तेलुगु अभिनेत्री मौत मामला : न्यायालय ने दोषी की सजा बरकरार रखी, आत्मसमर्पण का निर्देश दिया
रंजन
- 17 Feb 2026, 09:53 PM
- Updated: 09:53 PM
नयी दिल्ली, 17 फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने 2002 में तेलुगु अभिनेत्री प्रत्युषा को आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में अपनी दोषसिद्धि को चुनौती देने वाले व्यक्ति की याचिका मंगलवार को खारिज कर दी।
शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ता की दो साल की जेल की सजा बरकरार रखी और उसे चार हफ्ते के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।
हालांकि, सर्वोच्च न्यायलय ने इस बात से इनकार किया कि मामले में पीड़िता के साथ दुष्कर्म हुआ था और उसका गला घोंटा गया था।
प्रत्युषा की 24 फरवरी 2002 को हैदराबाद में मौत हो गई थी।
रिमांड रिपोर्ट के मुताबिक, गुडीपल्ली सिद्धार्थ रेड्डी और प्रत्युषा छह साल से प्रेम संबंध में थे। रिपोर्ट के अनुसार, प्रत्युषा की मां को जहां दोनों के रिश्ते पर कोई आपत्ति नहीं थी, वहीं रेड्डी की मां इसके खिलाफ थीं, जिसके चलते दोनों ने खुदकुशी करने का फैसला लिया।
रिमांड रिपोर्ट में कहा गया है कि 23 फरवरी 2002 को रेड्डी और प्रत्युषा कार से एक दुकान पर पहुंचे, कीटनाशक खरीदा, उसे कोल्डड्रिंक में मिलाया और पी लिया। हालांकि, इसमें कहा गया है कि ऐसा करने के बाद दोनों को लगा कि वे गलत कदम उठा रहे हैं और वे हैदराबाद स्थित केयर अस्पताल पहुंचे। हालांकि, उपचार के बावजूद प्रत्युषा की मौत हो गई, जबकि रेड्डी बच गया।
न्यायमूर्ति राजेश बिंदल और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने प्रत्युषा की मां पी सरोजिनी देवी की ओर से दायर उस याचिका को भी खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने अपनी बेटी की मौत के पीछे साजिश का आरोप लगाया था।
पीठ ने कहा, "यह अदालत मानती है कि पीड़िता के साथ आत्महत्या का फैसला लेने और उस पर अमल करने का आरोपी का आचरण भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा-107 (उकसाने) में परिकल्पित तीनों परिदृश्यों के अंतर्गत आता है। उसकी भागीदारी ने पीड़िता को प्रत्यक्ष रूप से आत्महत्या के लिए उकसाया।"
उसने कहा, "खास तौर पर याचिककर्ता की ओर से अपने बचाव में दी गई इस दलील को नहीं स्वीकार किया जा सकता कि रिश्ते में पीड़िता की चलती थी और उसने आत्महत्या के लिए उस पर (याचिकाकर्ता) दबाव बनाया था। उसका जुर्म साबित होता है।"
शीर्ष अदालत ने कहा कि गला घोंटकर हत्या किए जाने का आरोप पूरी तरह से बेबुनियाद है।
उसने कहा, "चश्मदीदों के बयान और चिकित्सीय साक्ष्य जहर के सेवन की ओर इशारा करते हैं। और रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री का समग्र रूप से विश्लेषण करने पर इस बात में कोई संदेह नहीं रह जाता कि पीड़िता की मौत ऑर्गेनोफॉस्फेट जहर 'नुवाक्रोन' के सेवन से हुई है...।"
पीठ ने प्रत्युषा के शव का पोस्टमार्टम करने वाले डॉ. मुनि स्वामी की निंदा भी की। उसने कहा कि 25 फरवरी 2002 को एक चिकित्सक के ड्यूटी पर होने के बावजूद डॉ. स्वामी खुद मुर्दाघर आए और पोस्टमार्टम किया।
पीठ ने कहा कि यह हैरान करने वाला है, क्योंकि डॉ. स्वामी न तो मुर्दाघर में ड्यूटी पर थे और न ही प्रोफेसर के रूप में कॉल ड्यूटी पर थे।
उसने कहा, "डॉ. स्वामी की अपरिपक्व और गलत राय ने सार्वजनिक विवाद की लहर पैदा कर दी। मीडिया में प्रसारित खबरों ने उनके निष्कर्षों को और बढ़ावा दिया, जिससे जांचकर्ताओं पर व्यापक संदेह पैदा हुआ और कथित दोषियों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई की मांग उठी।"
पीठ ने कहा, "यह दर्शाता है कि कैसे एक गलत रिपोर्ट, जब समय से पहले सार्वजनिक की जाती है, तो जनता की धारणा को प्रभावित कर सकती है और न्याय की प्रक्रिया को बाधित कर सकती है।"
आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने 2011 में रेड्डी की पांच साल की जेल की सजा घटाकर दो साल की कर दी थी।
निचली अदालत ने 2004 में रेड्डी को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में पांच साल की जेल की सजा सुनाई थी और 5,000 रुपये का जुर्माना लगाया था। उसने आत्महत्या की कोशिश के लिए भी उसे एक और साल की जेल की सजा सुनाई थी और 1,000 रुपये का जुर्माना लगाया था।
भाषा पारुल रंजन
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