उच्चतम न्यायालय ने अध्याय को फिर से लिखे जाने के संबंध में एनसीईआरटी के रुख पर चिंता जताई
पवनेश
- 11 Mar 2026, 09:06 PM
- Updated: 09:06 PM
नयी दिल्ली, 11 मार्च (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि वह एनसीईआरटी के इस रुख से चिंतित है कि कक्षा 8वीं की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से संबंधित "आपत्तिजनक" सामग्री वाले विवादास्पद अध्याय को "उचित रूप से फिर से लिखा गया" है।
न्यायालय ने एनसीईआरटी के निदेशक द्वारा दाखिल हलफनामे का हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि संशोधित अध्याय आगामी शैक्षणिक सत्र 2026-27 में शामिल किया जाएगा और लागू पाठ्यक्रम और शैक्षणिक ढांचे के अनुसार विद्यालयों में कक्षा में पठन-पाठन के लिए इसका इस्तेमाल किया जाएगा।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने कहा, ''हम एनसीईआरटी के निदेशक द्वारा हलफनामे के पैरा 15 में व्यक्त किए गए रुख से भी उतने ही चिंतित हैं।"
पीठ ने कहा, "हम निर्देश देते हैं कि यदि विषय की पाठ्यपुस्तक के अध्याय 4 को किसी भी प्रकार से फिर से लिखा गया है, तो उसे तब तक प्रकाशित नहीं किया जाएगा जब तक कि उसे संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञों वाली एक समिति द्वारा अनुमोदित नहीं किया जाता है।"
शीर्ष अदालत ने कहा कि उसे हलफनामे या किसी अन्य माध्यम से यह जानकारी नहीं दी गई है कि वे कथित विषय विशेषज्ञ कौन हैं जिन्होंने अध्याय को दोबारा "लिखा" है और किसने शैक्षणिक सत्र 2026-27 के पाठ्यक्रम में इसे शामिल करने को मंजूरी दी है।
पीठ ने कहा कि कि इस तरह का कदम न्यायपालिका या किसी भी अन्य संस्था के संबंध में पाठ्यक्रम में शामिल की जाने वाली वस्तुनिष्ठ, पारदर्शी, ईमानदार और निष्पक्ष जानकारी के संदर्भ में और अधिक जटिलता पैदा कर सकता है।
यह पीठ राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की कक्षा 8वीं की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक से संबंधित एक स्वतः संज्ञान मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसमें न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से संबंधित "आपत्तिजनक" सामग्री शामिल थी।
एनसीईआरटी निदेशक द्वारा दाखिल हलफनामे में कहा गया है कि शिक्षा मंत्रालय के विद्यालय शिक्षा और साक्षरता विभाग द्वारा 27 फरवरी को एनसीईआरटी को लिखे गए पत्र के माध्यम से जारी निर्देशों के आलोक में "विषय की पाठ्यपुस्तक के संबंधित अध्याय 4 को उचित रूप से पुनः लिखा गया है"।
सुनवाई के दौरान, पीठ ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि हलफनामे में कहा गया है कि अध्याय को "उचित रूप से फिर से लिखा" गया है। पीठ ने पूछा, "यह किसने किया है?"
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को आश्वासन दिया कि जब तक संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञों की समिति न केवल इस अध्याय की बल्कि सभी अध्यायों की जांच नहीं कर लेती, तब तक यह अध्याय पाठ्यपुस्तक में शामिल नहीं किया जाएगा।
पीठ ने सवाल किया कि उनकी चिंता व्यक्त करने के बाद इस अध्याय को किस प्रकार और किस तरह से पुनः लिखा गया।
विधि अधिकारी ने कहा, "मैं आपको आश्वस्त कर सकता हूं कि संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञों की समिति द्वारा जांच किए बिना कुछ भी आगे नहीं बढ़ेगा।"
एनसीईआरटी के निदेशक प्रोफेसर दिनेश प्रसाद सकलानी ने अदालत में दाखिल अपने हलफनामे में कक्षा 8वीं की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में विवादास्पद अध्याय को शामिल करने के लिए बिना शर्त माफी मांगी है।
उन्होंने कहा कि इस अध्याय का मसौदा प्रोफेसर मिशेल डैनिनो की अध्यक्षता में पाठ्यपुस्तक विकास दल द्वारा तैयार किया गया था, जिसमें सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्ना कुमार सदस्य थे। हलफनामे में कहा गया है, "मैं यह बयान देता हूं और निवेदन करता हूं कि उपर्युक्त व्यक्तियों का अब से एनसीईआरटी की किसी भी गतिविधि से कोई संबंध नहीं होगा।"
हलफनामे में जब्त और सील की गई पाठ्यपुस्तकों की मुद्रित प्रतियों की स्थिति बताई गई है। इसमें कहा गया है कि पाठ्यपुस्तक की कुल 82,440 प्रतियां छापी गई थीं और खुदरा ग्राहकों को बेची गई पुस्तकों की संख्या 38 थी, जिन्हें बरामद कर लिया गया है।
भाषा आशीष पवनेश
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