तुर्कमान गेट हिंसा: सभी 12 आरोपियों को जमानत; अदालत ने फुटेज में पहचान स्पष्ट न होने का हवाला दिया
दिलीप
- 17 Feb 2026, 08:39 PM
- Updated: 08:39 PM
(मैडोना बर्मन)
नयी दिल्ली, 17 फरवरी (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने तुर्कमान गेट हिंसा मामले के सभी 12 आरोपियों को मंगलवार को यह कहते हुए जमानत दे दी कि इस स्तर पर याचिकाकर्ताओं की "स्पष्ट और निर्विवाद पहचान" स्थापित नहीं की जा सकी है, जिसके आधार पर उनकी हिरासत को जायज ठहराया जा सके।
यह मामला छह-सात जनवरी की दरमियानी रात को रामलीला मैदान क्षेत्र में एक मस्जिद के पास अतिक्रमण-विरोधी अभियान के दौरान हुई हिंसा से संबंधित है।
सोशल मीडिया पर तुर्कमान गेट के सामने स्थित मस्जिद को गिराए जाने की अफवाह फैलने के बाद क्षेत्र में भीड़ जुट गई थी। पुलिस का आरोप है कि 150-200 लोगों की भीड़ ने पुलिस और दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) के कर्मचारियों पर पथराव किया था तथा कांच की बोतलें फेंकी थीं, जिससे एक थाना प्रभारी (एसएचओ) सहित छह पुलिसकर्मी घायल हो गए थे।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश भूपिंदर सिंह ने कहा, "जमानत पर विचार करने के चरण में इस अदालत को साक्ष्यों का विस्तृत मूल्यांकन करने की जरूरत नहीं है... हालांकि, अदालत को यह जांचने की आवश्यकता है कि क्या लगातार हिरासत जरूरी है।"
उन्होंने मोहम्मद काशिफ, मोहम्मद कैफ, मोहम्मद उबैदुल्लाह, मोहम्मद इमरान, मोहम्मद अदनान, समीर हुसैन, मोहम्मद नावेद, मोहम्मद अतहर, मोहम्मद अरीब, आमिर हमजा, मोहम्मद आदिल और अदनान को 50-50 हजार रुपये के मुचलके पर जमानत दे दी।
न्यायमूर्ति सिंह ने याचिकाकर्ताओं पर जमानत संबंधी कुछ शर्तें लागू कीं, जिनमें सुनवाई की प्रत्येक तारीख पर अदालत के समक्ष पेश होना, जांच में पूरी तरह से सहयोग करना, सबूतों के साथ छेड़छाड़ न करना, गवाहों को प्रभावित न करना, मोबाइल फोन को हमेशा चालू अवस्था में रखना तथा उसकी लोकेशन सर्विस सक्रिय रखना और सुनवाई के दौरान सोशल मीडिया पर घटना से संबंधित कोई भी सामग्री प्रसारित न करना शामिल है।
सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने दलील दी कि यह घटना ड्रोन निगरानी और अन्य वीडियो रिकॉर्डिंग माध्यमों के जरिये रिकॉर्ड हो गई थी।
हालांकि, अदालत ने कहा कि "सुनवाई के दौरान इस न्यायालय के समक्ष कोई विशिष्ट फुटेज नहीं चलाया गया, जिससे प्रथम दृष्टया यह साबित हो सके कि मौजूदा याचिकाकर्ताओं में से कोई भी पथराव में सक्रिय रूप से शामिल था या कोई विशिष्ट प्रत्यक्ष कृत्य कर रहा था।"
न्यायमूर्ति सिंह ने कहा कि अन्य सामग्री भले ही केस डायरी का हिस्सा हो सकती है, लेकिन "इस स्तर पर स्पष्ट पहचान का अभाव आगे हिरासत में रखने की आवश्यकता का आकलन करने के सीमित उद्देश्य के लिहाज से प्रासंगिक हो जाता है, खास तौर पर पहचान और व्यक्तिगत भूमिका को लेकर विवाद के मद्देनजर।"
न्यायाधीश ने सह-आरोपी मोहम्मद उबेदुल्लाह को मिली जमानत का भी जिक्र किया, जिस पर "इसी तरह के आरोप" लगाए गए थे। एक अलग सत्र न्यायालय ने मोहम्मद उबेदुल्लाह की जमानत अर्जी 24 जनवरी को स्वीकार कर ली थी।
भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 109(1) (हत्या का प्रयास) के तहत लगाए गए आरोप पर न्यायमूर्ति सिंह ने कहा कि इस धारा के तहत भले ही कठोर सजा का प्रावधान है, लेकिन वर्तमान में उपलब्ध चिकित्सा सामग्री से संकेत मिलता है कि पुलिस कर्मियों को लगी चोट में से किसी को भी गंभीर प्रकृति का नहीं बताया गया है।
उन्होंने कहा, "केवल गंभीरता जमानत नामंजूर करने का एकमात्र कारण नहीं हो सकती... जमानत सिर्फ इसलिए नामंजूर नहीं की जा सकती, क्योंकि आरोपित अपराध में गंभीर सजा का प्रावधान है। मुकदमे से पहले की हिरासत सजा के रूप में काम करने के लिए नहीं है।"
न्यायमूर्ति सिंह ने इस बात पर गौर किया कि आरोपी स्थानीय निवासी हैं, जांच में काफी प्रगति हो चुकी है और यह काफी हद तक दस्तावेजी एवं इलेक्ट्रॉनिक प्रकृति की प्रतीत होती है तथा लगभग सभी गवाह पुलिसकर्मी हैं, जिससे उन्हें प्रभावित किए जाने की आशंका घट जाती है।
अदालत ने आरोपों की गंभीरता को संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के साथ संतुलित करते हुए कहा कि मुकदमे की सुनवाई के दौरान आरोपी को सलाखों के पीछे रखने से कोई उद्देश्य पूरा नहीं होगा।
उसने कहा, "जहां कथित पीड़ित खुद पुलिसकर्मी हैं और जांच एजेंसी भी उसी संस्था से संबंधित है, वहां पारदर्शिता, निष्पक्षता तथा स्पष्ट रूप से न्यायसंगतता सुनिश्चित करने का कर्तव्य और भी अधिक अनिवार्य हो जाता है।"
अदालत ने कहा कि अतिक्रमण-विरोधी अभियान जैसे संवेदनशील अभियानों के दौरान अच्छी गुणवत्ता वाले बॉडी-कैमरे और उचित स्थान पर लगाए गए सीसीटीवी कैमरों का इस्तेमाल अपराधियों की सटीक पहचान करने और पारदर्शिता बढ़ाने में सहायक होगा।
अदालत ने स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियां जमानत याचिकाओं पर विचार करने तक ही सीमित थीं और मुकदमे के गुण-दोष पर कोई प्रभाव नहीं डालेंगी।
भाषा पारुल दिलीप
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