कोविड-रोधी टीकाकरण के दुष्प्रभाव पर 'दोष निर्धारण के बगैर मुआवजा देने की नीति' बनाएं : न्यायालय
प्रशांत
- 11 Mar 2026, 12:09 AM
- Updated: 12:09 AM
नयी दिल्ली, 10 मार्च (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने कोविड-19 रोधी टीकाकरण के बाद होने वाले गंभीर दुष्प्रभाव के लिए ''दोष निर्धारण के बगैर मुआवजा देने की नीति'' तैयार करने का केंद्र सरकार को मंगलवार को निर्देश दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि संविधान सरकार को कल्याण और गरिमा का सक्रिय रक्षक मानता है, न कि मानव कष्ट का महज "दर्शक"।
न्यायालय ने कहा कि कोविड महामारी एक अभूतपूर्व पीड़ा और तबाही का समय था, जिसने अनगिनत परिवारों के लिए दुख और कठिनाइयां पैदा कीं। अदालत ने कहा कि दोष निर्धारण के बगैर मुआवजा देने का सिद्धांत भारतीय कानून के लिए नया नहीं है, और दुनिया के कई देशों में, इस तरह की मुआवजा योजना कल्याणकारी राष्ट्र की प्रतिक्रिया के रूप में मान्यता प्राप्त विशेषता है।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि महामारी के दौरान, सरकार ने टीकाकरण योजना बनाने में अपनी सीमाओं से आगे जाकर प्रयास किया, और इसने निस्संदेह कई जीवन बचाने में मदद की।
पीठ ने कहा, "लेकिन साथ ही, जैसा कि सरकार के अपने आंकड़े भी दर्शाते हैं, यह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि वही टीके कुछ मामलों में जीवन हानि का कारण भी बने। ऐसी स्थिति में, यह उचित नहीं है कि सरकार उन प्रभावित परिवारों की मदद करने में अपनी जिम्मेदारी से बचती रहे, जिन्होंने अपने प्रियजनों को खोया है।"
शीर्ष अदालत ने कहा कि टीकाकरण के बाद होने वाले दुष्प्रभावों की निगरानी के लिए मौजूदा व्यवस्था जारी रहेगी। न्यायालय ने कहा कि जैकब पुलियेल मामले में मई 2022 के फैसले में शीर्ष अदालत द्वारा की गई टिप्पणियों के अनुसार प्रासंगिक डेटा को समय-समय पर सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
पीठ ने कहा कि टीकाकरण के बाद होने वाले दुष्प्रभाव के वैज्ञानिक मूल्यांकन के लिए मौजूदा व्यवस्था को देखते हुए, अदालत द्वारा नियुक्त किसी अलग विशेषज्ञ निकाय की आवश्यकता नहीं है।
शीर्ष अदालत ने कहा, ''केंद्र स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के माध्यम से कोविड-19 टीकाकरण के बाद गंभीर प्रतिकूल घटनाओं के लिए दोष निर्धारण के बगैर मुआवजा देने की नीति बनाएगा।"
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि उसका यह निर्णय किसी व्यक्ति को कानून में उपलब्ध अन्य उपायों का सहारा लेने से रोकता नहीं है।
पीठ ने कहा, ''इसी तरह, दोष निर्धारण के बगैर मुआवजा देने की नीति तैयार करना, भारत सरकार या किसी अन्य प्राधिकरण की ओर से किसी भी प्रकार की जिम्मेदारी या गलती को स्वीकार करना नहीं माना जाएगा।''
उच्चतम न्यायालय ने उन याचिकाओं पर यह व्यवस्था दी, जिनमें से एक में आरोप लगाया गया था कि 2021 में कोविड-19 रोधी टीके की पहली खुराक लेने के बाद दो महिलाओं की मृत्यु हो गई थी। याचिका में यह भी दावा किया गया कि टीकाकरण के बाद दोनों को गंभीर दुष्प्रभाव झेलने पड़े।
याचिका में याचिकाकर्ताओं को मुआवजा देने के लिए अधिकारियों को निर्देश देने का भी अनुरोध किया गया है, जिसे उनके द्वारा सामाजिक मुद्दों पर काम करने वाले संगठनों को दान दिया जाएगा।
अदालत ने कहा कि यह सर्वविदित है कि संविधान का अनुच्छेद 21 केवल गैरकानूनी रूप से जीवन से वंचित किए जाने के खिलाफ सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके दायरे में अन्य अधिकारों की एक विस्तृत शृंखला भी शामिल है जो जीवन के अधिकार के सुचारू संचालन को सुविधाजनक बनाती है।
पीठ ने कहा, "संविधान सरकार को मानवीय पीड़ा का महज दर्शक नहीं, बल्कि कल्याण और गरिमा का सक्रिय संरक्षक मानता है। राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांत इस दृष्टिकोण को स्पष्ट रूप से उजागर करते हैं।"
पीठ ने ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और जापान में कोविड टीके को शामिल करने वाली दोष निर्धारण के बगैर मुआवजा देने की नीति' का जिक्र किया।
भाषा आशीष प्रशांत
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