संस्थानों के अल्पसंख्यक दर्जे की समीक्षा हो : विहिप
सुरेश
- 11 Mar 2026, 09:35 PM
- Updated: 09:35 PM
नयी दिल्ली, 11 मार्च (भाषा) विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने बुधवार को आरोप लगाया कि कुछ अल्पसंख्यक संस्थाओं द्वारा संचालित शिक्षण संस्थानों में हिंदू छात्रों को कलावा पहनने या तिलक और बिंदी लगाने से रोका जा रहा है, जबकि ऐसे छात्रों की संख्या 95 प्रतिशत तक है।
उसने ऐसी संस्थाओं के "अल्पसंख्यक" दर्जे की समीक्षा की भी मांग की और कहा कि वह अपने तीन सप्ताह के सांसद संपर्क अभियान के दौरान संसद सदस्यों के साथ इस मुद्दे को उठाएगा।
हिंदुओं, जैन और सिखों की आबादी घटने, जबकि मुसलमानों और ईसाइयों का हिस्सा बढ़ने का आरोप लगाते हुए विहिप के महासचिव बजरंग लाल बागड़ा ने इसे "जनसांख्यिकीय असंतुलन" करार देते हुए इस पर राष्ट्रीय बहस का आह्वान किया और एक प्रभावी राष्ट्रीय जनसंख्या नीति बनाने की मांग की।
बागड़ा ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा, "ऐसे कई संस्थान हैं जहां अच्छी शिक्षा प्रदान की जाती है, और अल्पसंख्यकों द्वारा संचालित कई शिक्षण संस्थान भी हैं जहां हिंदू छात्रों के गुमराह होने के उदाहरण समय-समय पर सामने आते रहते हैं।"
उन्होंने कहा, "ऐसे कई संस्थानों में, 90 से 95 प्रतिशत तक छात्र हिंदू हैं, फिर भी उन्हें अपने हाथों में कलावा बांधने की अनुमति नहीं है। कई ईसाई स्कूलों में, प्रबंधन हमारी हिंदू लड़कियों से उनके माथे से बिंदी या तिलक हटाने के लिए कहता है।"
उन्होंने कहा, "अगर वे ग्रामीण इलाकों में चूड़ियां पहनती हैं, तो उन्हें उतारने के लिए मजबूर किया जाता है। अगर कोई महिला विवाहित है, तो वे उससे मंगलसूत्र तक उतरवा देते हैं।"
विहिप नेता ने हालांकि, स्पष्ट किया कि इस मुद्दे को सभी अल्पसंख्यक संस्थानों पर लागू करना उचित नहीं होगा।
बागड़ा ने कहा कि विहिप संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 के तहत अल्पसंख्यकों के शैक्षिक अधिकारों के अनुप्रयोग की समीक्षा करने और "अल्पसंख्यक" शब्द की स्पष्ट परिभाषा की मांग करेगी।
उन्होंने कहा, ''अनुच्छेद 29 और 30 अल्पसंख्यकों को शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और प्रशासन का विशेष अधिकार देते हैं, ताकि वे सरकार के हस्तक्षेप के बिना अपने अनुयायियों को धार्मिक शिक्षा प्रदान कर सकें, लेकिन इन प्रावधानों को लागू करने के तरीके से बड़ी विसंगतियां पैदा हो गई हैं।''
बागड़ा ने कहा, "ईसाई या मुस्लिम प्रबंधन द्वारा संचालित शिक्षण संस्थानों में अक्सर न तो ईसाई छात्र होते हैं और न ही मुस्लिम छात्र। हिंदुओं को शिक्षित करने का यह विशेष अधिकार ईसाइयों या मुसलमानों को नहीं दिया गया है।"
उन्होंने कहा कि संगठन नौ मार्च से शुरू होकर 27 मार्च तक चलने वाले तीन सप्ताह के जनसंपर्क अभियान के दौरान सांसदों के समक्ष यह मुद्दा उठाएगा।
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