पीड़ितों को अधिक मुआवजा देने के बदले दोषियों की सजा कम करने का हालिया चलन खतरनाक: न्यायालय
माधव
- 17 Feb 2026, 09:46 PM
- Updated: 09:46 PM
नयी दिल्ली, 17 फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने गंभीर आपराधिक मामलों में पीड़ितों को अधिक मुआवजा देने और दोषियों की सजा को "मनमाने ढंग से एवं यांत्रिक रूप से" कम करने के अदालतों के हालिया चलन पर मंगलवार को नाखुशी जाहिर की।
शीर्ष अदालत ने इसे एक "खतरनाक" प्रवृत्ति करार दिया, जो समाज को गलत संदेश दे रही है कि अपराधी केवल पैसे देकर खुद को दोषमुक्त कर सकते हैं।
न्यायमूर्ति राजेश बिंदल और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने कहा कि सजा का मकसद एक असरदार निवारक प्रभाव कायम करना है, ताकि भविष्य में उसी तरह के अपराधों या कृत्यों की रोकथाम की जा सके।
पीठ ने कहा कि सजा देते समय इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि यह बहुत कठोर न हो, लेकिन साथ ही इतनी नरम भी न हो कि उसका निवारक प्रभाव कम हो जाए।
उसने कहा, "विभिन्न अदालतों के मुआवजे को सजा के विकल्प के रूप में मानने की गलत धारण चिंता का विषय है। यह एक ऐसा चलन है, जिसकी निंदा की जानी चाहिए। हमने विभिन्न उच्च न्यायालयों में एक प्रवृत्ति देखी है, जिसमें निचली अदालत की ओर से दोषियों को दी गई सजा को न्यायिक विवेक के किसी स्पष्ट इस्तेमाल के बिना मनमाने ढंग से और यांत्रिक रूप से कम कर दिया जाता है।"
पीठ ने कहा, "पीड़ित को देय मुआवजे की राशि बढ़ाने और सजा की अवधि कम करने का चलन खतरनाक है, खास तौर पर गंभीर अपराधों के मामलों में, क्योंकि इससे समाज में गलत संदेश जा सकता है कि अपराधी/आरोपी व्यक्ति केवल पैसे देकर अपनी जवाबदेही से मुक्त हो सकते हैं।"
शीर्ष अदालत ने ये टिप्पणियां उस मामले की पृष्ठभूमि में कीं, जिसमें मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने एक ग्रामीण को चाकू घोंपकर गंभीर रूप से घायल करने के जुर्म में दो व्यक्तियों को दी गई तीन साल की कैद की सजा को घटाकर जेल में बिताई गई अवधि तक सीमित कर दिया और पीड़ित को मुआवजे के रूप में देय राशि को 5,000 रुपये से बढ़ाकर 50,000 रुपये प्रति दोषी कर दिया।
शीर्ष अदालत ने कहा कि वह यह कहने के लिए विवश है कि उच्च न्यायालय ने कानून की पूर्ण अवहेलना की और अपने निष्कर्ष पर पहुंचने में स्थापित आपराधिक न्यायशास्त्र का मजाक बनाया।
उसने कहा, "उच्च न्यायालय ने विवादित फैसले में इस बात का संज्ञान लिया कि घटना को साढ़े दस साल से अधिक समय बीत चुका है और कुछ वर्षों बाद पीड़ित की अन्य लोगों ने हत्या कर दी। इन पहलुओं के आधार पर, उच्च न्यायालय ने आरोपियों को दी गई सजा में संशोधन किया।"
पीठ ने कहा, "उपरोक्त के अलावा, उच्च न्यायालय उन परिस्थितियों को स्पष्ट करने में विफल रहा, जिनके आधार पर उसने इतने जघन्य अपराध के लिए सजा कम की। इस तरह, उसने सजा का सही निर्धारण करने के लिए अपने न्यायिक विवेक का इस्तेमाल न करके गलती की।"
न्यायालय ने कहा कि स्थिति की गंभीरता को देखते हुए उसने कुछ बुनियादी कारकों को निर्धारित किया है, जिनका अदालतों को सजा सुनाते समय ध्यान रखना होगा।
उसने कहा कि दोषियों को सजा सुनाते समय अदालतों को जिन कारकों का ध्यान रखना चाहिए, उनमें किए गए अपराध और दी गई सजा के बीच आनुपातिकता, तथ्यों एवं परिस्थितियों पर उचित विचार, समाज पर प्रभाव एवं अपराध की रोकथाम की संभावना शामिल है।
भाषा पारुल माधव
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