मणिपुर हिंसा: न्यायालय ने सीबीआई से वस्तुस्थिति रिपोर्ट तलब की, समिति की सिफारिशें लागू करने को कहा
सुरेश
- 13 Feb 2026, 07:23 PM
- Updated: 07:23 PM
नयी दिल्ली, 13 फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मणिपुर में जातीय हिंसा से जुड़ी 11 प्राथमिकी की जांच कर रहे केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से शुक्रवार को दो हफ्ते के भीतर एक वस्तुस्थिति रिपोर्ट दाखिल करने को कहा।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने यह सुझाव भी दिया कि शीर्ष अदालत के बजाय मणिपुर उच्च न्यायालय (जिसके पास एक नये मुख्य न्यायाधीश हैं) या गौहाटी उच्च न्यायालय या दोनों हिंसा से जुड़े मामलों में मुकदमों तथा संबंधित घटनाक्रमों की निगरानी करें।
पीठ ने केंद्र और मणिपुर सरकार को राज्य में जातीय हिंसा के पीड़ितों के पुनर्वास और कल्याण के सिलसिले में न्यायमूर्ति गीता मित्तल समिति की सिफारिशों को लागू करने का भी निर्देश दिया।
अदालत की ओर से नियुक्त समिति पीड़ितों के पुनर्वास के उपायों पर कई रिपोर्ट पेश कर चुकी है। इस समिति में जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय की पूर्व मुख्य न्यायाधीश गीता मित्तल, बंबई उच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश शालिनी पी. जोशी और दिल्ली उच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश आशा मेनन शामिल हैं।
मणिपुर में मई 2023 में मेइती और कुकी समुदायों के बीच भड़की जातीय हिंसा में 200 से ज्यादा लोग मारे गए हैं, सैकड़ों लोग घायल हुए हैं और हजारों अन्य विस्थापित हुए हैं। यह हिंसा अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा देने की बहुसंख्यक मेइती समुदाय की मांग के विरोध में पहाड़ी जिलों में 'आदिवासी एकजुटता मार्च' के आयोजन के दौरान शुरू हुई थी।
हाल ही में दम तोड़ने वाली हिंसा पीड़ित एक महिला की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने सुनवाई की शुरुआत में कहा कि पीड़िता की जगह उसकी मां को पेश किया जाए।
ग्रोवर ने आरोप लगाया कि सीबीआई ने उन्हें इस बारे में सूचित नहीं किया कि पीड़िता के सामूहिक बलात्कार से जुड़े मामले में आरोपपत्र दायर किया गया है।
उन्होंने कहा कि कुकी समुदाय से ताल्लुक रखने वाली महिला की पिछले महीने एक बीमारी से मौत हो गई, जिसका संबंध कथित तौर पर सामूहिक बलात्कार के कारण हुए आघात से था।
ग्रोवर ने कहा, "मैंने निचली अदालत की रिपोर्ट देखी है... मुख्य आरोपी पेश नहीं हो रहे हैं। सीबीआई भी उपस्थित नहीं हो रही है... जिस लापरवाही से यह सब हो रहा है, वह चौंकाने वाला है।"
इस पर केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, "ग्रोवर जो कह रही हैं, उसका कोई विरोध नहीं कर सकता। पीड़िता के अधिकारों से खिलवाड़ नहीं किया जा सकता।"
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, "सीबीआई को वस्तुस्थिति रिपोर्ट दाखिल करने दीजिए। निगरानी का काम हम (मणिपुर) उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को सौंप सकते हैं।"
अधिवक्ता निजाम पाशा के यह कहने पर कि गौहाटी उच्च न्यायालय पहले से ही मुकदमों की निगरानी कर रहा है, पीठ ने कहा कि मणिपुर में तनावपूर्ण माहौल को ध्यान में रखते हुए पारित किया गया यह आदेश "बिल्कुल सही" है।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि अधिकार क्षेत्र वाला मणिपुर उच्च न्यायालय या गौहाटी उच्च न्यायालय या दोनों ही मामलों की निगरानी कर सकते हैं। उन्होंने वकीलों को इस सिलसिले में निर्देश लेने और दो हफ्ते में दलीलें पेश करने का निर्देश दिया।
मेहता ने कहा कि सीबीआई वृंदा ग्रोवर की ओर से उठाए गए मुद्दों का शीर्ष अदालत या मणिपुर उच्च न्यायालय में जवाब दे सकती है, लेकिन राज्य में स्थिति फिलहाल शांतिपूर्ण है और लोगों की सामान्य आवाजाही है तथा उच्च न्यायालय स्थानीय माहौल को बेहतर ढंग से समझ सकता है।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, "हम मणिपुर और गौहाटी उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों से समन्वय करने तथा यह देखने के लिए कह सकते हैं कि पीड़ितों के बयान किस तरह से दर्ज किए जा सकते हैं एवं उन्हें किस तरह से सहेजा जा सकता है।"
उन्होंने कहा, "इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि मणिपुर उच्च न्यायालय में एक नये मुख्य न्यायाधीश ने कार्यभार संभाला है, गौहाटी और मणिपुर उच्च न्यायालयों के बीच समन्वय के लिए एक प्रभावी तंत्र स्थापित करने के सिलसिले में निर्देश जारी किए जाएं।"
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि इस पहलू पर निर्देश जरूरी हैं कि क्या दो मुख्य न्यायाधीशों को "विविध निगरानी" सौंपी जा सकती है, जिसके बाद एक उपयुक्त तंत्र विकसित किया जा सकता है।
उन्होंने कहा, "सीबीआई को (वृंदा) ग्रोवर की अर्जी पर वस्तुस्थिति रिपोर्ट दाखिल करने दें। साथ ही, ऐसी परिस्थितियों में पीड़ितों को मुफ्त कानूनी सहायता उपलब्ध कराई जानी चाहिए। हम आदेश देंगे कि अगर पहले के तनावपूर्ण माहौल के कारण विधिक सेवा के लिए वकील (एलएसी) उपलब्ध नहीं हैं, तो गुवाहाटी बार के एलएसी जा सकते हैं।"
इस बीच, वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस ने शीर्ष अदालत को सूचित किया कि वह मणिपुर के कुकी समुदाय के एक आदिवासी निकाय मंच का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।
गोंजाल्विस ने कहा, "दो समितियां नियुक्त की गई थीं। एक आपराधिक न्याय के लिए और दूसरी पुनर्वास के लिए। इस अदालत में 27 रिपोर्ट दाखिल की जा चुकी हैं और हमारे पास उनकी एक भी प्रति नहीं है।"
उन्होंने कहा, "हम इन रिपोर्ट की प्रतियां इसलिए चाहते हैं, क्योंकि पुनर्वास की प्रक्रिया ठप पड़ी हुई है। अभियोग की रफ्तार काफी धीमी है।"
हालांकि, न्यायालय ने रिपोर्ट में मौजूद संवेदनशील सामग्री के बारे में आशंका जाहिर करते हुए कहा कि यह रिपोर्ट "कहीं और" पहुंच सकती है।
गोंजाल्विस ने कहा कि संवेदनशील अंशों को हटाया जा सकता है।
पीठ ने मामले की अगली सुनवाई 26 फरवरी के लिए निर्धारित कर दी।
भाषा पारुल सुरेश
सुरेश
1302 1923 दिल्ली