इच्छा-मृत्यु को उच्चतम न्यायालय की मंजूरी: हरीश राणा थे जिम और फुटबॉल प्रेमी
पवनेश
- 11 Mar 2026, 08:01 PM
- Updated: 08:01 PM
नयी दिल्ली, 11 मार्च (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को जिस 30-वर्षीय हरीश राणा को 'निष्क्रिय इच्छा-मृत्यु' का 'वरदान' दिया, वह जिम और फुटबॉल के बेहद शौकीन थे। वह 2013 में पंजाब विश्वविद्यालय से बीटेक की पढ़ाई कर रहे थे और उस मकान की चौथी मंजिल से गिर गये थे, जहां वह पीजी (सशुल्क अतिथि) के तौर पर ठहरे थे।
इस घटना में ही उनके मस्तिष्क में गंभीर चोट लगी थी और वह कोमा में चले गये थे।
उच्चतम न्यायालय ने पिछले 13 साल से कोमा में रहे हरीश राणा के ठीक होने की संभावना क्षीण होने के मद्देनजर उनका जीवन-रक्षक उपचार बंद करने की अनुमति दी।
राणा के भाई आशीष ने याद किया कि वे दोनों साथ में फुटबॉल और वीडियो गेम खेला करते थे।
उनके परिजनों और दोस्तों ने बताया कि दुर्घटना से पहले वह अत्यंत ऊर्जावान, शारीरिक रूप से सक्रिय और खेलों में गहरी रुचि रखने वाले थे।
उत्तर प्रदेश में गाजियाबाद के मूल निवासी राणा के साथ दुखद हादसा 20 अगस्त 2013 को हुआ। तीन भाई-बहनों में सबसे बड़े राणा को प्रारंभ में स्थानीय अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उनकी गंभीर स्वास्थ्य स्थिति के कारण कुछ ही घंटों में उन्हें चंडीगढ़ के पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (पीजीआईएमईआर) में स्थानांतरित करना पड़ा।
इक्कीस अगस्त 2013 से 27 अगस्त 2013 तक राणा पीजीआई, चंडीगढ़ में भर्ती रहे। इस दौरान उन्हें संरक्षणात्मक इलाज दिया गया, जिसमें एईडी (एंटिएपिलेप्टिक दवा), दर्द निवारक दवाएं, वेंटिलेशन सपोर्ट, एंटीबायोटिक्स, ट्रेकियोस्टॉमी और राइल्स ट्यूब (नाक के माध्यम से पोषण) के जरिये खाना देना शामिल था।
हालांकि राणा को 27 अगस्त 2013 को पीजीआई, चंडीगढ़ से छुट्टी दे दी गई थी, लेकिन उनकी सेहत पूरी तरह ठीक नहीं हुई थी।
छुट्टी के बाद, उनकी नाजुक स्वास्थ्य स्थिति के कारण उन्हें बार-बार अस्पताल में भर्ती होना पड़ा और जय प्रकाश नारायण ट्रॉमा सेंटर, एम्स, नई दिल्ली में उनके सिर की चोट, दौरे, निमोनिया और बेडसोर (बिस्तर पर लगातार लेटने से हुए घावों) के लिए नियमित उपचार कराना पड़ा।
न्यायालय ने बुधवार को अपनी टिप्पणी में यह भी कहा कि किसी से प्यार करना केवल खुशियों के समय उसकी परवाह करना नहीं है, बल्कि उसके सबसे दुखद और अंधकारमय क्षणों में भी उसका ख्याल रखना है। न्यायालय ने हरीश राणा के माता-पिता और भाई-बहनों की सराहना की, जिन्होंने राणा के प्रति अटूट समर्थन दिखाया।
भाषा सुरेश पवनेश
पवनेश
1103 2001 दिल्ली