न्यायालय ने 2023 के डेटा संरक्षण कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी किया
माधव
- 16 Feb 2026, 04:55 PM
- Updated: 04:55 PM
नयी दिल्ली, 16 फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (डीपीडीपी) अधिनियम, 2023 के कई प्रावधानों की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका पर सोमवार को केंद्र को नोटिस जारी किया।
शीर्ष अदालत ने हालांकि अक्षेपित प्रावधानों पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया और कहा कि "जब तक हम मामले की सुनवाई नहीं करते, तब तक अंतरिम आदेश से संसद द्वारा लागू की गई व्यवस्था को रोका नहीं जा सकेगा।"
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने सूचना के अधिकार अधिनियम के प्रावधानों में संशोधन को लेकर डीपीडीपी अधिनियम और डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण नियम 2025 के कुछ प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र को नोटिस जारी किया।
पीठ ने तीन याचिकाओं, डिजिटल समाचार मंच 'द रिपोर्टर्स कलेक्टिव' की ओर से वेंकटेश नायक, पत्रकार नितिन सेठी और राष्ट्रीय जन सूचना अधिकार अभियान (एनसीपीआरआई) द्वारा दायर, को भी बृहद पीठ के पास भेज दिया।
इन याचिकाओं में "विश्वसनीयता" संबंधी प्रावधानों पर चिंता जताई गई है, जो केंद्र सरकार को अपने विवेक से किसी भी डेटा प्रबंधन संस्था से डेटा प्राप्त करने की अनुमति देते हैं।
पीठ ने कहा कि यह मामला "जटिल और संवेदनशील मुद्दों" से संबंधित है, और इसमें दो परस्पर विरोधी मौलिक अधिकारों, सूचना के अधिकार और निजता के अधिकार के बीच संतुलन बनाना शामिल है।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, "यह परस्पर विरोधी हितों को संतुलित करने का मामला है। हमें सभी जटिलताओं को दूर करना होगा और यह निर्धारित करना होगा कि व्यक्तिगत जानकारी क्या होती है।"
याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश हुए अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने ऐतिहासिक सुभाष अग्रवाल फैसले का हवाला देते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने पहले ही आरटीआई और निजता के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए एक ढांचा तैयार कर लिया है।
पीठ ने हालांकि कहा कि नए विधायी ढांचे के लिए एक नए, गहन परीक्षण की आवश्यकता है।
याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी ने अतिरिक्त दलीलें पेश करने की कोशिश की, लेकिन अदालत ने केंद्र से व्यापक जवाब सुनिश्चित करने के लिए नोटिस जारी करने की कार्यवाही शुरू कर दी।
न्यायालय ने मामले की सुनवाई मार्च में निर्धारित की है। मामले में पेश हुईं वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने तर्क दिया कि इस कानून ने अत्यधिक कठोर दृष्टिकोण अपनाया है।
वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा, '' छेनी का इस्तेमाल करने के बजाय (विधायिका ने), हथौड़े का प्रयोग किया है और इस तरह (आरटीआई को) गहरा आघात पहुंचाया है।''
याचिकाकर्ताओं ने मूल रूप से डीपीडीपी अधिनियम की धारा 44(3) को चुनौती दी है, जो आरटीआई अधिनियम की धारा 8(1)(जे) में संशोधन करती है, जिससे व्यक्तिगत जानकारी के प्रकटीकरण को व्यापक छूट मिलती है।
संशोधन से पहले, यदि कोई सर्वोपरि जनहित होता तो व्यक्तिगत जानकारी का खुलासा किया जा सकता था।
इसमें कहा गया है कि पत्रकार और पारदर्शिता कार्यकर्ता अक्सर सीमित, सार्वजनिक हित के संदर्भों में गलत कामों, भ्रष्टाचार या हितों के टकराव को उजागर करने के लिए व्यक्तिगत जानकारी तक पहुंच पर निर्भर रहते हैं।
सार्वजनिक हित के विशेषाधिकार को समाप्त करके, संशोधित प्रावधान कथित तौर पर जवाबदेही की कीमत पर निजता के पक्ष में निर्णायक रूप से संतुलन बिगाड़ता है।
भाषा
प्रशांत माधव
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