती है।''
उन्होंने कहा, ''घटना के एक दिन बाद प्राथमिकी दर्ज की गई। अस्पतालों ने भर्ती करने से इनकार कर दिया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चलता है कि बच्ची के निजी अंग में किसी वस्तु को डाला गया था।''
हरिहरन ने न्यायालय को बताया, ''पुलिस केवल इसकी हत्या के रूप में जांच करना चाहती थी। पुलिस रिपोर्ट कहती है कि जब मामला उनके पास आया, तब तक बच्ची की मौत हो चुकी थी। जबकि एक वीडियो रिकॉर्डिंग दिखाती है कि वह जीवित थी। पड़ोसियों को शांति भंग करने के नोटिस दिए गए। कृपया वीडियो देखें।''
पीठ ने राज्य सरकार, संबंधित थाने के प्रभारी अधिकारी (एसएचओ), दोनों निजी अस्पताल - खजान सिंह मानवी हेल्थ केयर और सेंट जोसेफ (मरियम) अस्पताल तथा कार्यपालक मजिस्ट्रेट को नोटिस जारी किया।
पीठ ने कहा कि जब मामले की सूचना स्थानीय पुलिस को दी गई, तो पीड़िता के परिवार की परेशानी और बढ़ गयी।
आदेश में कहा गया है, ''मामले का संज्ञान लेने के बजाय याचिकाकर्ता और परिवार के सदस्यों के साथ मारपीट की गई। उन्हें घटना के बारे में चुप रहने को कहा गया। प्राथमिकी अगले दिन यानी 17 मार्च को दर्ज की गई।''
पीठ ने यह भी कहा कि प्राथमिकी में बाल यौन अपराध संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम या दुष्कर्म की धाराएं नहीं जोड़ी गईं, जबकि मामला स्पष्ट रूप से यौन उत्पीड़न से जुड़ा प्रतीत होता है।
पीठ ने कहा, ''ऐसा भी लगता है कि अपराध की गंभीरता का एहसास होने पर आरोपी को 18 मार्च को गिरफ्तार किया गया।''
पीठ ने पुलिस के ''मुठभेड़'' के दावे पर भी संदेह जताया और पूछा कि जब आरोपी पुलिस दल को घटना स्थल पर ले गया था तो उसके पास पिस्तौल कैसे थी।
न्यायालय ने पूछा, ''हिरासत में लिए गए व्यक्ति के पास पिस्तौल कैसे थी? आप कहते हैं कि उसे रूमाल की पहचान कराने ले जाया गया और फिर उसने पुलिस पर गोली चलाई, जिसके जवाब में पुलिस ने उस पर गोली चलाई। कृपया पुलिस रिपोर्ट पढ़ें।''
मुख्य न्यायाधीश ने कहा, ''आप यह सब गड़बड़ करते हैं और फिर आरोपपत्र दाखिल कर देते हैं।'' इसी के साथ उन्होंने राज्य के वकील के इस तर्क को स्वीकार करने से इनकार कर दिया कि जांच पूरी हो चुकी है।
पीठ ने कहा, ''हम मानते हैं कि अदालत की निगरानी में समयबद्ध तरीके से किसी एसआईटी या केंद्रीय एजेंसी से जांच कराने की आवश्यकता है। नोटिस जारी करें। उत्तर प्रदेश राज्य के स्थायी वकील को नोटिस दिया जाए। स्थिति रिपोर्ट दाखिल की जाए।''
पीठ ने कहा, ''गाजियाबाद के पुलिस आयुक्त और नंदग्राम थाने के एसएचओ व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहें। जिन निजी अस्पतालों ने बच्ची को भर्ती करने से इनकार किया, उन्हें भी नोटिस दिया जाए। मामले को सोमवार को सूचीबद्ध किया जाए।''
पीठ ने पुलिस और अस्पतालों को निर्देश दिया कि पीड़िता और उसके परिवार की पहचान उजागर न की जाए और रिकॉर्ड से ऐसी किसी भी जानकारी को हटा दिया जाए।
साथ ही, राज्य पुलिस को पीड़िता के परिवार को परेशान न करने का निर्देश दिया गया।
गौरतलब है कि 16 मार्च को बच्ची का एक पड़ोसी उसे कथित तौर पर चॉकलेट दिलाने के बहाने अपने साथ ले गया और जब बच्ची घर नहीं लौटी तो खोजबीन के दौरान उसके पिता ने उसे बेहोश और खून से लथपथ हालत में पाया।
न्यायालय ने इस बात पर भी निराशा जताई कि गाजियाबाद के दो निजी अस्पतालों ने खून से लथपथ बच्ची को भर्ती करने से इनकार कर दिया और अंततः एक सरकारी अस्पताल में उसे मृत घोषित कर दिया गया।
भाषा गोला पवनेश
पवनेश
1004 1816 दिल्ली