लोस अध्यक्ष को हटाने का नोटिस: बिरला सदन में उपस्थित रहेंगे, लेकिन कार्यवाही का संचालन नहीं करेंगे
पवनेश
- 05 Mar 2026, 08:47 PM
- Updated: 08:47 PM
नयी दिल्ली, पांच मार्च (भाषा) लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पद से हटाने के लिए दिये गए नोटिस को अगले हफ्ते सोमवार को विचारार्थ लिये जाने के दौरान वह सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता नहीं करेंगे और सदस्यों के बीच बैठेंगे।
बजट सत्र के दूसरे चरण की शुरुआत नौ मार्च को होगी। लोकसभा में बिरला के खिलाफ विपक्ष द्वारा लाए गए प्रस्ताव पर उस दिन चर्चा हो सकती है। प्रस्ताव में, बिरला पर ''खुलकर भेदभाव'' करने का आरोप लगाया गया है।
नियमों और तय प्रक्रिया के अनुसार, जब निचले सदन में प्रस्ताव पर चर्चा होगी, तो बिरला को अपना बचाव करने का अधिकार होगा।
संविधान विशेषज्ञ पी डी टी आचारी ने बताया कि बिरला को प्रस्ताव के खिलाफ मत देने का भी अधिकार होगा।
आचारी ने कहा कि जब प्रस्ताव सदन के समक्ष आएगा, तो बिरला कार्यवाही की अध्यक्षता नहीं करेंगे, बल्कि सत्तापक्ष की अग्रिम पंक्ति में बैठेंगे।
जिस दिन नोटिस दिया गया था, उसी दिन बिरला ने सदन की अध्यक्षता करना बंद कर दिया था।
लोकसभा सचिवालय के एक पदाधिकारी ने कहा, ''हालांकि, वह लोकसभा में नोटिस प्रस्तुत किये जाने तक सदन की अध्यक्षता कर सकते थे, लेकिन उन्होंने अपने खिलाफ प्रस्ताव का निपटारा होने तक सदन में उपस्थित न होने का निर्णय लिया। उन्होंने नैतिकता के उच्चतम मानकों का पालन किया।''
कम से कम 118 विपक्षी सदस्यों ने बिरला को पद से हटाने के लिए एक प्रस्ताव पेश करने का नोटिस दिया था। विपक्ष ने अपने नोटिस में आरोप लगाया है कि बिरला ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर सदन में धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और दूसरे विपक्षी नेताओं को बोलने नहीं दिया।
कांग्रेस सदस्य और लोकसभा में पार्टी के मुख्य सचेतक के सुरेश ने अपनी पार्टी, समाजवादी पार्टी और द्रमुक समेत कई विपक्षी पार्टियों की ओर से लोकसभा सचिवालय को यह नोटिस दिया।
हालांकि, तृणमूल कांग्रेस सांसदों ने नोटिस पर हस्ताक्षर नहीं किए।
लोकसभा के पूर्व महासचिव आचारी ने 'पीटीआई-भाषा' से कहा कि ''ऐसे हालात में लोकसभा अध्यक्ष किस सीट पर बैठते हैं, उसके आवंटन के बारे में नियमों में कोई उल्लेख नहीं है।''
उन्होंने कहा कि बिरला स्वचालित मतदान प्रणाली का इस्तेमाल करके भी प्रस्ताव पर वोट नहीं कर पाएंगे, बल्कि उन्हें अपना वोट देने के लिए एक पर्ची भरनी होगी।
आचारी का मानना है कि किसी ऐसे केंद्रीय मंत्री की सीट बिरला को दी जा सकती है, जो राज्यसभा के सदस्य हों, क्योंकि सिर्फ लोकसभा सदस्य ही प्रस्ताव के पक्ष या विपक्ष में वोट डाल पाएंगे।
संविधान का अनुच्छेद 96 लोकसभा अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को उस समय सदन की अध्यक्षता करने से रोकता है, जब उन्हें पद से हटाने के प्रस्ताव पर विचार किया जा रहा हो।
अगर लोकसभा में प्रस्ताव पर चर्चा होती है, तो अध्यक्ष को सदन में अपना बचाव करने का संवैधानिक अधिकार है।
अनुच्छेद 96 अध्यक्ष को सदन में अपना बचाव करने का अवसर देता है।
लोकसभा अध्यक्ष को हटाने का प्रस्ताव लाने के लिए कम से कम दो लोकसभा सदस्यों को नोटिस पर दस्तखत करना होता है। कितने भी सदस्य नोटिस पर हस्ताक्षर कर सकते हैं, लेकिन कम से कम दो के हस्ताक्षर जरूरी हैं।
लोकसभा अध्यक्ष को सदन द्वारा साधारण बहुमत से पारित प्रस्ताव द्वारा पद से हटाया जा सकता है।
संविधान के अनुच्छेद 94सी में ऐसे कदम के लिए प्रावधान हैं।
आचारी ने कहा, ''बहुमत का हिसाब लगाने के लिए सदन के सभी सदस्यों की गिनती की जाती है, न कि मौजूद और वोट देने वाले सदस्यों की, जैसा साधारणतया होता है। इसका मतलब है कि खाली सीटों को छोड़कर, सदन की प्रभावी सदस्यता का इस्तेमाल बहुमत का हिसाब लगाने के लिए किया जाता है।''
उन्होंने कहा कि नोटिस लोकसभा महासचिव को देना होता है, न कि उपाध्यक्ष या किसी और को।
उन्होंने कहा कि फिर नोटिस का प्रारंभिक स्तर पर अध्ययन करके देखा जाता है कि क्या इसमें 'बहुत विशिष्ट आरोप' हैं या नहीं।
आचारी ने कहा, ''खास आरोप जरूरी हैं क्योंकि तभी अध्यक्ष जवाब दे पाएंगे।'' प्रस्ताव में अपमानजनक भाषा या सामग्री नहीं होनी चाहिए।
अनुच्छेद 96 अध्यक्ष को सदन में अपना बचाव करने का मौका देता है।
आचारी ने कहा कि अध्ययन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद प्रस्ताव 14 दिन बाद सदन में लाया जा सकता है। इसके बाद आसन की ओर से इसे सदन में विचार के लिए रखा जाता है।
उन्होंने कहा, ''असल में सदन ही इसे स्वीकार करता है।''
आचारी ने कहा, ''फिर आसन प्रस्ताव के पक्ष में सदस्यों से खड़े होने के लिए कहता है। अगर 50 सदस्य इसके समर्थन में खड़े हो जाते हैं और अगर मानदंड पूरा होता है, तो आसन से घोषणा की जाती है कि सदन ने अनुमति दे दी है। अनुमति मिलने के बाद, इस पर चर्चा करनी होती है और 10 दिनों के अंदर इसका निपटारा करना होता है।''
लोकसभा सूत्रों ने कहा कि इस पर सोमवार को ही चर्चा होगी।
इस तरह के प्रस्ताव पेश किए जाने के उदाहरण अतीत में रहे हैं, हालांकि, अब तक ऐसा कोई प्रस्ताव पारित नहीं हुआ है।
आचारी ने कहा कि इसका कारण है कि सरकारों के पास बहुमत होता है।
अतीत में, तीन लोकसभा अध्यक्षों - जी.वी. मावलंकर (1954), हुकम सिंह (1966) और बलराम जाखड़ (1987) - को अविश्वास प्रस्तावों का सामना करना पड़ा था। हालांकि, ये प्रस्ताव खारिज कर दिये गए थे।
भाषा सुभाष पवनेश
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