श्रमिक संगठनों की हड़ताल: थरूर ने केरल में बंद की आलोचना की
नेत्रपाल
- 12 Feb 2026, 06:52 PM
- Updated: 06:52 PM
तिरुवनंतपुरम, 12 फरवरी (भाषा) कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने केंद्र सरकार के श्रम कानूनों के खिलाफ श्रमिक संगठनों के आहूत भारत बंद के तहत केरल में हुए पूर्ण बंद की आलोचना करते हुए इसे एक ''दुखद विडंबना'' बताया और कहा कि यह महज ''केरल बंद'' बनकर रह गया।
थरूर ने 'एक्स' पर कहा कि भारत के बाकी हिस्से ऐसे जबरन बंद और हड़ताल जैसी गतिविधियों से आगे बढ़ चुके हैं, लेकिन केरल अब भी ऐसी स्थिति में फंसा हुआ है।
उन्होंने कहा कि केरल आज भी असंगठित बहुसंख्यक वर्ग पर एक छोटे समूह के इस संगठित अत्याचार का अनूठा शिकार बना हुआ है।
सांसद ने कहा, ''यह एक दुखद विडंबना है कि आज का भारत बंद वास्तव में एक और केरल बंद मात्र है।''
इससे पहले दिन में, केरल विधानसभा में विपक्ष के नेता वी.डी. सतीशन ने भी जनता से इस बात पर चर्चा करने को कहा कि राष्ट्रव्यापी हड़ताल राज्य में पूर्ण बंद में कैसे बदल सकती है।
थरूर ने कहा "राजनीति में आने के बाद से मेरा रुख एक जैसा रहा है: मैं विरोध करने के अधिकार का समर्थन करता हूं, लेकिन बाधा डालने के अधिकार का नहीं। किसी भी भारतीय को किसी दूसरे भारतीय की स्वतंत्र आवाजाही में बाधा डालने का संवैधानिक अधिकार नहीं है।"
कांग्रेस सांसद के अनुसार, केरल के लोगों ने अपने 'उग्र यूनियनवाद' के कारण उद्योगों को दूर कर दिया है; अब, ''बल प्रयोग'' के इन पुरातन तरीकों को अपनाए रखने की वजह से नागरिकों को उनके ही घरों में कैद कर दिया गया है, और दुकानदारों को अपनी दुकानें बंद करने के लिए मजबूर किया गया तथा यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि राज्य, युवाओं और उद्यम के लिए अनुकूल न बना रहे।
उन्होंने कहा, "अब समय आ गया है कि हम इस आत्म-विनाशकारी आदत से आगे बढ़ें। हम इसकी जगह हमेशा रचनात्मक विरोध अपना सकते हैं।"
थरूर ने कहा, "मैंने लंबे समय से यह तर्क दिया है, यहां तक कि जब मेरी अपनी पार्टी भी इसमें शामिल हो... कि हड़ताल के अधिकार में दूसरों पर बंद थोपने का अधिकार शामिल नहीं है। किसी राज्य को पंगु बनाना, दैनिक जीवन, व्यापार और आवागमन को बाधित करना आम नागरिक की स्वतंत्रता पर हमला है।"
उन्होंने कहा, ''केरल की प्रतिष्ठा को 'उग्र यूनियनवाद' से काफी नुकसान पहुंचा है, जो कारखानों से लेकर हमारी सड़कों और घरों तक फैला हुआ है।''
थरूर ने कहा, "जब हम विरोध के उन पुराने तरीकों का पालन करते रहें जिन्हें बाकी दुनिया - और वास्तव में, बाकी भारत - ने त्याग दिया हो तो हम आधुनिक, निवेशक-अनुकूल गंतव्य बनने की आकांक्षा नहीं रख सकते।"
उन्होंने कहा कि हमें असहमति व्यक्त करने के अधिकार का सम्मान करना चाहिए, लेकिन साथ ही असहमति जताने के अधिकार और काम करने तथा यात्रा करने की स्वतंत्रता की भी पुरजोर रक्षा करनी चाहिए।
हालांकि, कांग्रेस से संबद्ध श्रमिक संगठन भी राष्ट्रव्यापी हड़ताल का हिस्सा रहे।
भाषा नोमान नेत्रपाल
नेत्रपाल
1202 1852 तिरुवनंतपुरम