संसद को कानून बनाने का पूर्ण अधिकार है, वह केंद्र सरकार के शपथपत्र से बाध्य नहीं : न्यायालय
दिलीप
- 27 Feb 2026, 06:57 PM
- Updated: 06:57 PM
नयी दिल्ली, 27 फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि संसद को कानून बनाने का "पूर्ण विशेषाधिकार" है और वह केंद्र द्वारा अदालत के समक्ष दिए गए किसी भी शपथपत्र से बाध्य नहीं है।
ये टिप्पणी प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने की, जो भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 152 की वैधता पर सवाल उठाने वाली याचिकाओं की सुनवाई कर रही थी।
भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 152 भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कृत्यों से संबंधित है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए अधिवक्ताओं में से एक ने कहा कि धारा 152 पूर्ववर्ती भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए (राजद्रोह) को पुनः लागू करती है।
मई 2022 में, उच्चतम न्यायालय की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने राजद्रोह से संबंधित औपनिवेशिक काल के दंड कानून पर तब तक रोक लगा दी थी, जब तक कि एक "उपयुक्त" सरकारी प्राधिकार इसकी पुनः समीक्षा नहीं करता और केंद्र एवं राज्यों को इस अपराध का हवाला देते हुए कोई भी नयी प्राथमिकी दर्ज नहीं करने का निर्देश दिया था।
शुक्रवार को वकील ने कहा कि 2022 में केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय के समक्ष राजद्रोह कानून की समीक्षा करने के लिये एक शपथपत्र दिया था। वकील ने कहा कि अदालत के समक्ष एक शपथपत्र देने के बाद सरकार बीएनएस में इस प्रावधान को दोबारा पेश नहीं कर सकती।
पीठ ने कहा, "भारत सरकार ने भले ही अदालत के समक्ष शप पत्र दिया हो, लेकिन संसद उस शपथपत्र से बाध्य नहीं है। कानून बनाने का पूर्ण अधिकार संसद के पास है।"
वकील ने इसके बाद भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 173 का उल्लेख करते हुए कहा कि यह उच्चतम न्यायालय के ललिता कुमारी फैसले का उल्लंघन करती है, जिसमें संज्ञेय अपराध होने की सूचना पर प्राथमिकी दर्ज करना अनिवार्य है।
वकील ने दलील दी कि धारा 173 पुलिस को यह पता लगाने के लिए प्रारंभिक जांच करने की अनुमति देती है कि क्या किसी मामले में आगे बढ़ने के लिए प्रथम दृष्टया मामला बनता है।
पीठ ने कहा कि ललिता कुमारी फैसले काफी दुरुपयोग किया गया है। पीठ ने कहा, ''कभी-कभी फैसले वास्तविक परिस्थितियों से दूर रहकर सुनाए जाते हैं।"
पीठ ने कहा कि ललिता कुमारी फैसले में यह भी कहा गया है कि यह पता लगाने के लिए प्रारंभिक जांच की जा सकती है कि संज्ञेय अपराध का खुलासा हुआ है या नहीं।
पीठ ने मामले की सुनवाई होली की छुट्टियों के बाद करना निर्धारित किया।
पिछले साल, उच्चतम न्यायालय ने बीएनएस की धारा 152 की वैधता को चुनौती देने वाली एक अलग जनहित याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी किया था।
भाषा अमित दिलीप
दिलीप
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